सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के 30 से ज्यादा जिले, जानें कैसे एक जिले को किया जाता है सूखाग्रस्त घोषित

महाराष्ट्र सरकार की तरफ से घोषणा के बाद तय राहत उपाय लागू किए जा सकते हैं। इनमें फसल-ऋण का पुनर्गठन, जमीन के लगान में छूट, खेती के लिए बिजली में छूट, और पीने के पानी व चारे की व्यवस्था जैसे उपाय शामिल हैं।

अपडेटेड Sep 27, 2026 पर 1:44 PM
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अलग-अलग जगहों पर सूखे की स्थिति काफी अलग हो सकती है। एक ही राज्य में, एक तालुका में लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है और फसल को नुकसान हो सकता है, जबकि दूसरे में पर्याप्त बारिश हो सकती है।

महाराष्ट्र ने अपने 358 तालुकों में से 265 तालुकों (यानी राज्य के 74% तालुकों) को सूखा-प्रभावित घोषित किया है। सूखे की स्थिति की पहचान करने और राहत के उपाय शुरू करने के लिए राज्य सरकार ने 'सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016' (जिसे 2020 में अपडेट किया गया था) और 'सूखा प्रबंधन कोड' के तहत 'ट्रिगर-1' को लागू किया है।

'ट्रिगर-1' महाराष्ट्र के सूखा आकलन ढांचे का पहला चरण है। इसे तब लागू किया जाता है जब किसी इलाके में बारिश में 25% से ज्यादा की कमी हो और साथ ही कम से कम 21 दिनों तक सूखा मौसम (बिना बारिश वाला समय) रहा हो। आइए अब समझते हैं कि कोई राज्य कैसे तय करता है कि किसी इलाके में सूखा पड़ा है।

सूखा क्या है?


सूखा पानी की कमी का एक लंबा दौर होता है। सरकारें यह तय करने के लिए मापने लायक पैमानों का इस्तेमाल करती हैं कि कब सूखे का दौर इतना गंभीर हो गया है कि सरकारी दखल की जरूरत है। बारिश इनमें से एक अहम पैमाना है। अनुमानित बारिश की कमी और सूखे के दौर की अवधि का आकलन करते हैं।

कोई राज्य कैसे तय करता है कि किसी इलाके में सूखा पड़ा है?

राज्य मौसम, खेती और पानी की उपलब्धता से जुड़े पैमानों का इस्तेमाल करके यह तय करता है कि क्या बारिश की लंबी कमी से हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि सरकारी दखल की जरूरत है। महाराष्ट्र में इस प्रक्रिया में बारिश की कमी और सूखे के लंबे दौर का आकलन किया जाता है और फिर फसलों और जल संसाधनों पर उनके असर का मूल्यांकन किया जाता है।

राज्य का सूखा प्रबंधन ढांचा प्रभावित इलाकों की पहचान करने के लिए तय "ट्रिगर्स" (संकेतों) का इस्तेमाल करता है। इसके बाद नुकसान के स्तर और ज़रूरी राहत का पता लगाने के लिए ज़मीनी स्तर पर आकलन किया जाता है। राज्य का सूखा प्रबंधन ढांचा प्रभावित इलाकों की पहचान करने के लिए तय "पैमानों" (ट्रिगर्स) का इस्तेमाल करता है। इसके बाद नुकसान का दायरा और ज़रूरी राहत तय करने के लिए जमीनी स्तर पर जांच की जाती है।

ध्यान में रखी जानें वाली बातें

बारिश- सामान्य स्तर की तुलना में कितनी बारिश हुई है।

सूखे का दौर- क्या लंबे समय तक पर्याप्त बारिश नहीं हुई है।

फसल की स्थिति- क्या कम या असमान बारिश से खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा है।

मिट्टी में नमी- क्या मिट्टी में फसल के लिए पर्याप्त नमी है।

पानी की उपलब्धता- भूजल और सतही जल स्रोतों की स्थिति, जिसमें पीने के पानी और सिंचाई पर उनके असर शामिल हैं।

जमीनी स्तर पर जांच- अधिकारी प्रभावित इलाकों का दौरा कर सकते हैं और राहत तय करने से पहले फसल के नुकसान का ब्योरा तैयार कर सकते हैं।

पूरे राज्य को सूखाग्रस्त क्यों घोषित नहीं किया जाता?

अलग-अलग जगहों पर सूखे की स्थिति काफी अलग हो सकती है। एक ही राज्य में, एक तालुका में लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है और फसल को नुकसान हो सकता है, जबकि दूसरे में पर्याप्त बारिश हो सकती है। इसीलिए सूखे की जांच तालुका या स्थानीय स्तर पर की जा सकती है, न कि पूरे राज्य को एक साथ इसमें शामिल किया जाता है।

सूखा घोषित होने के बाद क्या होता है?

घोषणा के बाद तय राहत उपाय लागू किए जा सकते हैं। महाराष्ट्र में, इनमें फसल-ऋण का पुनर्गठन, जमीन के लगान में छूट, खेती के लिए बिजली में छूट, और पीने के पानी व चारे की व्यवस्था जैसे उपाय शामिल हैं। सूखा घोषित करना और फसल के नुकसान का व्यक्तिगत मुआवजा मिलना, जरूरी नहीं कि एक ही बात हो। महाराष्ट्र ने कहा है कि फसल के नुकसान के लिए मदद तय करने से पहले वह ज़मीनी स्तर पर फसल की जांच करेगा।

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