भारत में एक दशक का सबसे असमान मानसून! CRISIL ने चेताया- फसलों की पैदावार, रबी बुआई पर भी खतरा

क्रिसिल के रेनफॉल्स डिस्टॉर्शन इंडेक्स (RDI) के मुताबिक इस साल यह इंडेक्स 14.4 पर पहुंच गया है। ये बीते 10 वर्षों में मानसून की सबसे असमान चाल की ओर इशारा कर रहा है। देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में बारिश की असमानता बेहद गंभीर रही है। दक्षिण प्रायद्वीप में सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश हुई है

अपडेटेड Sep 08, 2026 पर 6:21 PM
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क्रिसिल के रेनफॉल्स डिस्टॉर्शन इंडेक्स (RDI) के मुताबिक इस साल यह इंडेक्स 14.4 पर पहुंच गया है (Photo: Canva)

देश में इस साल मानसून की असमान चाल ने कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। हमारी सहयोगी सीएनबीसी टीवी 18 की एक रिपोर्ट में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि 2026 में भारत को पिछले एक दशक के सबसे अधिक असमान और विषमतापूर्ण मानसून का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मानसूनी बारिश में 14 प्रतिशत की कमी के बावजूद किसानों ने बुआई का रकबा घटने नहीं दिया लेकिन अब असली खतरा फसलों की पैदावार और आगामी रबी (सर्दियों की) फसल की बुआई पर मंडरा रहा है।

10 साल में सबसे असमान मानसून: बारिश में 14% की भारी कमी

क्रिसिल के रेनफॉल्स डिस्टॉर्शन इंडेक्स (RDI) के मुताबिक इस साल यह इंडेक्स 14.4 पर पहुंच गया है। ये बीते 10 वर्षों में मानसून की सबसे असमान चाल की ओर इशारा कर रहा है। 7 सितंबर तक देश में सामान्य के मुकाबले बारिश की कमी 14 प्रतिशत दर्ज की गई है। इसके अलावा सितंबर महीने में भी सामान्य से कम बारिश रहने का अनुमान है।


देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में बारिश की असमानता बेहद गंभीर रही है। दक्षिण प्रायद्वीप में सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसी तरह पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 24 प्रतिशत कम बारिश देखने को मिली है।

बुआई का रकबा तो बच गया पर कैसे?

रिपोर्ट के मुताबिक, बारिश की भारी कमी और देरी के बावजूद किसानों ने स्थानीय परिस्थितियों, रुक-रुक कर हुई बारिश और राज्य सरकारों की सलाह के मुताबिक अपनी बुआई योजनाओं में बदलाव किया है। 4 सितंबर तक कुल बुआई का स्तर सामान्य रकबे के 98 प्रतिशत और पिछले साल के स्तर के 96 प्रतिशत पर पहुंच गया है। चावल, तुअर (अरहर), मक्का, मूंगफली और गन्ना की बुआई सामान्य स्तर को पार कर चुकी है। कपास (कॉटन), बाजरा, ज्वार, मूंग, उड़द और सोयाबीन की बुआई का प्रदर्शन अभी भी कमजोर बना हुआ है।

जून के महीने में मूंगफली की बुआई पिछले साल से 42 प्रतिशत पीछे चल रही थी। लेकिन जुलाई और अगस्त में गुजरात में बारिश की स्थिति में हुए सुधार से इसका रकबा सुधरा और अंततः पिछले साल के आंकड़े को पार कर गया।

अब असली खतरा: फसलों की पैदावार पर संकट

क्रिसिल का कहना है कि फिलहाल कमजोर बारिश से पैदा होने वाले कृषि संकट की पहली कड़ी यानी कम बुआई तो टल गई है लेकिन अब सारा खतरा फसलों की पैदावार पर आ गया है। सीमित सिंचाई सुविधाओं वाली फसलें बारिश न होने पर सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। क्रिसिल के डेफिसिएंट रेनफॉल इम्पैक्ट पैरामीटर (DRIP) ने कपास, बाजरा, मक्का, तुअर, मूंगफली और सोयाबीन में बड़े जोखिम की ओर इशारा किया है।

इसे गुजरात की ही उदाहरण से समझा जा सकता है। यहां मूंगफली की बुआई तो अच्छी हुई है लेकिन 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक इसके कुल कृषि क्षेत्र का केवल 49.3 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है। अगस्त के अंत और सितंबर में बारिश सुस्त पड़ने से इस फसल की पैदावार पर असर पड़ सकता है। क्रिसिल के मुताबिक खरीफ फसलों से होने वाली किसानों की आय पर मध्यम असर पड़ेगा। हालांकि ग्रामीण मांग पर इसका तुरंत बड़ा झटका लगने की संभावना कम है।

क्या झटके को झेल पाएगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था?

रिपोर्ट के मुताबिक बीते वर्षों की तुलना में ग्रामीण भारत की स्थिति अब अधिक मजबूत हुई है। ग्रामीण परिवार अब सिर्फ फसल की आय पर निर्भर नहीं हैं। पशुपालन, मत्स्य पालन और वानिकी अब कृषि व संबद्ध क्षेत्र के कुल उत्पादन में 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान देते हैं। शुद्ध बोए गए क्षेत्र में सिंचाई का दायरा 2015-16 के 48.8 प्रतिशत के स्तर से बढ़कर 2024-25 में करीब 60 फीसदी हो गया है।

पिछले 4 वर्षों का बेहतर मानसून, अच्छा उत्पादन, कम महंगाई और सरकारी सहायता योजनाओं से ग्रामीणों की वित्तीय स्थिति सुधरी है। पीएम-किसानके तहत मिलने वाले 6000 रुपये, 17 राज्यों में जारी कैश-ट्रांसफर योजनाएं और खाद्यान्न सहायता इस दबाव को कम करने में मदद करेंगे।

रबी की फसल के लिए सबसे बड़ी चिंता क्यों?

दक्षिण-पश्चिम मानसून न सिर्फ खरीफ की फसल तय करता है, बल्कि यह मिट्टी की नमी, भूजल स्तर और जलाशयों को भरता है जो रबी (गेहूं, सरसों आदि) की बुआई के लिए बेहद जरूरी हैं। अब इससे जुड़े शुरुआती आंकड़े चिंता को और बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 7 सितंबर तक देश के करीब 45 फीसदी जिलों में बारिश की कमी दर्ज की गई है जबकि पिछले चार सालों में यह आंकड़ा 20-30 फीसदी के बीच था। अगस्त 1901 के बाद से इस साल का अगस्त महीना सबसे गर्म दर्ज किया गया और आईएमडी ने सितंबर में भी सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान जताया है।

आईआईटी गांधीनगर के कंबाइंड ड्रॉट इंडेक्स के मुताबिक देश में सूखा प्रभावित क्षेत्र जुलाई के अंत में 35.1 प्रतिशत से बढ़कर 2 सितंबर तक 42 प्रतिशत पर पहुंच गया है। 3 सितंबर तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण लॉन्ग-पीरियड एवरेज से 3 फीसदी और पिछले साल के मुकाबले 18 फीसदी कम था। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक जैसे प्रमुख रबी उत्पादक राज्यों में जलाशयों का स्तर विशेष रूप से कम है।

सितंबर महीना तय करेगा दिशा

रबी की फसल देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा होती है। इसमें अकेले गेहूं का योगदान रबी उत्पादन में करीब 70 फीसदी है। क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि अगर सितंबर में भी बारिश की कमी बनी रहती है और मौसम की यह विषमता सर्दियों के मौसम में फैलती है तो इसका दबाव ग्रामीण मांग, खाद्य पदार्थों की कीमतों और देश की कुल कृषि विकास दर पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

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