इकोनॉमी को फास्ट लेन में लाने के लिए कई एलानों के बाद अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन का फोकस बजट पर हो गया है। वो इंडस्ट्री, बैंकिंग एंड फाइनेंस, एग्रीकल्चर और स्टार्टअप के नुमाइंदों से मुलाकात कर चुकी हैं। सबने अपने अपने सुझाव और मांगें वित्त मंत्री के सामने रख दी हैं। वित्त मंत्री ने हाल ही में कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का एलान किया था। अब इंडस्ट्री सरकार से खर्च बढ़ाने और पर्सनल इनकम टैक्स में कटौती करने की मांग कर रही है।

सरकार की कोशिशों के बावजूद इकोनॉमी स्लोडाउन के चक्र में फंसी हुई है। दूसरी तिमाही में जीडीपी साढ़े 4 परसेंट पर आ गई है जो 6 साल में सबसे कम है। अक्टूबर में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन माइनस 3.8 परसेंट रहा। ये लगातार तीसरे महीने निगेटिव में बना हुआ है। आठ कोर इंडस्ट्री की ग्रोथ भी लगातार तीसरे महीने निगेटिव में है। रिटेल महंगाई कंट्रोल में तो दिख रही है लेकिन चार महीने से लगातार उसका ग्राफ ऊपर चढ़ता दिख रहा है। और नवंबर में ये 5.54 परसेंट पर पहुंच गई है। नवंबर में पैसेंजर, कॉमर्शियल और टू-व्हीलर सेग्मेंट में गिरावट दर्ज की गई है।

जीएसटी को लेकर भी दिक्कतें बनी हुई हैं। कई सुधार और बदलावों के बाद भी कारोबारियों की शिकायतें बरकरार हैं। जीएसटी कलेक्शन भी सरकार की परेशानी की वजह बना हुआ है। छोटे-मझोले कारोबारियों को फंड मिलने में दिक्कत हो रही है। वो चाहते हैं कि सरकार इसका इंतजाम करे।

सवाल ये है कि सरकार ने जो कदम उठाए हैं उनके बाद भी इकोनॉमी में ग्रोथ क्यों नहीं दिख रही है? क्या इनका असर दिखने में अभी और समय लगेगा? या अब बुरा दौर खत्म होने वाला है और इकोनॉमी यहां से यू-टर्न लेगी। क्या वित्त मंत्री इसके लिए बजट में पर्सनल इनकम टैक्स में कटौती करके डिमांड बढ़ाने की कोशिश करेंगी? और कहीं ऐसा तो नहीं कि हमसे इकोनॉमी के मर्ज को समझने में गलती हो रही है? और इसलिए सारे बूस्टर डोज फेल हो रहे हैं।

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