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by Roopali Sharma | jan 26,  2025

शांतिपुर साड़ियों से है नवाबों की शान और  महिलाओं का श्रृंगार

शांतिपुर साड़ी का 500 साल पुराना इतिहास, फैशन और ब्यूटी से जुडी कुछ जानकारी यहां बता रहे हैं:

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शांतिपुर बुनाई की परंपरा 15वीं शताब्दी के समय से चली आ रही है, जो इसे भारत के सबसे पुराने बुनाई केंद्रों में से एक बनाता है

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प्राचीन जड़ें

18वीं शताब्दी में नदिया के राजा कृष्णचंद्र राय के शासनकाल में कला को बढ़ावा मिला, जिससे साड़ियां शाही परिवारों की पसंद बनीं

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शाही संरक्षण

शांतिपुर अपनी बारीक बुनाई के लिए प्रसिद्ध है। पुराने समय में यहां की साड़ियां कोमलता के कारण ‘मलमल’ के समान मानी जाती थीं

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मलमल जैसा अहसास

इन साड़ियों की खूबसूरती इनके हाथ से बुने हुए ‘बुटिदार’ डिजाइनों में है। कारीगर ट्रेडिशनल लकड़ी के करघों का उपयोग करते हैं

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हस्तनिर्मित डिजाइन

शांतिपुर साड़ी की पहचान इसके विशिष्ट किनारों से होती है, जिन्हें भोंमरा और ‘राजमहल’ जैसे नामों से जाना जाता है

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विशिष्ट किनारे

इन साड़ियों में नेचुरल रंगों का उपयोग किया जाता था, जो न केवल सौंदर्य बढ़ाते थे बल्कि स्किन के लिए भी सौम्य होते थे

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नेचुरल ब्यूटी

यहां की पोपुलर स्टाइल ‘गंगा-जमुना’ है, जिसमें साड़ी का रंग अलग होता है, जो इसे एक अनूठा फैशन स्टेटमेंट देता है

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गंगा-जमुना स्टाइल

डिजाइनर शांतिपुर के ट्रेडिशनल डिजाइनों को मोडर्न ट्विस्ट देकर ग्लोबल मंच पर पेश कर रहे हैं, जिससे यह पोपुलर हो रही है

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मोडर्न फैशन में बदलाव

यह साड़ी केवल पहनावा नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान है, शांतिपुर साड़ी को इतिहास और GI टैग प्रदान किया गया

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सांस्कृतिक पहचान

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