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'काम छोड़ने की सोच रहा था, तभी हो गया चमत्कार!' काशी की 400 साल पुरानी कला के मुरीद हुए US, कनाडा और सिंगापुर

Varanasi Gulabi Meenakari Handicraft: वाराणसी की 400 साल पुरानी विश्व प्रसिद्ध 'गुलाबी मीनाकारी' कला का डंका अब अमेरिका, कनाडा और सिंगापुर जैसे देशों में बज रहा है। एक समय काम बंद करने की कगार पर पहुंचे बनारस की गलियों के कारीगर अब सीधे एक्सपोर्टर बन चुके हैं और हर महीने ₹20 लाख से ज्यादा के विदेशी ऑर्डर पूरे कर रहे हैं। जानिए कैसे 400 डिग्री सेल्सियस पर तैयार होने वाली यह जीआई-टैग कला काशी के युवाओं के लिए रोजगार का नया जरिया बन गई है

Edited By: Abhishek Guptaअपडेटेड Sep 25, 2026 पर 5:15 PM
'काम छोड़ने की सोच रहा था, तभी हो गया चमत्कार!' काशी की 400 साल पुरानी कला के मुरीद हुए US, कनाडा और सिंगापुर
वाराणसी के कई हस्तशिल्पियों की कलाकारी का डंका विदेशों में बज रहा है

Gulabi Meenakari Handicraft: वाराणसी के कई हस्तशिल्पियों की कलाकारी का डंका विदेशों में बज रहा है। मुगलों के जमाने की 400 साल पुरानी कलाकारी भी उनमें से एक है। बीते कुछ सालों से यूएस, कनाडा, सिंगापुर जैसे देशों में अचानक गुलाबी मीनाकारी की डिमांड बढ़ गई है। बनारस की गलियों में रहने वाले हस्तशिल्पी अब एक्सपोर्टर बनकर अपने इन हैंडीक्राफ्ट्स को विदेशों में बेच रहे हैं। हर महीने करीब 20 लाख से ज्यादा के ऑर्डर अलग-अलग कारीगरों के पास आ रहे हैं, जिससे इन कारीगरों के अच्छे दिन आ गए हैं।

हाल के दिनों में गुलाबी मीनाकारी से बने चेस सेट का ऑर्डर गाय घाट इलाके में रहने वाले आर्टिजन रमेश कुमार विश्वकर्मा को मिला। चेस सेट के अलावा गुलाबी मीनाकारी की ज्वेलरी और लक्ष्मी-गणेश की खूबसूरत प्रतिमा की डिमांड भी विदेशों में है। नेशनल अवार्डी रमेश विश्वकर्मा ने बताया कि 2014 से पहले काशी की इस कलाकारी से जुड़े आर्टिजन के पास न तो ऑर्डर थे और न ही बाजार में उनके बनाए प्रोडक्ट की डिमांड थी। जो कारीगर पीढ़ियों से इस काम को कर रहे थे, वे भी इसे छोड़कर दूसरे कामों में जुट गए थे। मेरा हौसला भी टूट रहा था। लेकिन जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काशी के सांसद बने, उन्होंने इस आर्ट को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। वे हम आर्टिजन के भगवान से कम नहीं हैं।

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