Bengal SIR Row: 'आधार से लॉग-इन नहीं करेंगे...'; पश्चिम बंगाल में जजों के इनकार के बाद अटके SIR के हजारों मामले
Bengal SIR Row: पश्चिम पश्चिम बंगाल में SIR अपीलों का निपटारा ठप पड़ गया है। निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा 21 सितंबर को शुरू किए गए नए पोर्टल में ट्रिब्यूनल जजों ने अपने आधार डिटेल्स दर्ज कर लॉग-इन करने से इनकार कर दिया है, जिसके कारण मामलों की सुनवाई और आदेश अपलोड करने की प्रक्रिया पूरी तरह से रुक गई है
Bengal SIR Row: विवाद के चलते 21 सितंबर से SIR अपीलों पर कोई फैसला पोर्टल पर अपलोड नहीं किया जा सका है
Bengal SIR Row: पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे ट्रिब्यूनल जजों और चुनाव आयोग (ECI) के बीच एक बड़ा विवाद सामने आया है। कथित तौर पर 13 SIR अपीलीय ट्रिब्यूनल जजों ने 21 सितंबर 2026 को शुरू किए गए नए पोर्टल पर अपने फैसले अपलोड करने से इनकार कर दिया है। जजों ने पोर्टल में लॉगिन के लिए आधार संबंधी व्यक्तिगत जानकारी मांगे जाने और दस्तावेजों को लेकर लगाए गए प्रतिबंध पर आपत्ति जताई है।
जजों का कहना है कि नए पोर्टल में लॉगिन करने के लिए Aadhaar credentials का इस्तेमाल करने की बाध्यता उनके मुताबिक एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) प्राधिकरण के कामकाज में हस्तक्षेप है। इसके अलावा पोर्टल में अपीलों पर फैसला करते समय केवल चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित 13 दस्तावेजों में से ही दस्तावेज चुनने की व्यवस्था है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, इस विवाद के चलते 21 सितंबर से SIR अपीलों पर कोई फैसला पोर्टल पर अपलोड नहीं किया जा सका है। ट्रिब्यूनल जजों ने चुनाव आयोग को भेजे पत्र में कहा कि इस स्थिति में वे प्रभावी तौर पर काम करने में असमर्थ हो गए हैं।
25 सितंबर को हुई बैठक, सामूहिक फैसला
13 जजों ने 25 सितंबर को बैठक की। बैठक के बाद उन्होंने चुनाव आयोग को पत्र भेजकर नए पोर्टल पर फैसले अपलोड नहीं करने का सामूहिक निर्णय बताया। लेटर में जजों ने कहा कि वे अपने व्यक्तिगत आधार नंबर या अन्य निजी जानकारी शेयर नहीं करेंगे। उन्होंने लिखा कि 25 सितंबर को कोलकाता में SIR अपीलीय ट्रिब्यूनल के सभी 13 उपस्थित जजों ने सर्वसम्मति से यह फैसला लिया है।
13 दस्तावेजों की सीमा पर भी सवाल
जजों की दूसरी बड़ी आपत्ति पोर्टल में दस्तावेजों को लेकर है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 में SIR ट्रिब्यूनलों के गठन का निर्देश देते समय चुनाव आयोग द्वारा बताए गए 13 दस्तावेजों का उल्लेख किया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस लिस्ट को 'indicative' यानी उदाहरणात्मक बताया था, न कि 'exhaustive' यानी पूरी तरह सीमित लिस्ट...।
पुराने पोर्टल में जज अपना फैसला Word फॉर्मेट में अपलोड कर सकते थे और केवल 'Accepted' या 'Rejected' का विकल्प चुनना होता था। लेकिन नए पोर्टल में जजों को यह बताना जरूरी है कि उन्होंने 13 निर्धारित दस्तावेजों में से किन दस्तावेजों को स्वीकार किया। इसमें अधिकतम पांच दस्तावेज चुनने का विकल्प दिया गया है।
एक ट्रिब्यूनल जज के मुताबिक, कई मामलों में बंगाल के स्कूल शिक्षा विभाग से सत्यापित कक्षा IV या V की पास सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेजों को सहायक प्रमाण के तौर पर स्वीकार किया गया है। जज का कहना है कि नया पोर्टल 13 दस्तावेजों से बाहर जाकर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देता।
'ट्रिब्यूनल की न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप'
जजों ने चुनाव आयोग को लिखे पत्र में कहा कि 13 दस्तावेजों के अलावा किसी अन्य दस्तावेज को अपलोड करने पर रोक ट्रिब्यूनल के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकती। उनके अनुसार, ऐसी रोक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के कामकाज में हस्तक्षेप के बराबर है।
जजों ने स्पष्ट किया कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत गठित अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में काम कर रहे हैं और अपील पर उचित फैसला लेने के लिए उन्हें ऐसे दस्तावेजों पर विचार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, जो मामले के लिए प्रासंगिक और स्वीकार्य हों। उन्होंने यह भी कहा कि ECI का कोई प्रशासनिक फैसला अपीलीय ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
फैसले में गलती सुधारने की सुविधा भी मांगी
ट्रिब्यूनल जजों ने चुनाव आयोग से यह भी मांग की है कि फैसला अपलोड होने के बाद यदि उसमें कोई क्लेरिकल गलती या स्पष्ट त्रुटि रह जाती है, तो उसे सुधारने की सुविधा दी जाए। जजों ने आयोग से आग्रह किया कि 21 सितंबर से पहले वाले ECI पोर्टल सिस्टम को बहाल किया जाए, हालांकि उसमें उनकी आपत्तियों के मुताबिक जरूरी बदलाव किए जाएं। उन्होंने इसके लिए पत्र मिलने के तीन दिनों के भीतर कार्रवाई करने की मांग की है।
ट्रिब्यूनल से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जब SIR विवादों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की अध्यक्षता में स्वतंत्र अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया था, तब इन्हें अलग अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के तौर पर स्थापित किया गया था। सूत्र के मुताबिक, मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल करने या हटाने संबंधी इन ट्रिब्यूनलों के फैसलों में न्यायिक महत्व है और ECI का प्रशासनिक या IT विभाग सॉफ्टवेयर में बदलाव के जरिए इन फैसलों को प्रभावित नहीं कर सकता।