देहरादून जू में इन दिनों दुर्लभ सफेद बाघ लाया गया है। ढाई साल का (छोटा शावक) तेजस ग्वालियर से लंबा सफर तय करके यहां पहुंचा है। तेजस को एनिमल एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत देहरादून लाया गया है। इसके बदले करीब पांच साल के रॉयल बंगाल टाइगर भोला को ग्वालियर जूलॉजिकल पार्क भेजा गया। तेजस ने ग्वालियर से देहरादून तक करीब 550 किलोमीटर का सफर तय किया। उसके साथ 13 सदस्यों की एक खास पशु चिकित्सा टीम भी मौजूद थी।
नए बाडे में पहुंचते ही एक्टिव हुआ तेजस
देहरादून पहुंचते ही तेजस ने अपने नए बाडे को देखना और समझना शुरू कर दिया। उसने आसपास की जगह देखी, हवा सूंघी और बाडे के किनारे घूमता रहा। क्वारंटीन पूरा होने के बाद टूरिस्ट को तेजस के साथ आम रंग वाले रॉयल बंगाल टाइगर को भी अलग-अलग बाडों में देखने का मौका मिल सकता है। इससे लोग बाघों के अलग-अलग कलर और नेचुरल डाइवर्सिटी को पास से देख सकेंगे।
नीली आंखों की वजह से दिखता है खास
तेजस का सफेद रंग, गहरी धारियां और नीली आंखें उसे अलग रूप देते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सफेद बाघ कोई अलग प्रजाति नहीं है। इसका सफेद रंग एक जेनेटिक म्यूटेशन की वजह से होता है। इसे एल्बिनो यानी पूरी तरह रंगहीन भी नहीं माना जाता।
14 घंटे से ज्यादा के सफर के बाद तेजस को करीब 20 दिनों के लिए क्वारंटीन और निगरानी में रखा गया है। इस दौरान उसकी सेहत, खाना-पीना, व्यवहार और नए बाडे में ढलने की प्रक्रिया पर नजर रखी जाएगी। क्वारंटीन पूरा होने के बाद ही उसे लोगों के देखने के लिए रखा जाएगा। इसलिए टूरिस्ट को जू की ओर से आधिकारिक जानकारी मिलने तक इंतजार करना होगा।
देहरादून जू क्यों है खास?
देहरादून जू को पहले मालसी डियर पार्क के नाम से जाना जाता था। यह मसूरी रोड पर शिवालिक रेंज की तलहटी में बना है और इसे मिनी जूलॉजिकल पार्क के तौर पर डेवलप किया गया है।
यह देहरादून के क्लॉक टावर से करीब 9-10 KM दूर मसूरी जाने वाले रास्ते पर पड़ता है। यहां आने वाले टूरिस्ट अक्सर मसूरी, हरिद्वार और ऋषिकेश भी जाते हैं।