Uttar Da Puttar Review: 'परफेक्ट वास्तु' वाले फिजिक्स प्रोफेसर की ये कहानी जीत लेगी आपका दिल, ड्रामा, कॉमेडी और ट्विस्ट से भरपूर है फिल्म

Uttar Da Puttar Review: फिल्म उत्तर दा पुत्तर रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी फिजिक्स प्रोफेसर के ईर्द गिर्द बुनी गई है, जिसका किरदार अन्नू कपूर निभा रहे हैं।

अपडेटेड Jul 23, 2026 पर 3:56 PM
अगर आप ऐसी साफ-सुथरी फैमिली एंटरटेनर देखना चाहते हैं, जिसमें हंसी भी हो, दिल को छू लेने वाले पल भी हों और अंत में एक पॉजिटिव मैसेज भी मिले, तो 'उत्तर दा पुत्तर' आपके लिए एक बढ़िया विकल्प है।

फिल्म- उत्तर दा पुत्तर

कलाकार- अन्नू कपूर, रुखसार रहमान, बृजेंद्र काला, पवन मल्होत्रा, जीवेशु अहलूवालिया, सुमित गुलाटी, राजेंद्र सेठी, नितिन अरोड़ा, वीनस सिंह, इश्तियाक खान

निर्देशक- रविंदर सिवाच


रेटिंग: 3.5/5

Uttar Da Puttar Review: अपने बेबाक बयानों से अक्सर सुर्खियों में रहने वाले अभिनेता अन्नू कपूर इस बार अपनी नई हिंदी फिल्म 'उत्तर दा पुत्तर' के जरिए दर्शकों को हंसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करते हैं। यह एक ऐसी फैमिली एंटरटेनर है, जिसमें कॉमेडी, ड्रामा और इमोशन का बेहतरीन संतुलन देखने को मिलता है। फिल्म एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर की कहानी है, जो विज्ञान पढ़ाता है लेकिन अपनी जिंदगी के हर फैसले वास्तु शास्त्र और टोटकों के हिसाब से लेता है।

फिल्म की कहानी

फिल्म की शुरुआत बेहद दिलचस्प अंदाज में होती है। प्रोफेसर साई राम टुटेजा (अन्नू कपूर) खुद को काले कपड़े में लपेटकर अपने कोचिंग सेंटर पहुंचते हैं। अंदर जाकर जैसे ही वह कपड़ा हटाते हैं, पता चलता है कि उन्होंने भीतर भी काले कपड़े ही पहन रखे हैं। वास्तु और शुभ-अशुभ में अटूट विश्वास रखने वाले प्रोफेसर की यह ड्रामेटिक एंट्री फिल्म का मूड तय कर देती है। साई राम टुटेजा अपने लिए एक "परफेक्ट वास्तु" वाला घर ढूंढ़ते हैं। नया घर मिलने पर वह अपने ससुर और साले को पूरे विश्वास से समझाते हैं कि सही वास्तु ही जीवन की हर समस्या का समाधान है। लेकिन तभी छत का पुराना पंखा गिर पड़ता है और दोनों घायल हो जाते हैं। यह दृश्य खूब हंसी बटोरता है।

इस घटना के बाद उनकी पत्नी गिन्नी (रुखसार रहमान) नाराज़ होकर घर छोड़ देती हैं। पत्नी को वापस लाने और अपनी जिंदगी फिर से संवारने के लिए प्रोफेसर अपने दोस्त मन्नू (बृजेंद्र काला) के साथ परफेक्ट वास्तु की तलाश में निकल पड़ते हैं। कहानी में आगे नेक चड्ढा (पवन मल्होत्रा), उनके सहायक चोपड़ा (नितिन अरोड़ा), वास्तुकार वर्मा (इश्तियाक खान) और एस.बी. सिद्धू (जीवेशु अहलूवालिया) जैसे कई अतरंगी किरदार जुड़ते हैं। इनके आने से कहानी में लगातार मजेदार मोड़ और हास्यास्पद परिस्थितियां पैदा होती हैं, जो दर्शकों का मनोरंजन बनाए रखती हैं।

फिल्म का निर्देशन

निर्देशक रविंदर सिवाच की यह पहली फिल्म है, लेकिन उनका निर्देशन किसी अनुभवी फिल्मकार की तरह आत्मविश्वास से भरा हुआ है। फिल्म बिना समय गंवाए सीधे अपने मूल कथानक पर आती है और पहले ही सीन से दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेती है। लेखक संदीप कपूर की कहानी में दिल्ली के चिर-परिचित किरदार, रोजमर्रा की जिंदगी से निकली घटनाएं और दिलचस्प घुमाव हैं। यही वजह है कि कहानी मनोरंजक होने के साथ-साथ बेहद रिलेटेबल भी लगती है। निर्देशक इन किरदारों और परिस्थितियों को बड़े सहज और मनोरंजक अंदाज में पर्दे पर उतारते हैं। एक फिजिक्स प्रोफेसर का वास्तु और तंत्र-मंत्र पर अंधविश्वास फिल्म की सबसे बड़ी नॉवेल्टी बनकर सामने आता है, जिसे निर्देशक पूरी नाटकीयता के साथ विश्वसनीय बना देते हैं। कॉमेडी और ड्रामा का संतुलन भी पूरी फिल्म में बरकरार रहता है।

परफॉर्मेंस

अन्नू कपूर पूरी फिल्म की ये फिल्म खास हैं। प्रोफेसर साई राम टुटेजा के किरदार में उन्होंने शानदार काम किया है। उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है, वहीं इमोशनल सीन्स में भी वह उतने ही प्रभावशाली नजर आते हैं। रुखसार रहमान ने गिन्नी के किरदार को बेहद सहजता और सादगी से निभाया है। पवन मल्होत्रा हर फिल्म की तरह इस बार भी अपने अभिनय से चौंकाते हैं। नेक चड्ढा के रूप में उनका किरदार हंसी के कई मौके लेकर आता है। इश्तियाक खान वास्तुकार वर्मा के रूप में सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद गहरी छाप छोड़ते हैं। नितिन अरोड़ा सरकारी कर्मचारी चोपड़ा के किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं। फिल्म का सबसे अतरंगी किरदार एस.बी. सिद्धू है, जिसे जीवेशु अहलूवालिया ने पूरे आत्मविश्वास के साथ निभाया है। उनका अभिनय फिल्म में अलग ही रंग भर देता है। राजेंद्र सेठी आनंद राज आनंद के रूप में प्रभावशाली हैं, जबकि सुमित गुलाटी (ज्ञान चंद उर्फ जी.सी.) भी अपने किरदार में प्रभावित करते हैं।

फिल्म देखें या नहीं

'उत्तर दा पुत्तर' सिर्फ हंसाने वाली फिल्म नहीं है, बल्कि यह मनोरंजन के बीच एक दिलचस्प सवाल का जवाब भी देती है—आखिर जिंदगी में कर्म बड़ा होता है या किस्मत? कॉमेडी, ड्रामा और इमोशन से भरपूर यह फिल्म अपने अतरंगी किरदारों और दिल्ली के देसी फ्लेवर की वजह से अलग पहचान बनाती है। फिल्म के सभी प्रमुख किरदार अच्छी तरह लिखे गए हैं और कलाकारों ने उन्हें पूरी ईमानदारी से निभाया है। यही वजह है कि दर्शक कहानी से जुड़ता भी है और पूरे समय मुस्कुराता भी रहता है।फिल्म की कहानी का कॉमिक सीक्वेंस को और प्रभावी बनाता है। दिल्ली का लोकल फ्लेवर और किरदारों की भाषा फिल्म को और अधिक वास्तविक बनाती है।

अगर आप ऐसी साफ-सुथरी फैमिली एंटरटेनर देखना चाहते हैं, जिसमें हंसी भी हो, दिल को छू लेने वाले पल भी हों और अंत में एक पॉजिटिव मैसेज भी मिले, तो 'उत्तर दा पुत्तर' आपके लिए एक बढ़िया विकल्प है। खासतौर पर अन्नू कपूर और पवन मल्होत्रा का शानदार अभिनय इस फिल्म को लंबे समय तक यादगार बनाता है।

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