Get App

Gaon Chalo Andolan: गुजरात से यूपी-बिहार में वापस अपने घर लौट रहे हैं लाखों माइग्रेंट वर्कर, जानें सूरत के ‘गांव चलो आंदोलन’ का सच

Gaon Chalo Andolan: गुजरात के काम कर रहे लाखों प्रवासी मजदूरों के पिछले कुछ समय से वापस यूपी-बिहार के अपने घरों को लौटने की खबरें आ रही हैं। स्थानीय खबरों में टेक्सटाइल और डायमंड हब सूरत से बड़े पैमाने पर कामगारों के पलायन का दावा किया जा रहा है। आइए जानें इसका पूरा सच क्या है

MoneyControl Newsअपडेटेड Oct 14, 2026 पर 1:11 PM
Gaon Chalo Andolan: गुजरात से यूपी-बिहार में वापस अपने घर लौट रहे हैं लाखों माइग्रेंट वर्कर, जानें सूरत के ‘गांव चलो आंदोलन’ का सच
कुछ खबरों का कहना है कि इसमें 10 लाख तक वर्कर्स शामिल हो सकते हैं।

गुजरात के बड़े टेक्सटाइल और डायमंड हब सूरत में काम कर रहे लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर में हाल के समय में बड़ा और अहम ट्रेंड देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार के यह प्रवासी कामगार अपने गृह नगर वापस लौट रहे हैं। स्थानीय खबरों में इसे ‘गांव चलो आंदोलन’ कहा जा रहा है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर माइग्रेंट वर्कर्स की भीड़ और एम्ब्रॉयडरी और टेक्सटाइल यूनिट्स से वर्कर्स के जाने की खबरों में बड़े पैमाने पर पलायन का दावा किया जा रहा है। कुछ खबरों का कहना है कि इसमें 10 लाख तक वर्कर्स शामिल हो सकते हैं।

बताया जा रहा है कि ‘गांव चलो आंदोलन’ है एक कैंपेन है जो वर्कर्स को लंबे समय तक काम करने, साप्ताहिक अवकाश न मिलने, सैलरी में कटौती और नौकरी से निकाले जाने के आरोपों के बीच अपने गांवों में लौटने को बढ़ावा दे रही है। सीएनएन न्यूज 18 की खबर के मुताबिक मजदूर प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्कर्स उन काम करने के हालात को मानने को तैयार नहीं हैं जिन्हें वे सही नहीं मानते हैं। हालांकि, सूरत से मिली दूसरी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई वर्कर्स दिवाली और छठ पूजा से पहले बस घर जा रहे हैं, जैसा कि वे हर साल करते हैं। तो, सूरत में असल में क्या हो रहा है? क्या माइग्रेंट वर्कर्स को गुजरात से बाहर जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, या यह रेगुलर सीजनल माइग्रेशन बढ़ते लेबर विवाद के साथ हुआ है?

क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?

‘गांव चलो आंदोलन’, सूरत की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों से जुड़ा एक अभियान है। काम के घंटे, हर हफ्ते की छुट्टियां, सैलरी और मजदूर सुरक्षा लागू करने को लेकर कामगारों और फैक्ट्री मालिकों के बीच लंबे समय से चल रहे मतभेद के बीच इसने ध्यान खींचा है। अक्टूबर की शुरुआत में इस कैंपेन ने फिर से जोर पकड़ा, जब लेबर कोड के पालन से जुड़े भरोसे और श्रम विभाग के निर्देश के बाद पहले के विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए गए थे। इसके बाद वर्कर के प्रतिनिधि अजय दुबे ने वर्कर्स से कहा कि अगर उनकी चिंताओं का समाधान नहीं होता है तो वे कम से कम दो महीने के लिए अपने गांव लौटने पर विचार करें।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की 3 अक्टूबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुबे ने वर्कर्स से कहा कि वे मालिकों से साफ जवाब की मांग करें, जहां जरूरी हो वहां लेबर अधिकारियों को अलग-अलग शिकायतें दें, और उन जगहों पर जाने पर विचार करें जो लेबर की जरूरतों का पालन करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हर हफ्ते की छुट्टियां देने से मना किया जाता रहा तो वर्कर्स रविवार को मशीनरी बंद कर दें।

इसलिए यह आंदोलन सिर्फ वर्कर्स के शहर छोड़ने के बारे में नहीं है। यह लेबर की कमी की संभावना का इस्तेमाल करके नियोक्ताओं पर लंबे समय से चली आ रही काम की जगह की शिकायतों को दूर करने का दबाव बनाने की भी एक कोशिश है।

वर्कर्स सूरत क्यों छोड़ रहे हैं? फैक्ट्री मालिकों पर आरोप

सब समाचार

+ और भी पढ़ें