5 दिन जॉब और वीकेंड पर लाजवाब मटन बेच महीने के लाखों कमा रहे टेकी, 5 करोड़ का ठुकराया ऑफर

laham: इन दिनों नोएडा में 2 आईटी प्रोफेशनल चर्चा का विषय बने हुए हैं। दोनों वीकेंड में अपना फूड कार्ट लगाते हैं, जिसका नाम है laham। नॉनवेज लवर्स की भीड़ यहां देखते बनती है।

अपडेटेड Nov 02, 2026 पर 3:26 PM
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'लहम' (Laham) अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'मांस'। यह डिश कुमार की पसंदीदा डिश में से एक, 'लहम चरसी' से प्रेरित है।

laham: एक टेक प्रोफेशनल (techie) अपने फूड कार्ट पर लगभग तीन घंटे तक लगातार खड़ा रहा था। उसका इकलौता आइटम 'नमकीन गोश्त' पूरी तरह बिक चुका था, लेकिन कई ग्राहक खाली हाथ घर लौट गए। एक समय तो उसके चारों ओर लोगों की भीड़ जमा हो गई, जो किसी तरह अपना हिस्सा पाना चाहते थे।

यह कहानी 'लहम' (Laham) की है - एक फूड कार्ट जिसे दो प्रोडक्ट मैनेजरों ऋषभ कुमार और शशिकांत सिंह ने शुरू किया है। नोएडा की एक मार्केट लेन में आते ही कुछ ही दिनों में यह बहुत मशहूर हो गया। कुमार और सिंह हफ्ते के पांच दिन कॉर्पोरेट जॉब करते हैं और अपना वीकेंड इस फूड कार्ट को देते हैं।

कुमार का कहना है कि यह नोएडा के किसी भी अन्य फूड कार्ट से बिल्कुल अलग है। नोएडा के स्ट्रीट फूड में लिट्टी-चोखा से लेकर सुशी तक सब कुछ देखने को मिल जाता है। 'लहम' (Laham) में सिर्फ एक ही डिश मिलती है- मालाबार कॉइन पराठों पर परोसा गया 'नमकीन गोश्त'। यह तीन अलग-अलग कीमतों और मात्राओं में उपलब्ध है - हाफ (दो पराठे) 159 रुपये में, फुल (चार पराठे) 279 रुपये में, और लार्ज (छह पराठे) 399 रुपये में। जब मुख्य डिश खत्म हो जाती है, तो वे ग्राहकों की इच्छा पूरी करने के लिए ग्रेवी (जिसमें कीमा बनाया हुआ मटन होता है) भी देते हैं।


इसका स्वाद 'लहम' नाम की तरह ही एकदम सीधा-सादा था - रसीला और बिना किसी तामझाम के। इसमें घर के खाने जैसा सुकून था, जहां मसालों के बजाय मटन का स्वाद उभर कर आता है। यही एक कारण है कि यह फूड कार्ट इतना वायरल हो रहा है।

'लहम' (Laham) अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'मांस'। यह डिश कुमार की पसंदीदा डिश में से एक, 'लहम चरसी' से प्रेरित है। यह पाकिस्तान के पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा की एक स्ट्रीट-स्टाइल मीट डिश है, जिसमें बहुत कम मसालों का इस्तेमाल होता है।

कुमार, जो इस फूड कार्ट के मुख्य रसोइए (हेड कुक) भी हैं, बताते हैं, "लहम चरसी मेरी पसंदीदा डिश है। मैंने इसे पहली बार हैदराबाद में चखा था। मुझे 'लहम' शब्द भी बहुत पसंद है। जब कोई कहता है कि 'चलो लहम चलते हैं', तो यह सुनने में काफी अच्छा लगता है।"

उन्होंने बताया कि इसके पीछे का विचार यह है कि "एक पूरा भोजन, लेकिन छोटे-छोटे टुकड़ों (बाइट-साइज पोर्शन) में हो, जिसे सड़क पर खड़े होकर खाना आसान हो।" यहां की चर्चा सिर्फ इन्फ्लुएंसर्स तक ही सीमित नहीं है, जो इस सीजन की अपनी नई पसंदीदा जगह पर उमड़ रहे हैं और लगातार रील्स बना रहे हैं। 'लहम' की शुरुआत 5 सितंबर को हुई थी और कुमार के अनुसार, पहले ही महीने में इसने 6 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया। यह कुल रेवेन्यू है, न कि मुनाफा। उन्होंने बताया कि बिजनेस नेट प्रॉफिट में तो है, लेकिन लगभग सारा मुनाफा वापस बिजनेस में ही लग जाता है।

5 दिन डेस्क पर, 2 दिन कार्ट पर

कुमार और सिंह बेंगलुरु में सहकर्मी थे और इस साल की शुरुआत में नोएडा आ गए। प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर वे 'लहम' (Laham) को एक प्रोडक्ट की तरह चलाते हैं, जिसमें काम का बंटवारा बिल्कुल साफ है। कुमार ने बताया, "मैं प्रोडक्ट, कुकिंग, मार्केटिंग और कंटेंट देखता हूं। शशि फाइनेंस, ऑपरेशंस और प्रोक्योरमेंट (सामान की खरीद) संभालते हैं। हम प्रोडक्ट मैनेजर हैं, इसलिए हम समझते हैं कि ये सब कैसे काम करता है और चीजों को बेहतर तरीके से कैसे व्यवस्थित किया जाए।"

हफ्ते के दिन ऑफिस के लिए होते हैं। काम के बाद दोनों बैठकर बिजनेस के बारे में चर्चा करते हैं। शुक्रवार का दिन प्लानिंग, कच्चा माल जुटाने और वेंडर्स से बात करने के लिए होता है। इसके बाद वीकेंड शुरू हो जाता है।

कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा- "शनिवार और रविवार को हम लगभग सो ही नहीं पाते। हम रात 11 या 11:30 बजे के आसपास काम बंद करते हैं। फिर हमें सारा सामान वापस क्लाउड किचन में रखना होता है। इसमें रात के 2 बज जाते हैं। इसके बाद दिन की तैयारी शुरू करने के लिए हमें सुबह 7 या 8 बजे फिर से उठना पड़ता है।"

उन्होंने बताया कि उनके सहकर्मियों को इस बारे में पता है और उन्हें इस पर "बहुत गर्व" है। कुछ लोग कार्ट पर खाना खाने आए और उन्होंने सोशल मीडिया पर स्टोरी भी लगाई। ऑफिस के लोग अब उन्हें पहचानने लगे हैं और पूछते हैं, "क्या आप लहम से हैं?" फिर भी वह नहीं चाहते कि उनके मौजूदा एम्प्लॉयर (कंपनी) का नाम सामने आए। उन्होंने अपनी पिछली नौकरी में देखा था कि कैसे एक 'साइड हसल' (अतिरिक्त काम) की वजह से सहकर्मियों का आपके बारे में बात करने का नजरिया बदल जाता है। वह नहीं चाहते कि ऑफिस में वह चर्चा का विषय बनें।

इस वायरल होने के पीछे लगभग दो साल की सोच-विचार और महीनों की तैयारी थी - जैसे कि लोगो, कार्ट (ठेले) का डिजाइन, मेन्यू और जरूरी सामान का इंतजाम। कुमार लगभग नौ साल से खाना बना रहे हैं। उन्होंने कुछ बातें अपने माता-पिता से सीखीं और बाकी चीजें यूट्यूब वीडियो देखकर और कई प्रयोग करके सीखीं।

कुमार बताते हैं- "जब मैं बेंगलुरु में काम कर रहा था तो मेरा विचार कुछ ऐसा परोसने का था जो लोगों को आसानी से न मिल रहा हो, जो उस इलाके के लिए नया हो। उस समय वहां चंपारण मटन या यूपी-स्टाइल मटन और चिकन बहुत आम नहीं थे। इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न इसी से शुरुआत की जाए। लेकिन फिर मुझे अपनी नौकरी बदलनी पड़ी और मैं नोएडा आ गया। नोएडा में तो सब कुछ मिल जाता है। लेकिन 'नमकीन गोश्त' एक ऐसी डिश है जिसे मैंने सबसे पहले बेंगलुरु में बनाया था, और मुझे लगा कि यह बहुत ही अनोखी चीज है। मैंने इसे कहीं और परोसे जाते हुए नहीं देखा। इसलिए जब मैं नोएडा आया तो मैंने इसे फिर से बनाया और अपने दोस्तों को खिलाया। सबको यह बहुत पसंद आया। इसलिए मैंने इसी से शुरुआत करने का फैसला किया।"

सिर्फ फूड कार्ट क्यों?

कुमार कहते हैं- "मैं दो चीजें अच्छे से समझता हूं- फैशन और खाना।" उनके इंस्टाग्राम हैंडल पर 14,000 फॉलोअर्स हैं, जहां वे ज्यादातर अपने कपड़ों (आउटफिट्स) की तस्वीरें शेयर करते हैं। वे कहते हैं- "फैशन के लिए काफी पूंजी चाहिए, जबकि खाने-पीने का काम बहुत कम निवेश के साथ शुरू किया जा सकता है।"

उन्होंने और सिंह ने 35,000 रुपये से शुरुआत की, जो कार्ट, लाइट, शुरुआती खाना पकाने का सामान और उपकरणों पर खर्च हुए। उन्होंने सबसे पहले सिंह के किराए के अपार्टमेंट में खाना बनाना शुरू किया, लेकिन जब मकान मालिक ने कमर्शियल कुकिंग पर आपत्ति जताई तो वे एक क्लाउड किचन में शिफ्ट हो गए। नोएडा आने के तुरंत बाद ही उन्होंने प्लानिंग शुरू कर दी थी, लेकिन तभी सावन का महीना आ गया, जब नॉर्थ भारत में बहुत से लोग मांस नहीं खाते हैं।

कुमार बताते हैं- "हमने उस महीने का इस्तेमाल हर चीज की प्लानिंग करने में किया - कार्ट के डिजाइन से लेकर मार्केटिंग, ब्रांड लोगो, और रेसिपी को एकदम परफेक्ट बनाने तक। और फिर वह दिन आ ही गया। हमने 5 सितंबर को शुरुआत की।" 'लाहम' (Laham) की हालिया रील के अनुसार, उन्होंने काम को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करने के लिए चैटजीपीटी (ChatGPT) की भी मदद ली।

'टोकन नंबर्स' के पीछे की टीम

'लाहम' मुख्य रूप से चार लोगों की टीम है- कुमार, सिंह, कुमार की बहन प्रियंका (जो खाना पकाने में मदद करती हैं) और उनके बचपन के दोस्त अर्पित सिंह (जो कामकाज संभालते हैं)। कॉलेज के एक दोस्त रचित बिलिंग का काम देखते हैं और अन्य दोस्त व साथी तैयारी और पैकेजिंग में मदद करते हैं।

कुमार बताते हैं- "मुझे अपनी ज़िंदगी में बहुत अच्छे दोस्त मिले हैं। शशि और मैं इसके मुख्य सदस्य हैं। मेरी बहन बहुत अच्छा खाना बनाती हैं। मैंने उन्हीं से खाना बनाना सीखा है। वह पूरी तैयारी में मदद करती हैं और अब किचन का काम भी वही संभालती हैं। मैं बस जाकर खाना बनाता हूं, जिससे मेरा समय बच जाता है।"

वे आगे कहते हैं- "हमने अपनी बहन और अर्पित को भी टीम में शामिल किया है और हम उन्हें इसके लिए भुगतान भी करेंगे। मुझे बिजनेस और खाने की गुणवत्ता को लेकर उन पर पूरा भरोसा है।" वे कामकाज में मदद के लिए कुछ और लोगों को भी काम पर रखने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इतनी बड़ी मांग को संभालने के लिए छोटी टीम काफी नहीं है।

2.5 किलो से 25 किलो तक का सफर

कुमार याद करते हुए बताते हैं- "हम ग्राहकों के पास जाकर उन्हें बता रहे थे कि हम क्या बेच रहे हैं, क्योंकि हमारा कॉन्सेप्ट बिल्कुल अलग था। मेरा पहला ग्राहक नशे की हालत में था। उसने एक प्लेट चखी और फिर उसे इतना पसंद आया कि उसने एक और 'एक्स्ट्रा-लार्ज' प्लेट का ऑर्डर दे दिया। इससे मेरा आत्मविश्वास थोड़ा बढ़ा।" उस दिन उन्होंने 25 प्लेटें बेचीं। दूसरे दिन 35 प्लेटें बिकीं। 'लाहम' की शुरुआत 2.5 किलो मटन से हुई थी। अब वे 25 किलो मटन परोस रहे हैं और इसे और बढ़ाने की योजना है। कुमार का कहना है कि काम का दायरा बढ़ने के बावजूद स्वाद में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि उन्होंने हर सामग्री की मात्रा तय कर रखी है- "इसलिए स्वाद हमेशा एक जैसा ही रहता है।"

5 करोड़ रुपये का ऑफर

'लहम' (Laham) को दिल्ली के सबसे बड़े फूड फेस्टिवल में से एक 'हॉर्न ओके प्लीज' (Horn Ok Please) और दुर्गा पूजा के पंडालों में स्टॉल लगाने के लिए बुलाया गया। 17 अक्टूबर से उन्होंने 5 दिनों तक ऐसे ही दो इवेंट्स में स्टॉल लगाए (एक जगह पर चार दिन और दूसरी जगह पर एक दिन)। ये दिन वर्किंग डेज और ऑफिस के समय के साथ टकरा रहे थे, इसलिए उन्होंने एक तरीका निकाला। "दुर्गा पूजा के दौरान, जब शशि और मैं ऑफिस में होते थे, तब मेरी बहन खाना बनाने का काम संभालती थी।"

उन्हें कई ऑफर भी मिले। कुमार ने बताया- "एक व्यक्ति ने हमारी कंपनी की वैल्यू 5 करोड़ रुपये आंकी और वह कंपनी में 1 करोड़ रुपये के शेयर लेना चाहता था। लेकिन हमें ऐसा नहीं करना है। हम कोई इन्वेस्टमेंट नहीं लेने वाले हैं। हम इसे बिल्कुल शुरुआत से अपने दम पर (बूटस्ट्रैप करके) खड़ा करना चाहते हैं।" उन्होंने आगे कहा, "यह मेरे और शशि के लिए बहुत खास है। सबसे पहले हम 'लहम' के लिए एक मजबूत आधार बनाना चाहते हैं - जिसमें काम में निरंतरता और सही प्रोसेस हो। हम पहले इस इंडस्ट्री में एक्सपर्ट बनना चाहते हैं।"

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