गुजरात के बड़े टेक्सटाइल और डायमंड हब सूरत में काम कर रहे लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर में हाल के समय में बड़ा और अहम ट्रेंड देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार के यह प्रवासी कामगार अपने गृह नगर वापस लौट रहे हैं। स्थानीय खबरों में इसे ‘गांव चलो आंदोलन’ कहा जा रहा है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर माइग्रेंट वर्कर्स की भीड़ और एम्ब्रॉयडरी और टेक्सटाइल यूनिट्स से वर्कर्स के जाने की खबरों में बड़े पैमाने पर पलायन का दावा किया जा रहा है। कुछ खबरों का कहना है कि इसमें 10 लाख तक वर्कर्स शामिल हो सकते हैं।
बताया जा रहा है कि ‘गांव चलो आंदोलन’ है एक कैंपेन है जो वर्कर्स को लंबे समय तक काम करने, साप्ताहिक अवकाश न मिलने, सैलरी में कटौती और नौकरी से निकाले जाने के आरोपों के बीच अपने गांवों में लौटने को बढ़ावा दे रही है। सीएनएन न्यूज 18 की खबर के मुताबिक मजदूर प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्कर्स उन काम करने के हालात को मानने को तैयार नहीं हैं जिन्हें वे सही नहीं मानते हैं। हालांकि, सूरत से मिली दूसरी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई वर्कर्स दिवाली और छठ पूजा से पहले बस घर जा रहे हैं, जैसा कि वे हर साल करते हैं। तो, सूरत में असल में क्या हो रहा है? क्या माइग्रेंट वर्कर्स को गुजरात से बाहर जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, या यह रेगुलर सीजनल माइग्रेशन बढ़ते लेबर विवाद के साथ हुआ है?
क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?
‘गांव चलो आंदोलन’, सूरत की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों से जुड़ा एक अभियान है। काम के घंटे, हर हफ्ते की छुट्टियां, सैलरी और मजदूर सुरक्षा लागू करने को लेकर कामगारों और फैक्ट्री मालिकों के बीच लंबे समय से चल रहे मतभेद के बीच इसने ध्यान खींचा है। अक्टूबर की शुरुआत में इस कैंपेन ने फिर से जोर पकड़ा, जब लेबर कोड के पालन से जुड़े भरोसे और श्रम विभाग के निर्देश के बाद पहले के विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए गए थे। इसके बाद वर्कर के प्रतिनिधि अजय दुबे ने वर्कर्स से कहा कि अगर उनकी चिंताओं का समाधान नहीं होता है तो वे कम से कम दो महीने के लिए अपने गांव लौटने पर विचार करें।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की 3 अक्टूबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुबे ने वर्कर्स से कहा कि वे मालिकों से साफ जवाब की मांग करें, जहां जरूरी हो वहां लेबर अधिकारियों को अलग-अलग शिकायतें दें, और उन जगहों पर जाने पर विचार करें जो लेबर की जरूरतों का पालन करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हर हफ्ते की छुट्टियां देने से मना किया जाता रहा तो वर्कर्स रविवार को मशीनरी बंद कर दें।
वर्कर्स सूरत क्यों छोड़ रहे हैं? फैक्ट्री मालिकों पर आरोप
सूरत से मिली खबरों में इंटरव्यू किए गए कामगारों का कहना है कि उन्हें आराम करने के लिए बहुत कम समय मिलता है और उनके काम की अवधि पर उनका नियंत्रण कम होता है। कई वर्कर्स का आरोप है कि उनसे दिन में लगभग 12 घंटे और कुछ जगहों पर तो महीने में 30 दिन तक काम करने की उम्मीद की जाती है। उनका कहना है कि हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मांगने पर मैनेजमेंट के साथ झगड़े हो सकते हैं, जबकि छुट्टी मांगने पर सैलरी कट सकती है, पेमेंट रोका जा सकता है या नौकरी से निकाला जा सकता है।
मुख्य मांगों में से एक है काम के घंटे घटाकर दिन में आठ घंटे करना, साथ ही पेड वीकली छुट्टी, बेहतर होगा कि रविवार को दी जाए। मजदूरों ने समय पर वेतन देने और मज़दूरों की सुरक्षा को बेहतर तरीके से लागू करने की भी मांग की है, जिसमें प्रोविडेंट फंड, एम्प्लॉई स्टेट इंश्योरेंस (ESI) और जहां लागू हो, वहां ग्रेच्युटी बेनिफिट शामिल हैं।