बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में पीयूष गोयल ने यूरोपीय देशों को उनके सामने ही धो डाला, कार्बन उत्सर्जन का आंकड़ा देकर बोलती बंद कर दी

Piyush Goyal Video: यूरोपीय संघ (EU) की कार्बन टैक्स नीति को लेकर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कड़ी आलोचना की है। गुरुवार को बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में बोलते हुए गोयल ने कहा कि स्टील पर कार्बन टैक्स लगाने और लगातार नए नियम लागू करने से यूरोपीय संघ अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी कर रहा है

अपडेटेड Oct 23, 2026 पर 9:46 AM
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Piyush Goyal Video: गोयल ने कहा कि यूरोप में निर्माण लागत और आम लोगों के रहने का खर्च बढ़ सकता है

Piyush Goyal Video: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार (22 अक्टूबर) को कहा कि यूरोपीय संघ (EU) अपने इस्पात उत्पादों पर कार्बन टैक्स लगाकर अपने लिए मुसीबत मोल ले रहा है। बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ लगातार नए नियम और प्रतिबंध लागू करके तथा अपनी सीमाएं बंद करके खुद अपनी आर्थिक संभावनाओं को नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने कहा कि मुक्त व्यापार ने यूरोपीय देशों को विकसित अर्थव्यवस्थाएं बनने में मदद की थी। उनके मुताबिक, अत्यधिक नियमों और प्रतिबंधों के कारण यूरोपीय उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। इससे स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसी जरूरी निर्माण सामग्री महंगी हो सकती है, जिसका असर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से लेकर आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

गोयल ने कहा, "आप अपने ऊपर कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) लागू करते हैं। अपने देश में इस्पात के आयात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाते हैं। आप अपने लिए मुसीबत मोल ले रहे हैं। इससे आपकी जीवन-यापन की लागत बढ़ेगी।" उन्होंने कहा कि नियमों के इस पूरे ढांचे के जरिए यूरोपीय संघ अपने लिए आर्टिफिशियल बाधाएं खड़ी कर रहा है। वह यूरोप के भीतर सीमाएं बनाने और कुछ क्षेत्रों, खासकर इस्पात उद्योग, की रक्षा के लिए कई बार बेतुके मानक और सुरक्षा स्तर लागू करने की कोशिश कर रहा है। इससे अंततः उसकी अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा।

'यूरोपीय संघ में 75 से 77 नियम हैं'


गोयल ने इस दौरान यह भी कहा, "आगे की स्थिति की कल्पना कीजिए। बंदरगाह, हवाई अड्डे, जर्मनी के ऑटोबान (तेज रफ्तार राजमार्ग), एक्सप्रेसवे, बिजली-पानी की सेवाएं और जलापूर्ति की पाइपलाइन समेत हर तरह के बुनियादी ढांचे के निर्माण में महंगे इस्पात, एल्युमीनियम और सीमेंट का इस्तेमाल होगा। इसके ऊपर सीबीएएम और वनों की कटाई से जुड़े नियमों की लागत भी जुड़ेगी।" उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ में 75 से 77 नियम हैं।

गोयल ने कहा, "हमने इनकी गिनती भी छोड़ दी है। आप लगातार नए नियम जोड़ रहे हैं। अपने उद्योगों पर बोझ बढ़ा रहे हैं और उन्हें प्रतिस्पर्धा के लिहाज से कमजोर बना रहे हैं। इससे दूसरे देशों के लिए भी आपके साथ व्यापार करने में गैर-शुल्क बाधाएं पैदा होंगी।" उन्होंने कहा कि दुनिया अब पारस्परिकता के सिद्धांत पर काम कर रही है।

'आपके कारोबार को नुकसान पहुंचाने वाले...'

गोयल ने कहा, "मैं यह नहीं कह रहा हूं, बल्कि मुझसे कहीं बड़े नेता भी यह बात कह रहे हैं। इस पारस्परिक दुनिया में यदि आप कोई नियम लागू करके किसी दूसरे देश के साथ काम करने में बाधा डालते हैं, तो वह देश भी आपके कारोबार को नुकसान पहुंचाने वाले दो नियम लागू कर सकता है।" उन्होंने कहा कि अंततः यूरोप में जीवन-यापन की लागत बढ़ेगी, कारोबार की प्रतिस्पर्धी क्षमता घटेगी और महंगाई बढ़ेगी।

भारत ने CBAM पर क्यों जताई चिंता?

यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM आयातित वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को ध्यान में रखता है। इसका उद्देश्य यूरोपीय बाजार में आने वाले उत्पादों के कार्बन उत्सर्जन की लागत को यूरोप में उत्पादित वस्तुओं के अनुरूप लाना और कार्बन-गहन उत्पादन को हतोत्साहित करना है। हालांकि, भारत को चिंता है कि इस व्यवस्था से उसके स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे उत्पादों के यूरोपीय बाजार में निर्यात पर अतिरिक्त लागत पड़ सकती है।

गोयल ने कहा कि ऐसे नियम भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने यूरोपीय संघ के एंटी-डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन (EUDR) का भी उल्लेख किया। यह नियम कुछ वस्तुओं और उनसे जुड़ी सप्लाई चेन पर वनों की कटाई से संबंधित शर्तें लागू करता है। भारतीय पक्ष की चिंता है कि ऐसे नियम रबर उत्पादकों और निर्यातकों समेत कई क्षेत्रों के लिए यूरोपीय बाजार तक पहुंचना अधिक कठिन बना सकते हैं।

'कार्बन उत्सर्जन में भारत का योगदान केवल 3 से 3.5 प्रतिशत'

गोयल ने जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर विकसित देशों की जिम्मेदारी का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का घर है। लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान करीब 3 से 3.5 प्रतिशत है। उन्होंने दावा किया कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन काफी कम है। उनके मुताबिक, भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है और अपने स्टील उद्योग को भी पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, "आखिर इस पूरी गड़बड़ी का जिम्मेदार कौन है? ओजोन लेयर को नुकसान किसने पहुंचाया? हवा में इतना कार्बन किसने भरा?" उन्होंने कहा, "दुनिया की 17% आबादी भारत में रहती है, लेकिन ग्लोबल कार्बन एमिशन में हमारा हिस्सा 3% से भी कम है। दूसरी तरफ, यूरोप की आबादी दुनिया की सिर्फ 3-4% है। लेकिन कार्बन एमिशन में उसका योगदान बहुत ज्यादा है। सीधी बात है, यह समस्या आपने पैदा की है। आज भी भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन एमिशन यूरोप के मुकाबले 10-15% से भी कम है। पर्यावरण पर यूरोप का प्रति व्यक्ति असर भारत से करीब 7-8 गुना ज्यादा है।"

गोयल ने विकसित देशों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने पहले अपने आर्थिक विकास के लिए कम लागत वाली ऊर्जा का इस्तेमाल किया। लेकिन अब विकासशील देशों पर पर्यावरण संबंधी नियमों का अधिक बोझ डाल रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देशों ने विकासशील और कम विकसित देशों को जलवायु वित्त और तकनीक हस्तांतरण के जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने की जरूरत है।

CBAM पर भारत का मुख्य एतराज क्या है?

भारत की प्रमुख आपत्ति यह है कि कार्बन टैक्स जैसी नीतियां विकासशील देशों की आर्थिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं देतीं। गोयल ने कहा कि CBAM जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए निर्धारित 'साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों' के सिद्धांत को मान्यता नहीं देता। इस सिद्धांत के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी सभी देशों की है।

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लेकिन उनकी ऐतिहासिक भूमिका, आर्थिक क्षमता और विकास संबंधी जरूरतों के आधार पर जिम्मेदारियों में अंतर होना चाहिए। भारत का तर्क है कि विकसित देशों ने अपने औद्योगिक विकास के दौरान बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन किया है। ऐसे में विकासशील देशों पर समान प्रकार की लागत या नियम लागू करने से उनके उद्योगों और आर्थिक विकास पर असमान असर पड़ सकता है।

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