Bihar Nadi Sanjivani: नदियों की सिल्ट से बनेंगे 16 हाईवे प्रोजेक्ट्स, जानिए बिहार के नदी संजीवनी प्लान की पूरी डिटेल और फायदे

बिहार की नदी संजीवनी योजना के तहत 16 चालू हाईवे प्रोजेक्ट में 243 लाख घन मीटर गाद का इस्तेमाल होगा। जानिए कैसे नदियों की सफाई, बाढ़ नियंत्रण, खेती की जमीन और सड़क निर्माण को फायदा पहुंचाने की योजना है।

अपडेटेड Nov 06, 2026 पर 4:57 PM
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आपको बता दें कि इस योजना के तहत बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग की 16 निर्माणाधीन परियोजनाओं में 243 लाख घन मीटर उपयुक्त गाद का इस्तेमाल किया जाएगा।

बिहार में नदियों और जलाशयों में जमा गाद (सिल्ट) अब राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में काम आएगी। इसके लिए केंद्र सरकार और बिहार सरकार ने 'नदी संजीवनी' योजना के तहत एक समझौता किया है। इस योजना का मकसद नदियों और जलस्रोतों से वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालना और उसके इस्तेमाल से सड़क निर्माण की जरूरतें पूरी करना है। सरकार का मानना है कि इससे नदियों की पानी ले जाने की क्षमता बढ़ेगी, जल निकासी बेहतर होगी और बाढ़ के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, हाईवे बनाने के लिए किसानों के खेतों की उपजाऊ मिट्टी का इस्तेमाल करने की जरूरत भी कम होगी। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और बिहार सरकार के बीच इस संबंध में MoU हो चुका है।

आपको बता दें कि इस योजना के तहत बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग की 16 निर्माणाधीन परियोजनाओं में 243 लाख घन मीटर उपयुक्त गाद का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा भविष्य की 27 परियोजनाओं के लिए 835 लाख घन मीटर गाद के इस्तेमाल का प्रस्ताव है। इस तरह कुल 43 परियोजनाओं में करीब 1078 लाख घन मीटर गाद के इस्तेमाल की योजना है।

क्या है बिहार का नदी संजीवनी प्लान?


नदी संजीवनी का मुख्य विचार यह है कि नदियों और दूसरे जलस्रोतों में जमा गाद को बेकार समझकर छोड़ने के बजाय उसका इस्तेमाल निर्माण कार्यों में किया जाए। इसके लिए पहले नदियों और जलाशयों की स्थिति का तकनीकी आकलन होगा। इसके बाद तय जगहों से निर्धारित सीमा के भीतर वैज्ञानिक तरीके से गाद निकाली जाएगी। जांच में हाईवे निर्माण के लिए उपयुक्त पाई जाने वाली गाद को सड़क परियोजनाओं में भराव और निर्माण सामग्री के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा। इस योजना को नदी सुधार, बाढ़ प्रबंधन, खेती की जमीन के संरक्षण और सड़क निर्माण को एक साथ जोड़कर तैयार किया गया है। सरकार का उद्देश्य है कि नदियों से गाद हटाने का फायदा सिर्फ जल प्रबंधन तक सीमित न रहे बल्कि उससे सड़क निर्माण के लिए जरूरी सामग्री भी मिले।

बिहार में बाढ़ की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। राज्य में नेपाल से आने वाली नदियां बड़ी मात्रा में पानी और अपने साथ गाद लेकर पहुंचती हैं। नदियों और जलस्रोतों में गाद जमा होने से उनकी पानी ले जाने की क्षमता प्रभावित होती है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा कि नदियों में जमा गाद के कारण उनकी जलधारण क्षमता कम हुई है। इससे बाढ़, खेती की जमीन को नुकसान और संपत्ति के नुकसान जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।

16 चालू हाईवे परियोजनाओं में इस्तेमाल होगी 243 लाख घन मीटर गाद

नदी संजीवनी योजना के तहत फिलहाल राष्ट्रीय राजमार्ग की 16 निर्माणाधीन परियोजनाओं में 243 लाख घन मीटर उपयुक्त गाद के इस्तेमाल की योजना है। इसके अलावा 27 भविष्य की परियोजनाओं के लिए 835 लाख घन मीटर गाद के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य हाईवे निर्माण में नई मिट्टी की जरूरत घटाना और निर्माण लागत को कम करना है। इस योजना के लिए बिहार में सड़क निर्माण की मौजूदा और प्रस्तावित परियोजनाओं का बड़ा आधार मौजूद है। NHAI की 39 परियोजनाएं इस समय बिहार में निर्माणाधीन हैं। इनकी कुल लंबाई करीब 1561 किलोमीटर है और अनुमानित लागत 58340 करोड़ रुपये है।

इसके अलावा 11 अन्य परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इनकी कुल लंबाई करीब 1982 किलोमीटर और अनुमानित लागत 185200 करोड़ रुपये है। सरकार को उम्मीद है कि नदियों से मिलने वाली उपयुक्त गाद इन परियोजनाओं की सामग्री संबंधी जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा कर सकती है। इससे निर्माण लागत घटाने और काम समय पर पूरा करने में मदद मिल सकती है।

बिहार में बाढ़ की समस्या कम करने में कैसे मदद कर सकती है योजना?

बिहार में बाढ़ की समस्या का एक बड़ा कारण नेपाल से आने वाली नदियों में पानी और गाद का भारी प्रवाह है। नदियों के तल में गाद जमा होने से पानी के बहाव और उसे अपने भीतर समाहित करने की क्षमता पर असर पड़ता है। ऐसे में नदी संजीवनी योजना के तहत वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालने का उद्देश्य नदियों की पानी ले जाने की क्षमता और जल निकासी में सुधार करना है। इस गाद प्रबंधन की तुलना महाराष्ट्र के बुलढाणा मॉडल से की गई है। इसके तहत नदियों और जलाशयों से वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाकर उनकी गहराई और पानी रखने की क्षमता बढ़ाने की बात कही गई है।

बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियों के साथ कोसी, गंडक, बागमती और महानंदा जैसी नदियों के तल में जमा गाद का प्रबंधन भी अहम माना गया है। योजना से जुड़े ब्योरे में नेपाल से आने वाले तेज जलप्रवाह और फरक्का बैराज के बैकवाटर प्रभाव के संदर्भ में भी नदियों में गाद जमा होने की समस्या का उल्लेख है। इन नदियों से वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाने का उद्देश्य हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करना है।

योजना का एक दूसरा उद्देश्य मानसून के दौरान आने वाले अतिरिक्त पानी का बेहतर इस्तेमाल करना है। जुलाई से अक्टूबर के चार महीनों में आने वाले अतिरिक्त पानी को जलाशयों और नहरों में बेहतर तरीके से जमा करने की व्यवस्था विकसित करने की बात है। इससे साल के बाकी महीनों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

किसानों की उपजाऊ मिट्टी बचेगी, खेती और सिंचाई को भी फायदा

नदी संजीवनी योजना का एक अहम पहलू खेती की जमीन की उपजाऊ मिट्टी को बचाना है। सड़क और तटबंध बनाने के लिए कई बार भराव सामग्री की जरूरत होती है। इसके लिए खेतों से मिट्टी निकाली जाती है, जिससे खेती की जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत को नुकसान पहुंच सकता है। योजना के तहत नदियों और जलाशयों से निकाली गई उपयुक्त गाद को हाईवे निर्माण में इस्तेमाल करने से खेतों की मिट्टी पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य है। इससे किसानों की जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत को बचाने में मदद मिल सकती है।

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि राज्य में बाढ़ के कारण किसानों, खेती की जमीन, आजीविका और बुनियादी ढांचे को नुकसान होता है। उन्होंने बताया कि बिहार जलस्रोत पुनरुद्धार एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026 तैयार की गई है। इस नीति के तहत जलस्रोतों को फिर से बेहतर बनाने और जमा गाद के प्रबंधन के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार किया गया है। इस नीति में बाढ़ के बाद किसानों की जमीन पर जमा रेत और गाद हटाने की सुविधा भी शामिल है। इससे उन किसानों को राहत मिल सकती है जिनके खेतों में बाढ़ के बाद रेत या गाद जमा हो जाती है।

जलस्रोतों में गाद कम होने से सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर बनाने, नहरों के जरिए खेतों तक पानी पहुंचाने और भूजल स्तर को सुधारने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। योजना से जुड़े विवरण में खरीफ और रबी दोनों फसलों के लिए सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाने और आसपास के भूजल के पुनर्भरण का लक्ष्य भी बताया गया है।

नदी के पर्यावरण और जलीय जीवों को भी मिल सकता है फायदा

नदी संजीवनी योजना सिर्फ गाद निकालने और उसे सड़क निर्माण में इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं है। इसका एक उद्देश्य नदियों के प्राकृतिक बहाव और उनके पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाना भी है। वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालने से नदियों के बहाव में सुधार हो सकता है। इससे जलस्रोतों की स्थिति और उनमें रहने वाले जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। योजना से जुड़े विवरण में मिट्टी के कटाव की समस्या को नियंत्रित करने की संभावना भी जताई गई है।

इसके लिए गाद निकालने का काम तय तकनीकी सीमाओं और पर्यावरण से जुड़े नियमों के तहत ही किया जाएगा। नदियों के प्राकृतिक तंत्र, किनारों, तटबंधों और पुलों को नुकसान पहुंचाए बिना काम करना इस योजना की अहम शर्त है।

बिहार सरकार की 2026 की नीति क्या कहती है?

बिहार जलस्रोत पुनरुद्धार एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026 को राज्य में नदियों और दूसरे जलस्रोतों की बहाली तथा जमा गाद के प्रबंधन के लिए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य गाद निकालने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना और निकाली गई सामग्री का उपयोग तय मानकों के अनुसार करना है। इस नीति के तहत बाढ़ के बाद खेतों में जमा रेत और गाद हटाने का प्रावधान भी बताया गया है। इससे प्रभावित किसानों को राहत देने में मदद मिल सकती है।

केंद्र और बिहार सरकार के बीच हुए समझौते से इस नीति को लागू करने के लिए संस्थागत व्यवस्था भी बनाई गई है। बिहार सरकार का सड़क निर्माण विभाग (RCD) इस योजना का नोडल विभाग होगा। इसके अलावा राज्य स्तर पर एक समन्वय समिति बनाई जाएगी। यह समिति अलग-अलग प्रस्तावों की जांच, मंजूरी की प्रक्रिया में मदद, काम की निगरानी और कामकाज से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने का काम करेगी।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने योजना को बिहार में बाढ़ प्रबंधन, कृषि विकास और सड़क निर्माण के प्रयासों से जोड़ने वाला कदम बताया। उन्होंने इसके क्रियान्वयन में राज्य सरकार की ओर से पूरा सहयोग देने और प्रस्तावों पर समय से कार्रवाई करने का भरोसा दिया।

गाद निकालने के लिए तय होंगे स्थान, जांच के बाद ही हाईवे में होगा इस्तेमाल

नदी संजीवनी योजना में गाद निकालने के काम को लेकर तकनीकी और पर्यावरण संबंधी सावधानियां तय की गई हैं। इसके तहत किसी भी नदी या जलस्रोत से मनमाने तरीके से गाद नहीं निकाली जाएगी। सबसे पहले चुने गए जलस्रोतों का विस्तृत तकनीकी आकलन किया जाएगा। इसके बाद सिर्फ स्वीकृत जगहों पर और तय तकनीकी सीमाओं के भीतर ही गाद निकालने की अनुमति होगी। इस प्रक्रिया में नदी के पारिस्थितिकी तंत्र, नदी के किनारों, तटबंधों, पुलों और दूसरे निर्माणों को नुकसान से बचाने का ध्यान रखा जाएगा।

निकाली गई गाद को राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में इस्तेमाल करने से पहले उसकी गुणवत्ता और उपयुक्तता की जांच की जाएगी। इसके लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के निर्धारित मानकों और भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के संबंधित कोड का पालन किया जाएगा। गाद की निकासी, उसे ले जाने और निर्माण में इस्तेमाल की गई मात्रा का रिकॉर्ड भी रखा जाएगा। इसके लिए संयुक्त माप, डिजिटल रिकॉर्ड, नियमित निगरानी और समय-समय पर आंकड़ों का मिलान किया जाएगा। इससे यह पता रखा जा सकेगा कि कितनी गाद निकाली गई, कितनी ढुलाई हुई और कितनी मात्रा का इस्तेमाल निर्माण कार्यों में किया गया।

हाईवे निर्माण की लागत और समय दोनों बचाने का लक्ष्य

राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में बड़ी मात्रा में मिट्टी और भराव सामग्री की जरूरत होती है। अगर यह सामग्री निर्माण स्थल के आसपास उपलब्ध हो जाए तो उसे दूर से लाने की जरूरत कम हो सकती है। इससे ढुलाई पर होने वाला खर्च घट सकता है और निर्माण कार्य तेजी से पूरा करने में मदद मिल सकती है। नदी संजीवनी योजना में नदियों से निकाली गई उपयुक्त गाद को हाईवे निर्माण में इस्तेमाल करने का यही उद्देश्य है। इससे नई मिट्टी और कृषि भूमि की ऊपरी परत पर निर्भरता कम करने की कोशिश होगी।

निर्माण सामग्री की स्थानीय उपलब्धता से परिवहन खर्च और उससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन में कमी आ सकती है। इसके अलावा राज्य में विकसित हो रही 12 नई टाउनशिप, 10 नए एयरपोर्ट और 32 मेडिकल कॉलेजों के भू-समतलीकरण और बुनियादी निर्माण कार्यों में भी इस गाद के वैकल्पिक इस्तेमाल की संभावना बताई गई है।

बिहार में 2014 के बाद बढ़ा राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क

बिहार में राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क 2014 में 4,615 किलोमीटर था, जो अब बढ़कर करीब 6,500 किलोमीटर हो गया है। इसके अलावा 2014 से राज्य की प्रमुख नदियों पर करीब 29 नए पुलों के निर्माण का काम भी शुरू किया गया है। इन पुलों का उद्देश्य क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करना और लोगों तथा सामान की आवाजाही को आसान बनाना है। नदी संजीवनी योजना को इसी बुनियादी ढांचे के विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके जरिए नदियों से निकली गाद को सड़क निर्माण की सामग्री में बदलने की योजना है। इससे जलस्रोतों की बहाली और सड़क निर्माण के बीच तालमेल बनाने की कोशिश होगी।

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