Rupee vs Dollar: रुपये को संभालने के लिए RBI के 5 बड़े कदम, क्या अब गिरावट पर लगेगी लगाम?
Rupee vs Dollar: डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI ने पांच बड़े कदम उठाए हैं। तेल कंपनियों को सीधे डॉलर देने से लेकर करेंसी सौदों पर सख्ती तक, इन फैसलों का मकसद बाजार में डॉलर की मांग घटाना है। लेकिन क्या महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच रुपया संभल पाएगा? पूरी तस्वीर विस्तार से समझिए।
साल 2026 की शुरुआत से अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले 7 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है।
Rupee vs Dollar: डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। इसे संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक ने करेंसी में सट्टेबाजी पर लगाम लगाई है। वहीं, तेल कंपनियों को सीधे डॉलर देने का फैसला भी किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन कदमों से रुपये की गिरावट रुक जाएगी?
साल 2026 की शुरुआत से अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले 7 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है। शुक्रवार को यह गिरकर 96.96 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। इसके बाद RBI ने तुरंत कदम उठाए।
आखिर RBI ने क्या किया है? इन फैसलों से रुपये को कैसे मदद मिलेगी? और क्या रुपया 97 प्रति डॉलर के पार जाने से बच सकता है? आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।
RBI ने क्या 5 कदम उठाए हैं?
RBI ने रुपये पर दबाव कम करने के लिए पांच बड़े फैसले लिए हैं।
पहला, 12 अक्टूबर से सरकारी तेल कंपनियों को सीधे डॉलर देने की व्यवस्था शुरू की गई है। इसके लिए एक खास विंडो बनाई गई है।
दूसरा, करेंसी में होने वाले कुछ सौदों के नियम सख्त कर दिए गए हैं। जिन सौदों के पीछे विदेशी मुद्रा की वास्तविक जरूरत नहीं है, उनकी सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी गई है।
तीसरा, बैंकों को कुछ बड़े करेंसी सौदों के लिए RBI के पास अतिरिक्त पैसा रखना होगा। इस व्यवस्था को फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) कहा जाता है।
चौथा, 16 अक्टूबर से बैंकों को हर दिन अपने तय कैश रिजर्व रेशियो (CRR) का कम से कम 99 फीसदी बनाए रखना होगा। अभी तक यह सीमा 90 फीसदी थी।
पांचवां, RBI ने 13 अक्टूबर को 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है। इससे बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त पैसा बाहर निकालने में मदद मिलेगी।
इन फैसलों के साथ RBI की कोशिश है कि बाजार में डॉलर की मांग घटे। साथ ही, रुपये के कमजोर होने पर दांव लगाने वालों के लिए ऐसा करना महंगा हो जाए।
FCNR स्कीम से कितनी राहत मिली थी?
इससे पहले RBI ने जून में विदेशों में रहने वाले भारतीयों से डॉलर जुटाने के लिए एक खास स्कीम शुरू की थी। इसके तहत करीब 143 अरब डॉलर जुटाए गए। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 100 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।
लेकिन यह राहत ज्यादा दिन नहीं चली। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से रुपये पर दबाव बना रहा। नोमुरा का अनुमान है कि सितंबर की शुरुआत में यह स्कीम बंद होने के बाद विदेशी मुद्रा भंडार करीब 43 अरब डॉलर घट गया।
एमके ग्लोबल का कहना है कि इस स्कीम से बाजार में रुपये की उपलब्धता बढ़ गई थी। इससे ट्रेडर्स के लिए रुपये में गिरावट पर दांव लगाना सस्ता हो गया। इसके अलावा, FCNR डिपॉजिट से मिला पैसा हमेशा के लिए बैंकों के पास नहीं रहेगा। उन्हें आगे चलकर यह रकम ब्याज के साथ लौटानी होगी।
तेल कंपनियों को सीधे डॉलर मिलेंगे
भारत की सरकारी तेल कंपनियों को कच्चा तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर चाहिए। अभी वे बाजार से डॉलर खरीदती हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है। अब ये कंपनियां तय बैंकों के जरिए सीधे RBI से डॉलर ले सकेंगी। इससे उन्हें खुले बाजार से कम डॉलर खरीदने पड़ेंगे।
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस व्यवस्था से हर महीने 9 अरब से 11 अरब डॉलर की मांग खुले बाजार से हट सकती है। इससे रुपये को कुछ राहत मिल सकती है।
करेंसी में सट्टेबाजी करना होगा मुश्किल
RBI ने कुछ ऐसे सौदों की सीमा घटा दी है, जिनके पीछे विदेशी मुद्रा की वास्तविक जरूरत नहीं होती। पहले ऐसे सौदों की सीमा 10 करोड़ डॉलर थी। अब इसे घटाकर 50 लाख डॉलर कर दिया गया है।
इसका मतलब है कि बड़े सौदे करने वालों को अब यह बताना होगा कि उन्हें वास्तव में विदेशी मुद्रा की जरूरत क्यों है। इससे रुपये की गिरावट पर बड़े दांव लगाना मुश्किल हो सकता है।
डॉलर से जुड़े सौदे महंगे होंगे
RBI ने बैंकों के लिए एक और नियम बनाया है। अब कुछ बड़े विदेशी मुद्रा सौदों पर बैंकों को 20 फीसदी रकम अतिरिक्त रिजर्व के तौर पर रखनी होगी। यह नियम 20 लाख डॉलर से ज्यादा के तय दायरे वाले सौदों पर लागू होगा। उदाहरण के लिए, अगर किसी बैंक का ऐसा सौदा 100 करोड़ रुपये का है, तो उसे 20 करोड़ रुपये अलग रखने होंगे।
एमके ग्लोबल का अनुमान है कि इससे करेंसी की हेजिंग करीब 1.3 से 1.5 फीसदी महंगी हो सकती है। हेजिंग का मतलब है कि कंपनियां रुपये और डॉलर की कीमत में होने वाले बदलाव से अपने नुकसान को कम करने की कोशिश करती हैं। एमके के मुताबिक, इस फैसले से बैंकिंग सिस्टम में 45,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपये तक की नकदी भी कम हो सकती है।
बैंकों के लिए पैसा जुटाना महंगा हो सकता है
अब बैंकों को हर दिन अपने तय CRR का कम से कम 99 फीसदी बनाए रखना होगा। पहले उन्हें 90 फीसदी रकम रखना जरूरी था। इसका मतलब है कि बैंकों को अपने पैसे का इस्तेमाल करने की आजादी कुछ कम मिलेगी। रुपये उधार लेकर करेंसी में सट्टेबाजी करने वालों के लिए भी लागत बढ़ सकती है।
इसके अलावा, RBI 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचेगा। इससे बाजार में मौजूद अतिरिक्त पैसा वापस खींचने में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर, RBI डॉलर की मांग घटाना चाहता है। साथ ही, वह रुपये के खिलाफ सट्टेबाजी को महंगा बनाना चाहता है।
RBI ने अभी ये कदम क्यों उठाए?
RBI के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली है कच्चे तेल की महंगी कीमतें। दूसरी है विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना। भारत अपनी जरूरत का काफी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसके लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है।
दूसरी तरफ, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और बेहतर रिटर्न मिलने से निवेशकों का पैसा अमेरिकी बाजारों की ओर जा रहा है। इसका असर भारत में डॉलर की उपलब्धता पर पड़ता है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है और उपलब्धता कम होती है, तो रुपये पर दबाव बढ़ जाता है।
8 अक्टूबर को भारत और अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड का अंतर घटकर करीब 194 बेसिस पॉइंट रह गया था। यह करीब 22 साल का निचला स्तर था।
क्या रुपये को मजबूती मिलेगी?
RBI के इन फैसलों से बाजार में डॉलर की मांग कम हो सकती है। इससे रुपये में अचानक होने वाली बड़ी गिरावट को रोकने में मदद मिल सकती है।
इन उपायों के बाद शुरुआती कारोबार में रुपये में करीब 1 फीसदी की तेजी आई। शुक्रवार, 9 अक्टूबर को रुपया 96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 95.77 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा था।
हालांकि, सिर्फ एक दिन की तेजी से यह नहीं कहा जा सकता कि रुपये की गिरावट रुक गई है। आगे रुपये की चाल कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के रुख और बाजार में डॉलर की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?
RBI के फैसलों से उन कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है, जो विदेशों से सामान खरीदती हैं। इनमें मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चा माल आयात करने वाली कंपनियां शामिल हैं। ऐसी कंपनियां डॉलर की कीमत में होने वाले बदलाव से बचने के लिए हेजिंग करती हैं।
लेकिन अगर हेजिंग महंगी हो जाती है, तो उन्हें इसके लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। कुछ कंपनियां हेजिंग कम कर सकती हैं। कुछ छोटी अवधि के सौदे कर सकती हैं। इससे फिलहाल फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर की मांग घट सकती है।
आगे RBI के सामने क्या चुनौती है?
RBI के कदम रुपये को कुछ समय के लिए राहत दे सकते हैं। लेकिन रुपये की कमजोरी की असली वजहें अभी बनी हुई हैं। कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहीं, विदेशी निवेशक पैसा निकालते रहे और भारत को निर्यात से कम डॉलर मिले, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
एमके का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल बनी रहती है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का चालू खाता घाटा GDP के 1.6 से 1.7 फीसदी तक पहुंच सकता है। चालू खाता घाटा तब होता है, जब देश के विदेशी लेनदेन में कमाई के मुकाबले खर्च ज्यादा होता है। ऐसे में डॉलर की जरूरत बढ़ सकती है।
क्या RBI रुपये को $95 तक ला पाएगा?
RBI के नए कदम रुपये को कुछ समय के लिए 95 प्रति डॉलर के आसपास संभालने में मदद कर सकते हैं। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि रुपया लंबे समय तक इसी स्तर पर बना रहेगा।
एमके के मुताबिक, RBI की नेट शॉर्ट फॉरेन एक्सचेंज फॉरवर्ड पोजिशन 200 अरब डॉलर से ज्यादा हो गई है। आसान भाषा में कहें तो केंद्रीय बैंक के ऐसे सौदे बड़ी मात्रा में हैं, जिनका निपटारा भविष्य में करना होगा। कुछ सौदों को आगे बढ़ाया जा सकता है या दूसरे सौदों से उनका असर संतुलित किया जा सकता है।
इसलिए सिर्फ करेंसी बाजार पर पाबंदियां लगाने से रुपये को लंबे समय तक संभालना मुश्किल होगा। इसके लिए डॉलर की मांग और उपलब्धता के बीच संतुलन बनना भी जरूरी है।
आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
अगर रुपये की गिरावट धीमी पड़ती है, तो विदेशों से आने वाले सामान की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इससे आयातित महंगाई को काबू में रखने में मदद मिलेगी। कच्चे तेल की कीमतें पहले से ऊंची हैं। ऐसे में रुपया ज्यादा कमजोर होने पर तेल आयात का खर्च और बढ़ सकता है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों और दूसरी चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
आखिर में, अर्थव्यवस्था पर इन फैसलों का कितना असर होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि RBI को ये पाबंदियां कितने समय तक जारी रखनी पड़ती हैं। साथ ही, कच्चे तेल की कीमतें घटती हैं या नहीं और विदेशी निवेशकों का रुख बदलता है या नहीं, यह भी अहम होगा।