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Budget 2021: कृषि क़ानूनों पर हो रही अराजकता का कड़ा जवाब है बजट

लगातार बढ़ते सरकारी घाटों की वजह से पहले भी पीएम किसान सम्मान निधि बढ़ने की उम्मीद नहीं थी लेकिन किसानों के उग्र आंदोलन ने सरकार को भी कड़े फैसले लेने को मजबूर किया

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 03, 2021 पर 6:54 PM
Budget 2021: कृषि क़ानूनों पर हो रही अराजकता का कड़ा जवाब है बजट

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

अराजक हो चले किसान आंदोलन के दौर में किसानों को अपने पक्ष में लाने के लिए सरकार की तरफ़ से उनको सीधे कुछ रक़म या राहत दी जा सकती है, इस अनुमान को बजट में सरकार ने पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। यह चर्चा लगातार हो रही थी कि सरकार बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की रक़म प्रतिवर्ष 6000 रुपये से बढ़ाकर 10000 रुपये कर सकती है।

हालांकि, लगातार बढ़ते वित्तीय घाटे के दौर में न तो इसकी गुंजाइश थी और न ही ज़रूरत। क्योंकि सीधे किसानों के हाथ में रक़म देते रहना और उसे बढ़ाते जाना उसी तरह से खतरनाक है, जैसे देश में किसानों के एक छोटे से ही सही, लेकिन बेहद ताकतवर किसानों के समूह को न्यूनतम समर्थन मूल्य की आदत पड़ गई है।

और, इसका नुक़सान खेती में नये प्रयोग करने की उनकी इच्छा का लगातार ख़त्म होते जाना है। धान की खेती की वजह से पंजाब की बंजर होती और बीमारी की वजह बनती ज़मीन तो ख़तरनाक है ही। इसीलिए बजट के पहले भी मुझे पूरा भरोसा था कि सरकार प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की रक़म नहीं बढ़ाने वाली, लेकिन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ अफ़वाह पर अराजक हो चुके आंदोलन पर टिप्पणी बजट में ज़रूरी थी और वह टिप्पणी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की तरफ़ से बहुत विस्तार से आई।

कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे किसान यूनियन के नेता पंजाब में किसानों के एक समूह को यह समझाने में तो कामयाब रहे ही हैं कि उनको न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना बंद हो जाएगा और नये कृषि क़ानून से मंडियां धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएंगी। हालांकि, इन दोनों ही मामलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, पूरी सरकार और पूरी पार्टी सफ़ाई लगातार दे रही है, लेकिन बजट एक प्रमाणिक दस्तावेज होता है और, इसीलिए बजट में इस पर वित्त मंत्री की तरफ़ से स्पष्चता आना ज़रूरी था।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकारी ख़रीद के आंकड़े बताने के साथ ही एपीएमसी मंडियों की बेहतरी के लिए बजट प्रस्ताव देकर किसान यूनियन के नेताओं को आईना दिखाने की कोशिश की है। कृषि क़ानूनों को लेकर अराजकता की हद तक गये यूनियन के नेताओं के लिए बजट में वित्त मंत्री के बताए आंकड़ों को ख़ारिज करना आसान नहीं है।

इन आंकड़ों के साथ एक बार फिर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि किसानों की बेहतरी के रास्ते से पीछे नहीं हट सकते। वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार ने उपज की सरकारी ख़रीद लगातार बढ़ाई और लागत से डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया।

वित्त मंत्री ने बजट भाषण में बताया कि 2013-14 मनमोहन सरकार के आख़िर में गेहूं की सरकारी ख़रीद 33,874 करोड़ रुपये की हुई थी और मोदी सरकार में 2019-20 में 62,802 करोड़ रुपय की गेहूं की सरकारी ख़रीद हुई और 2020-21में 75,000 करोड़ रुपये की सरकारी ख़रीद हुई। मोदी सरकार में ही 2019-20 में 35.57 लाख किसानों को सरकारी ख़रीद का लाभ मिला और मोदी सरकार में 2020-21 में 43.36 लाख किसानों को सरकारी ख़रीद का लाभ मिला।

2013-14 में धान की सरकारी ख़रीद 63,928 करोड़ रुपये की हुई थी और 2019-20 में 1,41,930 करोड़ रुपये और 2020-21 में 1,72,752 करोड़ रुपये की सरकारी ख़रीद मोदी सरकार ने की थी। अराजक किसानों नेताओं द्वारा फैलाए जा रहे दूसरे भ्रम का भी जवाब बजट में वित्त मंत्री ने दिया है। APMC मंडियों में बुनियादी सुविधाएं बेहतर करने के लिए एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्टचर फंड का उपयोग किया जा सकता है। 1,000 नई मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक मंडी सिस्टम से जोड़ा जाएगा। ग्रामीण बुनियादी क्षेत्र के लिए 40,000 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान है जो पिछले साल से 10,000 करोड़ रुपये ज़्यादा है। कृषि क़र्ज़ 16.5 लाख करोड़ देने का लक्ष्य रखा गया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण और बजट प्रस्तानों से स्पष्ट है कि मोदी सरकार किसानों के भले के लिए चली आ रही किसी भी पारंपरिक व्यवस्था को ख़त्म नहीं करने जा रही है, लेकिन यह भी ज़्यादा स्पष्ट हुआ है कि पारंपरिक व्यवस्था से किसान की बेहतरी हो पाना असंभव दिख रहा है और, इसीलिए पारंपरिक के साथ आधुनिक व्यवस्था को भी तेज़ी से लागू किया जाएगा। तीनों कृषि कानून आधुनिक कृषि व्यवस्था के ज़रिये किसानों की स्थिति सुधारने का पक्का दस्तावेज हैं और सरकार किसानों की बेहतरी का रास्ता तैयार करने के लिए हरसंभव कोशिश में लगी हुई है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और हिंदी ब्लॉगर हैं)

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