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by Roopali Sharma | OCT 17,  2025

दिवाली पर पटाखे फोड़ने की क्यों है परंपरा?

दिवाली पर पटाखे जलाने की परंपरा काफी पुरानी है, और इसकी जड़ें धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं में गहराई से जुड़ा हैं.

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स्कंद पुराण में उल्का का उल्लेख है, जिसे हाथ में लेकर दीपोत्सव मनाने की बात कही गई है.

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उल्का के साथ दीपोत्सव

कार्तिक महीने में पितर वापस लौटते हैं, उनके मार्ग को रोशन करने के लिए दीपक जलाए जाते थे.

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पूर्वजों को मार्ग दिखाना

पटाखों की तेज़ आवाज बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है

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आवाज से बुरी आत्माओं को भगाना

पटाखों की गूंज से नकारात्मक शक्तियों और बुरी आत्माओं का नाश होता है

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नकारात्मक शक्तियों का नाश

पटाखों को रोशनी पितरों को उनके लोक में वापस जाने का मार्ग दिखाती हैं

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पितरों की विदाई का प्रतीक

पटाखों में इस्तेमाल होने वाले सल्फर से कीड़े-मकोड़ों नष्ट होते थे, जिससे वातावरण शुद्ध होता था

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कीटनाशक के रूप में

पटाखे और आतिशबाजी उत्सव का माहौल बनाते हैं और लोगों में का संचार करते हैं

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उल्लास और खुशी का संचार

पटाखे भारतीय संस्कृति और दिवाली की पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बन गए हैं.

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सांस्कृतिक पहचान

उल्का और मशाल से शुरू हुआ यह सफर आज बारूद वाले पटाखों तक पहुंच गया है.

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