भुवन भास्कर

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के लिए 2021-22 का बजट पेश करना किसी चुनौती से कम नहीं है। एक ओर तो उद्योग हैं, जो कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के जानलेवा झटके से उबरने के लिए वित्त मंत्री के भाषण पर कान लगाए बैठेंगे, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ता हैं, जिनके लिए बीता साल छंटनी, वेतन कटौती और ऐसी ही दूसरी मुश्किलों से भरा रहा और जो अब वित्त मंत्री से उम्मीद कर रहे हैं कि बजट में कुछ तो ऐसा आए ताकि उनकी आर्थिक दुश्वारियां कम हों। लेकिन वित्त मंत्री की असली मुश्किल न तो उद्योग हैं और न ही उपभोक्ता। इसलिए कि ऐसी परिस्थितियों के लिए सरकार के पास कई किताबी समाधान मौजूद हैं।

सरकार राजस्व घाटे को अपने लक्ष्य के पार जाने का कैलकुलेटेड रिस्क लेते हुए ग्रोथ पर पूरा ध्यान देगी, यह लगभग तय है। या दूसरे शब्दों में कहें, तो सरकार के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। लेकिन जहां सरकार की असली मुश्किल है, वह है कृषि और किसान। खेती-बाड़ी को लेकर मोदी सरकार की नीतियों में पिछले 7 सालों में एक निरंतरता रही है। सरकार का फोकस कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाना और मार्केटिंग के तरीके में गुणात्मक परिवर्तन करना रहा है।

इस दिशा में प्रशासनिक और वैधानिक, दोनों ही तरीकों से कई प्रयास हुए हैं। इसकी शुरुआत 19 फरवरी 2015 से हुई थी जब राजस्थान के सूरतगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की शुरुआत की। अगले साल 2016 में 14 अप्रैल को इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की शुरुआत की गई। दिसंबर 2017 में इलेक्ट्रॉनिक निगोशिएबल वेयरहाउसिंग रिसीट (ईएनडब्ल्यूआर) की शुरुआत हुई। इसी तरह मॉडल लैंड लीजिंग एक्ट (2016), मॉडल एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एंड लाइवस्टॉक मार्केटिंग एक्ट (2017) और मॉडल एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एंड लाइवस्टॉक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट (2018) दूसरी तरह के प्रयास हैं, जिनके लिए कानून का सहारा लिया गया।

साल 2017 में नरेंद्र मोदी ने अगले 5 साल में किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य घोषित किया, जिसे अर्थशास्त्रियों ने पहले दिन से ही नामुमकिन करार दिया। लेकिन मोदी सरकार के तमाम बजटों में इसे लक्ष्य रखते हुए ही अलग-अलग घोषणा हुईं। आंकड़ों के लिहाज से देखें, तो इन घोषणाओं का किसानों की आमदनी पर बहुत बड़ा फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखा है क्योंकि मोदी 1.0 के 5 सालों में कृषि की औसत वृद्धि दर 3% रही। लेकिन इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं कि सरकार ने दशकों से भारतीय कृषि और किसान की प्रगति की राह में बेड़ियां बनी व्यवस्था को आमूलचूल बदलने की दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं, जिनका परिणाम आने में कई वर्ष लग सकते हैं।

हालांकि इन सब प्रयासों में एक बड़ी कमी रही है। सरकार ने बिना पुरानी व्यवस्था को दुरुस्त किए नए कार्यक्रमों को लागू करने की कोशिश की, जिसका परिणाम सामने है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2011 तक देश में मृदा जांच के लिए सिर्फ 1049 प्रयोगशालाएं थीं जिनकी सैंपल क्षमता 107 लाख सालाना थी।

इसकी तुलना यदि 40 करोड़ एकड़ कृषि योग्य भूमि से की जाए, तो समझा जा सकता है देश के अंतिम किसान को अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण करवाने में कितने साल का समय लगने वाला है। कुछ इसी तरह की जमीनी तैयारी के अभाव में ई-नाम योजना लगभग 5 साल बाद 1000 मंडियों में लागू होने के बाद भी अपनी छाप छोड़ने में नाकाम रही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बेहतरीन होने के बावजूद अपनी कमियों से नहीं उबर पा रही और दो सालों से बजट में जीरो बजट प्राकृतिक खेती और जैविक खेती की बातें होने के बावजूद अब तक इस बारे में कोई ठोस योजना शुरू नहीं हो सकी है। दरअसल इसके लिए अब तक सरकार ने कोई संस्थागत प्रयास ही शुरू नहीं किया है।

इस पृष्ठभूमि में यदि 2021-22 के बजट की विशलिस्ट खंगाली जाए, तो सरकार की चुनौतियां जाहिर हो जाती हैं। खास तौर पर इसलिए भी कि यह बजट एक ऐसे किसान आंदोलन के साए में पेश किया जाएगा, जो दशकों की प्रतीक्षा और मांग के बाद मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि सुधारों के विरोध में किया जा रहा है। इन आंदोलनों ने यह भी साफ कर दिया है कि भारत में कृषि सुधारों की राह किसी भी सरकार के लिए कितना कठिन है।

ई-नाम के खिलाफ आढ़तियों की लॉबिंग इतनी जबर्दस्त है कि कई बीजेपी शासित राज्य भी इस पर कदम बढ़ाने में बगलें झांकने लगते हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने में अरबों डॉलर की कीटनाशक इंडस्ट्री बाधा बनने लगती है और अब किसानों को अपनी फसलें बेचने की आजादी देने के खिलाफ किसानों का ही वह वर्ग उठ खड़ा हुआ है जो 50 वर्ष पहले खड़ी गई गई कृषि विपणन की एकाधिकारवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभार्थी है।

इसलिए 1 फरवरी को निर्मला सीतारमन को अपने बजट में लंबी अवधि की नीतिगत घोषणाओं के साथ किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था भी देनी होगी, जिससे किसान को तुरंत लाभ हो और उसकी आमदनी में जल्दी से जल्दी मजबूती का रास्ता खुले।

इसमें एक रास्ता खाद सब्सिडी को कंपनियों के जरिए देने के बजाय सीधे किसान के खाते में ट्रांसफर करना हो सकता है। किसान के लिए इनपुट का खर्च कृषि की कुल लागत का 40-50 प्रतिशत होता है, जबकि कीटनाशकों में कंपनियां और खुदरा व्यापारी 100 से लेकर 1000 प्रतिशत तक मुनाफाखोरी करते हैं। यदि इंसानों की दवाओं के एमआरपी को लागत मूल्य से जोड़ा जा सकता है, तो पौधों की दवाओं के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता। यदि सरकार यह कर सके, तो इससे किसानों की जेब से निकलने वाले अरबों रुपयों को उनकी बचत में बदला जा सकेगा।

इसके अलावा देश के हर जिले में मौजूद केवीके की शाखाएं बढ़ाकर उन्हें ब्लॉक स्तर तक करने की जरूरत है और उन्हें मजबूत बनाकर खेती के इनक्युबेशन सेंटर में विकसित किया जाना चाहिए, जहां से किसानों को खेती से जुड़ी हर जानकारी और सुविधा मिल सके। कुल मिलाकर 2021-22 के बजट में नई नीतियां, नए दर्शन और नए सैद्धांतिक दिशा-निर्देशों के बजाए कुछ ऐसे शक्तिशाली कदमों की आवश्यकता है, जो किसानों को तुरंत आमदनी और खेती, दोनों लिहाज से ग्रोथ दे सकें।

(लेखक आर्थिक और कृषि मामलों के जानकार हैं) 

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