FD Calculator: शेयर बाजार में लगातार गिरावट से लोगों की दिलचस्पी बैंकों की फिक्स्ड डिपॉजिट स्कीम में बढ़ रही है। ऐसे लोगों के लिए अच्छी खबर है। इंडियन बैंक ने अपने खास डिपॉजिट स्कीम में इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का ऐलान किया है। इंडियन बैंक सरकार का बैंक है। इसने इस महीने की शुरुआत में आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने के बाद इंटरेस्ट रेट बढ़ाया है। आम तौर पर बैंक आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने पर डिपॉजिट और लोन के इंटरेस्ट रेट में इजाफा करते हैं।
स्कीम का इंटरेस्ट बढ़कर 6.75 फीसदी हुआ
इस स्कीम का नाम Ind Prosper है। इंडियन बैंक ने इस स्कीम का इंटरेस्ट रेट 15 बेसिस प्वाइंट्स बढ़ाया है। यह स्कीम 777 दिन की है। इस स्कीम का इंटरेस्ट रेट अब 6.60 फीसदी से बढ़कर 6.75 फीसदी हो गया है। इसका मतलब है कि अब डिपॉजिटर्स को इस स्कीम में पहले के मुकाबले ज्यादा इंटरेस्ट मिलेगा।
10 लाख डिपॉजिट पर 1,43,774 रुपये इंटरेस्ट
अगर 10 लाख रुपये आप इस 777 दिन की स्कीम में रखते हैं तो 6.75 इंटरेस्ट रेट से मैच्योरिटी पर आपको 11,43,774 रुपये मिलेंगे। इसमें 1,43,774 रुपये की इंटरेस्ट इनकम शामिल हैं। यह कैलकुलेशन साधारण ब्याज के आधार पर किया गया है। अगर बैंक हर तिमाही इंटरेस्ट देता है तो मैच्योरिटी अमाउंट बढ़कर 11.52 लाख रुपये हो जाएगा।
सीनियर सिटीजंस को 0.50 फीसदी ज्यादा इंटरेस्ट
इंडियन बैंक की इस स्कीम में सीनियर सिटीजंस को 0.50 फीसदी ज्यादा इंटरेस्ट मिलेगा। इसका मतलब है कि सीनियर सिटीजंस को इस स्कीम में सामान्य डिपॉजिटर्स से ज्यादा इंटरेस्ट मिलेगा। अगर कोई सीनियर सिटीजन 777 दिन की इस एफडी स्कीम में पैसा लगाता है तो उसे 7.25 इंटरेस्ट रेट से मैच्योरिटी पर 11,59,247 रुपये मिलेंगे। इसमें इंटरेस्ट का 1,59,247 रुपये शामिल है। यह कैलकुलेशन साधारण ब्याज के आधार पर किया गया है। अगर बैंक हर तिमाही इंटरेस्ट रेट का पेमेंट करता है तो मैच्योरिटी अमाउंट बढ़कर करीपब 11.60 लाख रुपये हो जाएगा।
इंटरेस्ट पर स्लैब के हिसाब से टैक्स चुकाना होगा
एफडी पर मिलने वाले इंटरेस्ट पर इनवेस्टर के टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। दरअसल, इंटरेस्ट से हुई इनकम को दूसरे स्रोत से हुई इनकम माना जाता है। इसे इनवेस्टर की इनकम में जोड़ दिया जाता है। फिर, वह जिस टैक्स स्लैब में आता है, उसके हिसाब से इस पर टैक्स लगता है। ज्यादा टैक्स स्लैब में आने वाले लोगों को इंटरेस्ट पर ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ता है। कम टैक्स स्लैब में आने वाले इनवेस्टर्स को कम टैक्स चुकाना पड़ता है।