बसंत पंचमी का त्योहार मां सरस्वती के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मां सरस्वती को विद्या, संगीत, कला और ज्ञान की देवी माना जाता है, इसलिए इस दिन छात्र और विद्वान उनकी विशेष पूजा करते हैं। इसके अलावा भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा का भी इस दिन महत्व है।यह पर्व सिर्फ सरस्वती पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे तक्षक पूजा, बागेश्वरी जयंती और रति-काम महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इसे शुभ माना जाता है और इस दिन कई लोग नए काम की शुरुआत करते हैं।
इस साल बसंत पंचमी 3 फरवरी, सोमवार को मनाई जाएगी, क्योंकि पंचमी तिथि 2 फरवरी को दोपहर में शुरू होकर 3 फरवरी की सुबह तक रहेगी। यह त्योहार ज्ञान, प्रेम और नई ऊर्जा के संचार का प्रतीक है, जिसे पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है।
पंडित के अनुसार, इस साल बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा 3 फरवरी, सोमवार को माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाएगी। पंचमी तिथि 2 फरवरी को 11:53 बजे से शुरू होकर 3 फरवरी को 9:36 बजे तक रहेगी। इस दिन को ही बसंत पंचमी मनाना शुभ माना जाएगा।
बसंत पंचमी का सीधा संबंध प्रकृति से भी है। इस समय मौसम सुहावना होता है—न ज्यादा ठंड, न ज्यादा गर्मी। खेतों में पीली सरसों खिल उठती है, आम के पेड़ों पर बौर आ जाते हैं और हर ओर हरियाली छा जाती है। इस ऋतु को समृद्धि और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। यह दिन अबूझ मुहूर्त होता है, यानी किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए यह सबसे उत्तम समय माना जाता है। बच्चों को इस दिन पहली बार लिखने के लिए स्लेट और खड़िया दी जाती है, जिसे विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है।
उल्लास और उमंग का त्योहार
बसंत पंचमी सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में उल्लास और नई ऊर्जा का संचार करने वाला त्योहार भी है। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पतंगबाजी करते हैं और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। भोजपुर में इसे "पहला फगुआ" भी कहा जाता है, जहां अबीर-गुलाल उड़ाकर इस पर्व का आनंद लिया जाता है। कुल मिलाकर, बसंत पंचमी ज्ञान, उल्लास और प्रकृति के सौंदर्य का प्रतीक है, जो हमें जीवन में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।