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इनकम टैक्स का नया सिस्टम चुनें या पुराना वाला ज्यादा बेहतर है?

हम 5 पॉइंट्स के जरिए बता रहे हैं कि कैसे आप इनकम टैक्स के नए और पुराने सिस्टम में सही फैसला कर सकते हैं
अपडेटेड Feb 11, 2020 पर 08:32  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

एक कहावत है कि कोई भी वरदान बहुत सोच समझकर मांगना चाहिए। अब यह कहावत सच होती दिख रही है। भारतीय करदाताओं को कुछ ऐसे ही हालात से दो-चार होना पड़ रहा है। लंबे अरसे से टैक्सपेयर्स एक आसान कर व्यवस्था, टैक्स स्लैब्स में बदलाव और टैक्स रेट कम किए जाने की मांग कर रहे थे। आम बजट 2020 में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने इन मांगों को मान तो लिया, मगर उसमें एक शर्त जोड़ दी। शर्त यह है कि एक आसान टैक्स स्ट्रक्चर के लिए आपको अभी तक मिल रहे कई एग्जेम्पशंस और डिडक्शंस को छोड़ना होगा।
 
मौजूदा आयकर प्रणाली और नई व्यवस्था दोनों एकसाथ चलती रहेंगी। टैक्सपेयर्स को इनमें से किसी एक को चुनना होगा। अब आपको देखना होगा कि कौन सा ऑप्शन आपके लिए ज्यादा कारगर है। परेशानी वाली बात यह है कि जिसे सरल व्यवस्था कहा जा रहा है वह कई सारी जटिलाओं में उलझी हुई है। इससे टैक्सपेयर्स को कोई राहत मिलने की बजाय उनमें भ्रम पैदा हो रहा है।
 
यहां हम 5 पॉइंट्स के जरिए बता रहे हैं कि कैसे आप इस दुविधा से निकलकर अपने लिए सही फैसला ले सकते हैं
 
पहले से प्लान बनाएं
 
इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है कि पुरानी व्यवस्था में रुके रहें या नई पर स्विच कर लें। ऐसे में यह सिर्फ आपकी आमदनी या सैलरी स्ट्रक्चर पर निर्भर नहीं करता है। साथ ही आपको अपनी निवेश की आदतों, उम्र, गोल्स, जिम्मेदारियों और संभावित खर्चों पर भी नजर डालनी होगी। आपको अपनी वास्तविक आमदनी और डिडक्शन आंकड़ों को भी देखना होगा और उसके बाद ही आप नई व्यवस्था पर स्विच करने या नहीं करने का फैसला कर पाएंगे।
 
मिसाल के तौर पर, अगर आप एक युवा हैं और कागजी कार्यवाही से बचते हैं, साथ ही न के बराबर क्लेम करते हैं या कोई टैक्स सेविंग बेनेफिट नहीं लेते हैं तो आपके लिए नई प्रणाली सही साबित हो सकती है। नई व्यवस्था के जरिए आपके हाथ में ज्यादा पैसा बच सकता है। हालांकि, जो लोग कई टैक्स ब्रेक लेते हैं, उनके लिए टैक्स पर ज्यादा बचाने के लिहाज से पुरानी व्यवस्था उचित हो सकती है।
 
इस वजह से फाइनेंशियल प्लानिंग पहले के मुकाबले अब कहीं ज्यादा अहम हो गई है। अभी से तैयारी शुरू कर दें ताकि जब अप्रैल में आपका एंप्लॉयर आपसे प्रस्तावित निवेश डिक्लेयरेशन की मांग करे तब आप फैसला करने की स्थिति में हों। आपके प्रस्तावित इनवेस्टमेंट डिक्लेयरेशन के मुताबिक ही आपकी कंपनी आपकी सैलरी से हर महीने टैक्स की कटौती करती है। यहां तक कि जो डॉक्युमेंटेशन से बेहद बचते हैं उन्हें भी कम से कम एक बार इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। टैक्स कंसल्टिंग फर्म ग्लोबव्यू एडवाइजर्स के फाउंडर अमेय कुंटे के मुताबिक, "सैलरीड टैक्सपेयर्स के पास दोनों व्यवस्थाओं में से एक में जाने का विकल्प है, जो कि बिजनेस से कमाई करने वालों को नहीं मिल रहा है। ऐसे में अगर आप एक सैलरीड इंडीविजुअल हैं तो आप अगले साल अपने लिए मुफीद विकल्प का चुनाव कर सकते हैं।"
 
ज्यादातर के लिए पुरानी स्कीम ही अच्छी
 
फाइनेंशियल एडवाइजर्स इस बारे में एकराय हैं कि अगर आप कई टैक्स बेनेफिट्स लेते रहे हैं, खासतौर पर सेक्शन 80सी और 80सीसीडी जैसे टैक्स बेनेफिट्स जो कि आपको बचत करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, तो आपके लिए पुरानी व्यवस्था ही अच्छी है। मुंबई के फाइनेंशियल प्लानर पंकज मठपाल के मुताबिक, "ज्यादातर मामलों में पुरानी व्यवस्था फायदेमंद साबित होगी। केवल ऐसे लोग जो कि 80 सी के तहत निवेश करने को तवज्जो नहीं देते और दूसरे डिडक्शन नहीं लेते या ज्यादा खर्च के चलते 1।5 लाख रुपये की इस सीमा का इस्तेमाल नहीं कर पाते, उनके लिए नई व्यवस्था में कुछ टैक्स बचाने का मौका होगा।"
 
मिसाल के तौर पर, अगर आपकी टोटल इनकम 7।25 लाख रुपये या 10 लाख रुपये है और आप 80सी के बेनेफिट और स्टैंडर्ड डिडक्शन लेते हैं तो पुरानी व्यवस्था में नई व्यवस्था के मुकाबले आपकी टैक्स देनदारी 18,720 रुपये और 3,120 रुपये कम बैठती है। जो लोग 15 लाख रुपये कमा रहे हैं वे नई व्यवस्था में 14,820 रुपये बचा पाएंगे।
 
हालांकि, ज्यादातर इंडीविजुअल्स 80C के अलावा दूसरे बेनेफिट्स भी इस्तेमाल करते हैं। इनमें हाउस रेंट अलाउंस (सेक्शन 10), 2 लाख रुपये तक होम लोन इंटरेस्ट (सेक्शन 24B), सेक्शन 80D के तहत 60 साल की उम्र तक के लोग 25,000 रुपये तक हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम में, सेक्शन 80CCD(1B) में 50,000 रुपये तक एनपीएस में योगदान के लिए शामिल हैं जो कि टैक्सेबल इनकम को कम करने में काफी मददगार साबित होते हैं। ऐसे में अगर आप 15 लाख रुपये कमाते हैं, 2 लाख रुपये होम लोन का ब्याज चुकाते हैं, इसके अलावा 80सी के तहत टैक्स डिडक्शन और स्टैंडर्ड बेनेफिट भी लेते हैं तो नई व्यवस्था में आपको 47,850 रुपये की चपत लगेगी। सीधे शब्दों में समझें तो जितने ज्यादा डिडक्शंस और एग्जेंप्शंस होंगे उतना ही फायदा आपको पुरानी व्यवस्था में बने रहने का मिलेगा।
 
मठपाल बताते हैं, "कई डिडक्शंस रिकरिंग नेचर के होते हैं। ऐसे में नई व्यवस्था पर स्विच करके आप क्यों इन बेनेफिट्स को छोड़ना चाहेंगे?" मसलन, आपका प्रॉविडेंट फंड में योगदान जो कि 80सी के तहत टैक्स ब्रेक के लिए आपको योग्य बनाता है, एक अनिवार्य डिडक्शन है जो कि हर महीने आपकी सैलरी से जाता है। आप इसे बंद नहीं कर सकते हैं। पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF) में भी किया जाने वाला निवेश 15 साल के लिए होता है। अगर आप हाउसिंग लोन इंटरेस्ट पर 24(B) के तहत डिडक्शन क्लेम करते हैं तो आप इसे पूरे होम लोन टेन्योर के दौरान हासिल कर सकते हैं जो कि 30 साल तक का हो सकता है।
 
डेलॉयट में पार्टनर होमी मिस्त्री ने मनीकंट्रोल से बातचीत में कहा था कि भले ही आप नए सिस्टम को चुनते हैं तब भी आप 80C का पालन करने वाले इनवेस्टमेंट में अपना निवेश जारी रख सकते हैं। नई व्यवस्था चुनने की वजह से केवल उसका टैक्स बेनेफिट आपको नहीं मिलेगा। हालांकि, यहां तस्वीर का साफ होना अभी बाकी है। मान लीजिए अगर आपने पब्लिक प्रॉविडेंट फंड में पैसा लगाया है और इसमें इंटरेस्ट टैक्स फ्री है। ऐसे में अगर आप नई व्यवस्था में दाखिल हो जाते हैं तो भी क्या इंटरेस्ट टैक्स-फ्री रहेगा?
 
लॉन्ग-टर्म सेविंग्स हैं जरूरी
 
मिलेनियल्स या जो अपनी पहली या दूसरी नौकरी कर रहे हैं और कम पीएफ डिडक्शन की वजह से काफी कम टैक्स बेनेफिट्स ले पा रहे हैं, उनके लिए नई व्यवस्था आकर्षक जान पड़ती है। कम डिडक्शन को जाने देना आसान होता है साथ ही ज्यादा टैक्स ब्रेक हासिल करने के लिए ज्यादा निवेश करने के प्रेशर से भी बचा जा सकता है। इस पीढ़ी के पास हाथ में ज्यादा पैसा बच सकता है, दूसरी ओर वे पेपरवर्क के झंझट से भी बच सकते हैं।
 
इसका मतलब यह नहीं है कि युवा लोगों के लिए पैसे की बचत न करना अच्छी बात है। हाथ में मौजूद फालतू रकम को खर्च करने की इच्छा पैदा होती है और इससे आखिरकार खर्च बढ़ता है, खासतौर पर क्रेडिट कार्ड के जरिए ऐसे खर्च होने की पूरी आशंका होती है। यह न केवल आपको कर्ज के जाल में फंसाता है, बल्कि सेविंग्स के न होने से इनके वित्तीय भविष्य पर भी चोट लगती है। बचत करने की कोई बड़ी मजबूरी न पैदा होना नई कर प्रणाली की सबसे बड़ी खामी है। फाइनेंशियल प्लानर गौरव मशरूवाला के मुताबिक, "लोग तब तक बचत नहीं करना चाहते जब तक कि उन्हें इसके लिए मजबूर न किया जाए। टैक्स डिडक्शंस ही ऐसा एकमात्र तरीका है जो लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित करता है। यही बचत लोगों को उनके भविष्य को सुरक्षित करने के काम आती है। खपत में बढ़ोतरी कभी भी बचत की राह में रोड़ा नहीं बनना चाहिए। मैं कभी भी किसी को नई व्यवस्था पर स्विच करने की सलाह नहीं देता हूं।"
 
अगर सकारात्मक पहलू को देखें तो 80सी के तहत क्लेम की जरूरत के खत्म होने से टैक्सपेयर्स की बीमा एजेंटों के जाल में फंसने की आशंका कम होती है। बीमा एजेंटों के लिए कम यील्ड वाली एंडोवमेंट पॉलिसीज बेचना मुश्किल होगा। अनुशासन से चलने वाला कोई भी निवेशक हमेशा अपने लॉन्ग-टर्म प्लान में इक्विटीज को तवज्जो देता है।
 
NPS को मिली बढ़त
 
नए टैक्स सिस्टम में एक टैक्स बेनेफिट हालांकि मिला है। यह है नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)। अपनी बजट स्पीच में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने कहा कि 100 से ज्यादा में से करीब 70 एग्जेंप्शंस और डिडक्शंस को नई टैक्स व्यवस्था से खत्म किया जा रहा है। ऐसे में कुछ टैक्स बेनेफिट्स इस मार से बच गए हैं। एनपीएस में एंप्लॉयर का योगदान, जो कि सेक्शन 80सीसीडी(2) के तहत आपकी सैलरी से कटौती योग्य है, भी इसी तरह का टैक्स ब्रेक है। यह डिडक्शन लिमिट आपकी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते के जोड़ के 10 फीसदी के बराबर है। चाहे आप नई व्यवस्था चुनें या पुरानी, यह सुनिश्चित कर लीजिए कि क्या आपका नियोक्ता यह ऑप्शन देता है और इसे ले लीजिए।
 
चैरिटी का चुनाव बेहद सावधानी से
 
फिलहाल आप जिन डिडक्शंस को क्लेम कर सकते हैं उनमें चैरिटेबल संस्थानों को दिया गया दान भी है। संस्थान के मुताबिक आप दान दी गई रकम का 50 या 100 फीसदी क्लेम कर सकते हैं। यह सेक्शन 80जी के तहत आता है। इसमें टैक्सपेयर्स के लिए मुख्य मसला डिडक्शन को क्लेम करने का रहा है क्योंकि दानदाता को वित्त वर्ष के बाद रसीद को सुरक्षित रखना होता था। ऐसा इसलिए क्योंकि दानदाता को रसीद का ब्योरा जैसे कि रसीद नंबर, चैरिटेबल संस्थान का पता, पैन और दान दी गई रकम टैक्स रिटर्न फॉर्म में भरनी होती थी।
 
बजट 2020 ने इस प्रक्रिया को थोड़ा सा आसान बनाया है। अब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट चैरिटेबल संस्थान से सीधे आपके दान का ब्योरा लेगा और यह ब्योरा आपके इनकम टैक्स फॉर्म में सीधे मिलेगा। आसान भाषा में, आपका इनकम टैक्स फॉर्म आपकी दान की गतिविधि के साथ पहले से भरा हुआ मिलेगा। यहां एक जरूरी शर्त यह है कि चैरिटेबल संस्थान का आईटी डिपार्टमेंट में रजिस्टर्ड होना जरूरी है और इसके पास एक यूनीक रजिस्ट्रेशन नंबर होना चाहिए। अगर आप डोनेशन देते हैं तो यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपके चैरिटेबल ट्रस्ट ने यह प्रक्रिया पूरी कर ली हो।
 
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