फिल्म: 'गांधारी'
फिल्म: 'गांधारी'
कास्ट: तापसी पन्नू, इश्वाक सिंह, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी, मीता वशिष्ठ, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन, चंदन रॉय, विश्वनाथ चटर्जी, प्रीति श्रॉफ, मायरा शिवन, शुभम बसु
डायरेक्टर: देवाशीष मखीजा
प्रोड्यूसर: कनिका ढिल्लों
प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: 3.5/5
Gandhari Film Review: मां और बच्चे का रिश्ता दुनिया के सबसे गहरे और मजबूत रिश्तों में से एक माना जाता है। एक मां सामान्य परिस्थितियों में जितनी संवेदनशील और ममतामयी होती है, अपनी संतान पर संकट आने पर उतनी ही आक्रामक और मजबूत भी हो सकती है। ‘गांधारी’ इसी मदरहुड की उस ताकत को कहानी का केंद्र बनाती है, जहां एक मां अपनी लापता बेटी को वापस पाने के लिए अपराध की खतरनाक दुनिया में अकेले उतरने का फैसला करती है।
देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में तापसी पन्नू लीड रोल में हैं। उनके साथ अनुभवी कलाकारों की मजबूत कास्ट कहानी को और प्रभावी बनाने का काम करती है। फिल्म 3 सितंबर से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम की जा सकती है। आइए जानते हैं फिल्म की कहानी क्या है और यह दर्शकों पर कितना असर छोड़ती है।
कहानी
कहानी की शुरुआत एक ट्रेन यात्रा से होती है। बानी (तापसी पन्नू), अपने पति गोकुल (इश्वाक सिंह) और करीब 5-6 साल की बेटी मिष्टी (मायरा शिवन) के साथ सफर कर रही होती है। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से स्टेशन जॉयपुरा पर ट्रेन कुछ समय के लिए रुकती है। गोकुल खाने-पीने का सामान लेने के लिए ट्रेन से नीचे उतर जाता है, जबकि बानी अपनी बेटी के साथ कोच के टॉयलेट के पास जाती है।
इसी दौरान हालात अचानक बदल जाते हैं और मिष्टी गायब हो जाती है। घबराई हुई बानी ट्रेन के भीतर अपनी बेटी को तलाशती है। तभी उसकी नजर खिड़की से बाहर एक महिला पर पड़ती है, जो मिष्टी को गोद में लेकर भाग रही होती है। बानी बिना कुछ सोचे ट्रेन से नीचे कूद जाती है और भीड़ के बीच उस महिला का पीछा करने लगती है। लेकिन पीछा करते हुए उसका सिर लोहे की एक भारी वस्तु से टकरा जाता है और वह बेहोश हो जाती है।
जब बानी को होश आता है, तब तक उसकी बेटी गायब हो चुकी होती है। सिर पर लगी चोट का असर उसकी आंखों पर भी पड़ता है और डॉक्टर उसे दोनों आंखों पर पट्टी बांधकर रखने की सलाह देते हैं। लेकिन बेटी की तलाश का जुनून बानी को रुकने नहीं देता। वह तमाम मुश्किलों के बावजूद एक-एक सुराग जोड़ते हुए जॉयपुरा की उस खतरनाक दुनिया तक पहुंचने की कोशिश करती है, जहां उसकी बेटी को कैद कर रखा गया है।
फिल्म का शीर्षक भी इसी प्रतीक से जुड़ता है। जिस तरह महाभारत की गांधारी ने धृतराष्ट्र के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांधी थी, उसी तरह बानी भी अपनी बेटी के लिए आंखों पर पट्टी बांधकर एक बेहद खतरनाक सफर पर निकलती है।
कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, रहस्य और तनाव दोनों गहराते जाते हैं। फिल्म लगातार दर्शकों को अगले मोड़ का इंतजार करवाती है और आखिरी हिस्से तक सस्पेंस बनाए रखने की कोशिश करती है। अंत में सामने आने वाला सच कहानी को एक अलग मोड़ देता है और कई सवालों के जवाब भी सामने आते हैं। आखिर मिष्टी कहां है? बानी उसे बचा पाएगी या नहीं? और जॉयपुरा की इस पूरी कहानी के पीछे कौन है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए फिल्म देखनी होगी।
अभिनय
तापसी पन्नू फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। बानी के किरदार में उन्होंने एक ऐसी मां की बेचैनी, बेबसी और भावनात्मक टूटन को प्रभावी ढंग से पेश किया है, जिसकी दुनिया अचानक अपनी बच्ची के गायब होने से बदल जाती है। वहीं, कहानी आगे बढ़ने के साथ जब यही किरदार अपने डर को पीछे छोड़कर मुकाबले के लिए खड़ा होता है, तब तापसी उसके मजबूत और आक्रामक पक्ष को भी पूरी ऊर्जा के साथ सामने लाती हैं।
इश्वाक सिंह अपने किरदार में संयमित और प्रभावी नजर आते हैं। जतिन सरना वर्दी वाले किरदार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी और मीता वशिष्ठ जैसे अनुभवी कलाकारों को भले ही सीमित स्क्रीन स्पेस मिला हो, लेकिन उनकी मौजूदगी कहानी में वजन जोड़ती है। बाल कलाकार मायरा शिवन भी भावनात्मक दृश्यों में अच्छा प्रभाव छोड़ती हैं।
निर्देशन
देवाशीष मखीजा की फिल्मों में जिस तरह की रॉनेस और यथार्थ का स्पर्श देखने को मिलता है, ‘गांधारी’ में भी वह नजर आता है। फिल्म का एक्शन चमकदार या जरूरत से ज्यादा भव्य बनाने के बजाय जमीन से जुड़ा और कच्चा रखा गया है। यही अंदाज कहानी के तनाव और किरदारों की तकलीफ को ज्यादा वास्तविक बनाता है।
निर्देशक ने सिर्फ एक्शन के भरोसे कहानी को आगे नहीं बढ़ाया है, बल्कि बानी के भावनात्मक संघर्ष को भी बराबर महत्व दिया है। एक माँ की व्यक्तिगत लड़ाई और अपराध की दुनिया के बीच का टकराव फिल्म को सिर्फ एक सामान्य एक्शन थ्रिलर बनने से रोकता है।
कनिका ढिल्लों की कहानी और पटकथा एक महिला के संघर्ष को केंद्र में रखते हुए बेबाक तरीके से आगे बढ़ती है। फिल्म की शुरुआत के बाद कहानी जल्द ही अपनी रफ्तार पकड़ लेती है और दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखती है। हालांकि, इंटरवल के बाद कुछ घटनाक्रम ऐसे हैं जिनका अंदाजा दर्शक पहले ही लगा सकता है।
करीब 1 घंटा 55 मिनट की अवधि फिल्म के पक्ष में जाती है। एडिटिंग कहानी को जरूरत से ज्यादा लंबा होने से बचाती है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन खास तौर पर उल्लेखनीय है। कई दृश्यों में आवाजों और संगीत का इस्तेमाल बानी की बेचैनी, डर और संघर्ष को और प्रभावशाली बनाता है।
‘गांधारी’ को सिर्फ मारधाड़, गोलियों और एक्शन सीन्स वाली फिल्म कहना इसके भावनात्मक पक्ष को नजरअंदाज करना होगा। फिल्म की असली ताकत एक ऐसी माँ की कहानी है जो अपनी बेटी को वापस पाने के लिए अपने डर, अपनी सीमाओं और हालात-सबसे लड़ने को तैयार है।
अगर आपको सामाजिक पृष्ठभूमि के साथ बने रॉ और तनावपूर्ण एक्शन-थ्रिलर पसंद हैं, तो ‘गांधारी’ एक बार देखी जा सकती है। तापसी पन्नू का अलग अंदाज, दमदार सपोर्टिंग कास्ट और लगातार बना रहने वाला तनाव फिल्म को एक प्रभावी ओटीटी वॉच बनाते हैं।
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