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अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी में ISRO, 10 साल में बनकर होगा तैयार

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ISRO अब अपनी उपलब्धियों में एक और अध्याय जोड़ने की तैयारी कर रही है। यह मिशन अंतरिक्ष में अपना ठिकाना यानी स्पेस स्टेशन बनाने का है। इसके लिए इसरो ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। ये स्पेस स्टेशन अगले 10 साल में बनकर तैयार होगा। आइए जानें इसकी पहली उड़ान कब होगी

MoneyControl Newsअपडेटेड Jan 24, 2026 पर 7:41 PM
अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी में ISRO, 10 साल में बनकर होगा तैयार
बीएएस को स्वदेशी संसाधनों और तकनीक की मदद से आईएसएस की तर्ज पर विकसित किया जाएगा।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (ISRO) ने भारत सरकार के स्वदेशी मिशन के तहत एक कदम और आगे बढ़ने का फैसला किया है। देश का यह बेहद सम्मानित संस्थान अंतरिक्ष में अपना ठिकाना यानी स्पेस स्टेशन खड़ा करने की योजना पर काम कर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station) का पहला मॉड्यूल 2028 में अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। 140 करोड़ भारतीयों का सपना पूरा होने में और काम करने लायक बनने में लगभग 10 साल का समय लगेगा। बीएएस 2035 तक पूरी तरह से विकसित स्पेस स्टेशन बन सकेगा।

हाल ही में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) ने भारतीय कंपनियों से बीएएस-01 मॉड्यूल (BAS-01 module) के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट (EoI) की मांग की है। बीएएस को स्वदेशी संसाधनों और तकनीक की मदद से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। शुरुआत में इसमें 3-4 अंतरिक्ष यात्रियों के ठहरने की क्षमता होगी और ये धरती की निचली कक्षा से लगभग 400-450 किमी ऊपर स्थापित होगा। सभी 5 मॉडयूल के साथ यह अंतरिक्ष स्टेशन पूरी तरह तैयार हो जाएगा।

कंपनियों के लिए सख्त हैं मानक

इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने की चाह रखने वाली कंपनियों के लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। इनके पास कम से कम 5 साल का एरोस्पेस निर्माण का अनुभव होना चाहिए। पिछले 3 वर्षों में औसत वार्षिक टर्नओवर कम से कम 50 करोड़ हो। आवेदन करने की अंतिम तिथि 8 मार्च 2026 तय की गई है। यह परियोजना केवल एक स्टेशन बनाने तक सीमित नहीं है। यह भारत के गगनयान मिशन का अगला चरण है।

स्‍पेस स्‍टेशन की जरूरत क्‍यों?

इसरो का मानना है कि भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन देश के वैज्ञानिक और तकनीकी भविष्य में अहम भूमिका निभाएगा। यहां माइक्रोग्रैविटी में दीर्घकालिक प्रयोग किए जा सकेंगे (मानव शरीर पर अंतरिक्ष वातावरण के प्रभावों का अध्ययन होगा और नई तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा) जो भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए जरूरी होंगे।

BAS-01 मॉड्यूल क्‍या है?

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