Dussehra 2026: पूरे भारत में दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, जहां भगवान राम की जीत को दर्शाने के लिए रावण के पुतले जलाए जाते हैं। लेकिन कानपुर का एक मंदिर इससे बिल्कुल अलग परंपरा का पालन करता है। यहां लंका के दस सिरों वाले राजा को जलाया नहीं जाता, बल्कि उनकी पूजा की जाती है।
शिवाला इलाके में स्थित 135 साल पुराना 'दशानन मंदिर' रामायण के मुख्य खलनायक रावण को समर्पित है। यहां भगवान शिव के प्रति उनकी भक्ति और उनके ज्ञान के लिए उन्हें सम्मान दिया जाता है। यह मंदिर साल में केवल एक दिन यानी दशहरे के मौके पर ही भक्तों के लिए खुलता है। यह इस त्योहार से जुड़ी सबसे अनोखी धार्मिक परंपराओं में से एक है।
जहां कानपुर का बाकी हिस्सा शाम को होने वाले रावण दहन की तैयारी कर रहा है, वहीं सुबह के समय मंदिर परिसर का माहौल कुछ अलग ही होता है। यहां भक्त प्रार्थना करने, तेल के दीपक जलाने और "लंकापति नरेश रावण की जय" का नारा लगवाने के लिए इकट्ठा होते हैं—वे एक ऐसे व्यक्तित्व को नमन करते हैं, जिसे यहां बिल्कुल अलग नज़रिए से याद किया जाता है।
दशानन मंदिर कानपुर में रावण की पूजा क्यों की जाती है?
माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1890 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था। वे पड़ोसी उन्नाव जिले के रहने वाले थे और भगवान शिव के परम भक्त थे। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर रावण की शिव-भक्ति, उसकी बुद्धिमत्ता और उसके ज्ञान के सम्मान में स्थापित किया गया था।
शिवाला में कैलाश मंदिर परिसर के भीतर स्थित दशानन मंदिर, दशहरे की प्रचलित कथा से बिल्कुल अलग एक तस्वीर पेश करता है। जहां दशहरा भगवान राम की रावण पर जीत का प्रतीक है, वहीं इस मंदिर की परंपरा रावण के जीवन के एक दूसरे पहलू पर ध्यान दिलाती है- एक विद्वान और भगवान शिव के सच्चे भक्त के रूप में उसकी पहचान।
इस मंदिर की एक खास विशेषता यहां मौजूद रावण की पांच फुट ऊंची प्रतिमा है। ज्यादातर मंदिरों की मूर्तियों से अलग, यह प्रतिमा साल के ज्यादातर समय ढकी रहती है और इसे केवल दशहरा के दिन ही खोला जाता है। मंदिर की स्थानीय परंपरा के अनुसार बाकी 364 दिन यह प्रतिमा ढकी रहती है, जो रावण के कैद में रहने के समय को दर्शाती है।
विजयादशमी के दिन मंदिर के दरवाजे खुलते हैं और भक्त यहां आशीर्वाद लेने आते हैं। वे अक्सर बुद्धि, शक्ति और ज्ञान के लिए प्रार्थना करते हैं। इस मौके पर एक विशेष आरती की जाती है। यह रस्म छोटी है, लेकिन बहुत अनोखी है। दशहरा की सुबह प्रार्थना और विशेष आरती के लिए मंदिर जल्दी खुल जाता है। दिन भर की रस्मों के बाद मंदिर के दरवाजे फिर से बंद हो जाते हैं और प्रतिमा अगली विजयादशमी तक वापस ढकी हुई अवस्था में आ जाती है।
यहां आने वाले भक्तों के लिए दशहरा सिर्फ रावण की हार को याद करने का दिन नहीं है। यह लंकापति रावण से जुड़े ज्ञान, भक्ति और उनके व्यक्तित्व की जटिलताओं पर विचार करने का भी एक अवसर है।