Repo Rate Hike : महंगाई बढ़ने के डर ने बढ़ाई चिंता, RBI को रेपो रेट में करनी पड़ सकती है 1-1.5% की बढ़ोतरी
Repo Rate Hike : सिस्टेमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि RBI का रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% करना और 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' की ओर बढ़ना, रेट-हाइक के एक नए दौर की शुरुआत है
सिस्टेमैटिक्स ने अपनी इस रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि महंगाई का लगातार बना दबाव और मॉनेटरी पॉलिसी को और सख्त करने से फाइनेंशियल मार्केट के लिए दोहरी चुनौती पैदा हो सकती है
Repo Rate Hike : हाल ही में जारी सिस्टेमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महंगाई का जोखिम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मौजूदा अनुमान से कहीं ज़्यादा है। आने वाली तिमाहियों में कीमतें बढ़ने से महंगाई दर 6-7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जिसके चलते आरबीआई को ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है।
इस रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि सेंट्रल बैंक के महंगाई के अनुमान, इनपुट लागत में बढ़ोतरी, परिवारों की महंगाई को लेकर ज़्यादा उम्मीदों और पूरी अर्थव्यवस्था में बढ़ती कीमतों के दबाव से जुड़े जोखिमों को कम करके आंकते हैं। अब आरबीआई का रुख सख्त होने के साथ,महंगाई के 6% के अनुमान से ऊपर जाने का काफी जोखिम दिख रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, RBI के परिवारों के बीच किए गए सर्वे से पता चलता है कि सितंबर 2026 में महंगाई को लेकर उम्मीदें औसतन 9.1% थीं,जो हेडलाइन महंगाई से काफी अधिक हैं और लगातार बढ़ रही हैं।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि RBI का महंगाई प्रसार सूचकांक (inflation diffusion index) यह संकेत देता है कि कीमतों में बढ़ोतरी और ज्यादा कैटेगरी में फैल रही है, जिससे पता चलता है कि महंगाई का दायरा बढ़ रहा है।
रिपोर्ट ने मांग और सप्लाई से जुड़े सीमित दबावों के बारे में RBI के आकलन पर सवाल उठाए गए् हैं। इसमें सेंट्रल बैंक के महंगाई के नज़रिए और मज़बूत घरेलू खपत, जबरदस्त निवेश और सप्लाई में लगातार आ रही रुकावटों को स्वीकार करने के साथ इनके बीच विसंगतियों की ओर भी इशारा किया गया है।
रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि आरबीआई ने एनर्जी की बढ़ती लागत का मुख्य कारण प्रतिकूल बेस इफेक्ट को बताया है,साथ ही साथ कमज़ोर दक्षिण-पश्चिम मानसून, अल नीनो की और अस्थिर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों से उत्पन्न सप्लाई की कमी के असर को भी इसका कारण माना है। भारतीय कंपनियों, विशेषकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बढ़ते लागत के दबाव को भी सप्लाई साइड महंगाई के लगातार बने रहने के प्रमाण के रूप में पेश किया गया है।
FY27 की पहली तिमाही में नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों की इनपुट लागत सालाना आधार पर लगभग 40 प्रतिशत बढ़ गई, साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में भी 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। ग्रॉस मार्जिन में 650-800 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आई क्योंकि कंपनियां लागत में हुई बढ़ोतरी का केवल कुछ हिस्सा ही ग्राहकों पर डाल पाईं।
रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि खाद्य, ऊर्जा और उर्वरकों पर सरकारी सब्सिडी और साथ ही तेल मार्केटिंग कंपनियों की अंडर-रिकवरी ने पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण होने वाली महंगाई के असर को कम किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे यह वित्तीय सहायता कम होगी,आने वाले महीनों में पाइपलाइन महंगाई के बढ़ने और मौजूदा तेजी में और इजाफा होने की संभावना है।
मॉनेटरी पॉलिसी के बारे में सिस्टेमैटिक्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि RBI का रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% करना और 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (सोच-समझकर सख्ती) की ओर बढ़ना, रेट-हाइक के एक नए दौर की शुरुआत है।
हालांकि, चेतावनी के लहजे में कहा गया है कि महंगाई को काबू में करने के लिए हालिया बढ़ोतरी शायद काफी न हो,खासकर इसलिए क्योंकि महंगाई की ऊंची उम्मीदों के मुकाबले असल ब्याज दरें (real interest rates) निगेटिव बनी हुई हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि आने वाली तिमाहियों में महंगाई उम्मीद से ज़्यादा बढ़कर 6-7% तक पहुंच सकती है। कम से कम 1% की असल ब्याज दर (real rate) बहाल करने के लिए और बढ़ोतरी की जरूरत होगी और रेपो रेट को 6.5-7% तक ले जाना होगा, यानी इसको मौजूदा 5.5% से 100-150 बेसिस पॉइंट (1 से 1.5%) ज्यादा बढ़ाना होगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर 7.8% की ग्रोथ के बाद, RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया है।
साथ ही,सेंट्रल बैंक ने महंगाई के अपने अनुमान को बढ़ा दिया है। उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 की तीसरी तिमाही में महंगाई 6 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी, जबकि पहले यह अनुमान 5.9 प्रतिशत था।
सिस्टेमैटिक्स ने अपनी इस रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि महंगाई का लगातार बना दबाव और मॉनेटरी पॉलिसी को और सख्त करने से फाइनेंशियल मार्केट के लिए दोहरी चुनौती पैदा हो सकती है। ऊंची ब्याज दरों का असर इक्विटी वैल्यूएशन पर पड़ेगा, जबकि इनपुट कॉस्ट और कर्ज लेने की लागत बढ़ने से कंपनियों की कमाई पर दबाव पड़ेगा।
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि बेंचमार्क 10-ईयर सरकारी बॉन्ड यील्ड,जो अभी लगभग 7.24 प्रतिशत है,7.5 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। महंगाई उम्मीद से ज्यादा होने इससे निपटने के लिए RBI द्वारा ब्याज दरें बढ़ाना जारी रखने से ऐसा हो सकता है।