Where is Jobs in India: बड़े शहरों में अब रोजगार के रिकॉर्ड मौके बन रहे हैं। हालांकि इनमें से अधिकतर नौकरियां सर्विसेज सेक्टर में आ रही हैं, न कि फैक्ट्रियों या एग्रीकल्चर सेक्टर में। इससे देश की शहरी अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत मिल रहा है। MoSPI (मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटेस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्ंलीमेंटेशन) के तहत NSO (नेशनल स्टैटेस्टिक्स ऑफिस) की 'लेबर मार्केट डाइनेमिक्स इन मिलियन प्लस सिटीज' रिपोर्ट से यह बात सामने आई है। पीरियड लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के आधार पर बनी इस रिपोर्ट के अनुसार 10 लाख से अधिक आबादी वाले 46 शहरों में रोजगार के सबसे अधिक मौके ट्रांसपोर्ट, कम्युनिकेशन और कई प्रकार की सर्विसेज हैं।
शहरी रोजगार में अब खेती का हिस्सा अब बहुत कम रह गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 से लगातार काम करने वाले और इसकी तलाश करने वालों की संख्या यानी लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन बढ़ रही है और बेरोजगारी गिरकर 4.8% पर आ गई।
शहरों में सिर्फ 1.6% खेती पर निर्भर
सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में सिर्फ 1.6% वर्कर्स ही खेती के काम पर लगे हुए हैं जबकि अन्य शहरों में यह आंकड़ा 10.1% है। वहीं दूसरी तरफ 13.6% वर्कर्स ट्रांसपोर्ट, स्टोरेज और कम्युनिकेशन में हैं तो 31.5% वर्कर्स फाइनेंस, रियल एस्टेट, प्रोफेशनल सर्विसेज, एडुकेशन, हेल्थकेयर और पब्लिक ऐड में लगे हुए हैं। इससे संकेत मिल रहा है कि बड़े शहर में नौकरियां पारंपरिक क्षेत्रों से हटकर लॉजिस्टिक्स, कम्युनिकेशंस और हाई-वैल्यू वाली सर्विसेज की तरफ बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले यानी बड़े शहरों में रेगुलर सैलरीड जॉब्स की 58.5% हिस्सेदारी है जबकि अन्य शहरों में यह आंकड़ा 42.9% है। बड़े शहरों में कैजुअल लेबर की सिर्फ 6.3% हिस्सेदारी है जबकि अन्य शहरों में यह 14.4% है। इसका मतलब है कि बड़े शहरों में जॉब्स अधिक स्थायी और फॉर्मल हैं। एक और अहम बात ये है कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले बड़े शहरों में ऑर्गेनाइज्ड बिजनेसेज अधिक हैं और यहां 24.3% वर्कर्स सरकारी और प्राइवेट कंपनियों में हैं जबकि सभी शहरों में यह आंकड़ा 17.2% है।
इन आंकड़ों से संकेत मिल रहा है कि देश के बड़े शहरों में रोजगार तेजी से फॉर्मल इकॉनमी की तरफ बढ़ रहा है। वेतन की बात करें बड़े शहरों में अन्य शहरों की तुलना में कमाई अधिक है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में स्व-रोजगार में लगे लोगों की कमाई शहरी औसत से लगभग 34% और सैलरीड लोगों की करीब 10% अधिक है।