Shardiya Navratri 2026: नवरात्रि शुरू होने से पहले नोएडा के सेक्टर-21 मुख्य मार्ग पर मां दुर्गा और शेरावाली माता की मूर्तियां तैयार करने का काम तेजी से चल रहा है। सड़क के किनारे कई जगह झुग्गी झोपड़ी में कारीगर दिन-रात मूर्तियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। यहां धान की फसल से निकलने वाले अपशिष्ट यानी पराली, मिट्टी और बांस की मदद से मूर्तियों का ढांचा तैयार किया जा रहा है। इसके बाद मिट्टी लगाकर शरीर और चेहरे का आकार दिया जाता है। फिर रंग, कपड़े और श्रृंगार से मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है। मूर्तिकार विश्वजीत पिछले 12 साल से यह काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने यह हुनर अपने क्षेत्र से सीखने के बाद कोलकाता जाकर भी सीखा और अब खुद मूर्तियां तैयार करते हैं।
किसी मूर्ति के चेहरा का रूप देने में है सबसे बड़ी कला
एक मूर्ति को तैयार करने में करीब एक सप्ताह का समय लग जाता है। इसमें सबसे पहले ढांचा और फ्रेम तैयार किया जाता है। फिर घास बांधकर उसके ऊपर मिट्टी लगाई जाती है। इसके बाद चेहरे का काम, रंग-रोगन और अंतिम सजावट की जाती है। विश्वजीत ने MoneyControl हिंदी टीम को बताते हुए कहा कि मूर्ति का चेहरा तैयार करने के लिए सांचे का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अगर चेहरा उम्मीद के मुताबिक नहीं बनता तो उसे दोबारा तोड़कर तैयार करना पड़ता है। उनका कहना है कि मूर्ति को बेहतर रूप देने के लिए काफी सोच-समझकर काम करना पड़ता है। अलग-अलग कारखानों में मूर्तियों को अलग शैली और बेहतर फिनिश देने की कोशिश की जाती है।
1500 रूपये तक हर कमा लेते हैं मूर्तिकार
मूर्तिकारों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में मूर्ति बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमत बढ़ी है। विश्वजीत ने बताया कि जिस घास की कीमत पहले करीब 500 रुपये प्रति क्विंटल थी, वह अब करीब 1000 से 1500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। मिट्टी की कीमत भी बढ़ी है। पहले करीब 1000 रुपये में 15 बोरी मिट्टी मिल जाती थी। जबकि अब इसके लिए 2000 से 2500 रुपये देने पड़ते है। मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाला रंग, कपड़ा और श्रृंगार का सामान पश्चिम बंगाल से मंगाया जाता है। महंगे कच्चे माल के बीच कारीगरों की कमाई भी मौसम पर निर्भर है। विश्वजीत ने बताया कि उन्हें कारीगर के तौर पर करीब 1000 से 1500 रुपये प्रतिदिन मिल जाते हैं। लेकिन मूर्ति बनाने का काम मुख्य रूप से सीजन पर निर्भर रहता है।
शंकर अपने परिवार के साथ 20 साल से बना रहे हैं मूर्तियां
वहीं, शंकर पिछले करीब 20 साल से मूर्ति बनाने का काम कर रहे हैं। वह मूल रूप से राजस्थान जोधपुर जिले के रहने वाले हैं। वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर खुद मूर्तियां तैयार करते हैं। उनके मुताबिक 5 फीट की एक मूर्ति को बनाने में करीब 10 से 15 दिन तक लग सकते हैं, अगर पूरा ध्यान एक ही मूर्ति पर दिया जाए।
शंकर ने बताया कि नवरात्रि के लिए मूर्तियों की मांग काफी बढ़ गई है। ग्राहक नोएडा के अलग-अलग इलाकों के साथ दूर-दराज से भी यहां पहुंचते हैं। उनके मुताबिक इस सीजन में तैयार की गई ज्यादातर मूर्तियां बिक जाती हैं। हालांकि, बढ़ती लागत के बावजूद आमदनी इतनी नहीं है कि बड़ी बचत हो सके। उनका कहना है कि मूर्ति बनाने से बस बच्चों का पालन-पोषण और परिवार का गुजारा चल जाता है। कच्चे माल और मेहनत की लागत काफी बढ़ गई है। लेकिन उसके हिसाब से भुगतान नहीं बढ़ा है।
सौभाग्य के साथ जुड़ी है परिवारों की रोजी रोटी
नवरात्रि से पहले अब इन मूर्तिकारों के पास लगातार काम का दबाव है। कुछ कारीगरों ने नए ऑर्डर लेना बंद कर दिया है, क्योंकि पहले से मिले ऑर्डर को समय पर पूरा करना जरूरी है। सेक्टर-21 मुख्य मार्ग पर एक तरफ बांस और पराली से मूर्तियों के शुरुआती ढांचे तैयार हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ कई मूर्तियां पूरी तरह बनकर बिक्री के लिए तैयार खड़ी हैं। माता शेरावाली की इन मूर्तियों को नवरात्रि शुरू होने के साथ लोग अपने घरों और पूजा स्थलों के लिए खरीदकर ले जाएंगे।
इन मूर्तियों के पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि कारीगरों की कई दिनों की मेहनत और पूरे परिवार की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है। विश्वजीत के लिए भगवान की मूर्ति बनाना सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि सौभाग्य की बात है। उनका कहना है कि जिस भगवान ने इंसान को बनाया, उनका रूप बनाने का अवसर मिलना अपने आप में बहुत अच्छी और सौभाग्य वाली बात है।
(नोएडा से सुमित राजपूत की रिपोर्ट)