The India Story Review: सिनेमा जब मनोरंजन के साथ किसी जरूरी सामाजिक मुद्दे को उठाता है, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा हो जाता है। 'द इंडिया स्टोरी' ऐसी ही फिल्मों में शामिल है। यह फिल्म उन जहरीले पेस्टिसाइड्स और रासायनिक पदार्थों पर सवाल खड़े करती है, जो बेहतर उत्पादन के नाम पर धीरे-धीरे हमारी थाली और फिर हमारे शरीर तक पहुंच रहे हैं। बढ़ती कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के पीछे छिपे इस संवेदनशील विषय को निर्देशक चेतन डीके ने कोर्टरूम ड्रामा और एक पिता की भावनात्मक लड़ाई के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है। फिल्म केवल एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि दर्शकों को अपने रोजमर्रा के खान-पान पर दोबारा सोचने के लिए भी प्रेरित करती है।
कहानी की शुरुआत अदालत से होती है, जहां तेज-तर्रार अधिवक्ता अर्चना (काजल अग्रवाल) अपने मुवक्किल योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) की ओर से न्यायालय में मजबूती से दलील रखती हैं। योगेश की सात साल की बेटी कैंसर से अपनी जिंदगी हार चुकी है। चिकित्सकीय रिपोर्ट यह संकेत देती है कि लंबे समय तक पेस्टिसाइड युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन उसकी बीमारी की एक प्रमुख वजह रहा।
फिल्म का पहला हिस्सा काफी इंप्रैस करता है। कोर्टरूम के डायलॉग, घटनाओं का क्रम और कहानी का प्रवाह दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखते हैं। इंटरवल से पहले आने वाला बड़ा खुलासा कहानी को इमोशनल हाइप देता है। वहीं एक सीन, जिसमें अर्चना पानी की बोतल उठाकर कहती हैं, "बस यही असली है", पूरे विषय का सार बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली तरीके से सामने रख देता है।
दूसरे भाग में फिल्म थोड़ा धीमी जरूर होती है, लेकिन अपने मूल उद्देश्य से नहीं भटकती। आखिर में दर्शकों के मन में यही सवाल रह जाता है कि क्या एक पिता को अपनी बेटी के लिए इंसाफ मिलेगा? क्या इस व्यवस्था में बैठे जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होगी? इन सवालों के जवाब फिल्म अपने क्लाइमेक्स में तलाशने की कोशिश करती है।
काजल अग्रवाल ने वकील अर्चना के किरदार को आत्मविश्वास और गंभीरता के साथ निभाया है। विशेष रूप से कोर्टरूम के सीन्स में उनकी डायलॉग अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस प्रभाव छोड़ती है। श्रेयस तलपड़े ने योगेश पाटिल के रूप में एक ऐसे पिता का दर्द महसूस कराया है, जिसने अपनी मासूम बेटी को खो दिया है। उनके चेहरे के भाव, टूटन, गुस्सा और न्याय की तलाश-सब कुछ बेहद संयमित अभिनय के साथ सामने आता है। यह उनके यादगार प्रदर्शनों में गिना जा सकता है।
मुरली शर्मा अपने अनुभव के अनुरूप प्रभावी अभिनय करते हैं। विरोधी पक्ष के वकील के रूप में मनीष वाधवा दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हैं और अदालत के सीन्स में मजबूती जोड़ते हैं। छोटी बच्ची की भूमिका में त्रिशा सारदा बेहद स्वाभाविक लगती हैं और भावनात्मक सीन्स में गहरी छाप छोड़ती हैं। अतुल तिवारी, कमलेश सावंत और शाम मशालकर भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं।
निर्देशक चेतन डीके ने ऐसा विषय चुना है, जिस पर व्यावसायिक सिनेमा में बहुत कम काम हुआ है। फिल्म देखते समय महसूस होता है कि इसकी रिसर्च पर गंभीर मेहनत की गई है। तथ्यों और भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं था, लेकिन निर्देशक इसमें काफी हद तक सफल रहे हैं।
उन्होंने एक पिता और बेटी के रिश्ते को कहानी का भावनात्मक आधार बनाया है। यही भावनात्मक जुड़ाव फिल्म को केवल डॉक्यूमेंट्री बनने से बचाता है और दर्शकों को अंत तक कहानी से जोड़े रखता है। कोर्टरूम ड्रामा के साथ सामाजिक संदेश को जोड़ने का उनका प्रयास सराहनीय है।
'द इंडिया स्टोरी' सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं, बल्कि हमारे समय के एक गंभीर सामाजिक संकट पर बनी जागरूक करने वाली फिल्म है। यह दर्शकों के साथ-साथ सरकार, नीति-निर्माताओं और व्यवस्था से भी कई जरूरी सवाल पूछती है। फिल्म यह संदेश देती है कि यदि खाद्य सुरक्षा, पेस्टिसाइड्स के नियंत्रण और रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल पर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने इससे भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
मनोरंजन के साथ सामाजिक चेतना जगाने वाली ऐसी फिल्में कम बनती हैं। 'द इंडिया स्टोरी' एक महत्वपूर्ण विषय को सरल, भावनात्मक और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो मनोरंजन के साथ सोचने पर भी मजबूर करें, तो यह फिल्म निश्चित रूप से आपकी वॉचलिस्ट में होनी चाहिए। फिल्म में श्रेयस तलपड़े, काजल अग्रवाल, मुरली शर्मा, मनीष वाधवा, त्रिशा सारदा, अतुल तिवारी, कमलेश सावंत, शाम मशालकर शामिल हैं। इसे निर्देशित चेतन डीके और प्रोड्यूस सागर शिंदे ने किया है। फिल्म को हम 3.5 रेटिंग देते हैं।