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Sambhal Violence: संभल हिंसा मामले में आरोपी को बड़ी राहत! सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द की, UP सरकार पर लगाया ₹10 लाख का जुर्माना

Sambhal Violence Case: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल हिंसा मामले में एक आरोपी मुल्ला अफरोज को NSA के तहत गैर-कानूनी रूप से हिरासत में रखने के लिए यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की हिरासत को रद्द कर दिया है

Akhilesh Nath Tripathiअपडेटेड Sep 29, 2026 पर 12:34 PM
Sambhal Violence: संभल हिंसा मामले में आरोपी को बड़ी राहत! सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द की, UP सरकार पर लगाया ₹10 लाख का जुर्माना
Sambhal Violence Case: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है

Sambhal Violence Case: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 सितंबर) को 2024 की संभल हिंसा मामले के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत लिए गए हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें हिरासत के आदेश को बरकरार रखा गया था। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के आदेश को अवैध बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी आरोपी के इकबालिया बयान को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उसे हिरासत में रखने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत को रद्द कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 2024 में संभल में हुई सांप्रदायिक हिंसा में मुल्ला अफरोज की कथित भूमिका को लेकर अक्टूबर 2025 में उसके खिलाफ कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी। शीर्ष अदालत ने अवैध हिरासत का आदेश पारित करने के लिए सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

क्या है NSA?

आपको बता दें कि रासुका यानी NSA केंद्र और राज्य सरकारों को व्यक्तियों को हिरासत में लेने का अधिकार देता है, ताकि उन्हें भारत की रक्षा के लिए प्रतिकूल तरीके से कार्य करने से रोका जा सके। हिरासत की अधिकतम अवधि 12 महीने है। हालांकि इसे इससे पहले भी रद्द किया जा सकता है। रासुका के तहत स्थानीय प्रशासन हिरासत का आदेश जारी कर सकता है, जिसे हाई कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले एक बोर्ड से अनुमोदित कराना होता है। चूंकि यह गिरफ्तारी नहीं बल्कि हिरासत होती है। इसलिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती।

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