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बजट 2021: बजट भाषण वादे सुन लिये तो अब आमदनी-खर्च का हिसाब देखिए!

बजट में फाइनेंस मिनिस्टर के वादों को सुनकर क्या आपको भी ये याद आया- 'कसमे, वादे, प्यार, वफा सब बाते हैं बातों का क्या'

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 04, 2021 पर 2:39 PM
बजट 2021: बजट भाषण वादे सुन लिये तो अब आमदनी-खर्च का हिसाब देखिए!

चंदन श्रीवास्तव

बात चाहे जितनी नयी हो लेकिन अगर आप खुद पुराने हैं तो बात के मायने-मतलब निकालने की कोशिश में आपको अक्सर पुराने गाने याद आते हैं। बजट-भाषण तो नई सदी ,नये दशक और नये साल का था लेकिन उसमें किये गये वादों को सुनकर आधी सदी पुरानी फिल्म उपकार का एक गाना याद आ गया-"कसमे, वादे, प्यार, वफा सब बाते हैं बातों का क्या"..!

जहां तक वादा करने का मामला है इस बार का बजट-भाषण पिछले बजट-भाषण से उन्नीस नहीं इक्कीस ही था, जैसे-पीएम स्वस्थ भारत योजना का ऐलान जिसका मकसद स्वास्थ्य सेवाओं का सिर से पांव तक कायाकल्प करने का है। ऐसा ही एक ऐलान मिशन पोषण 2.0 नाम से हुआ। मकसद ये बताया गया कि पोषण के मोर्चे पर बाकियों की तुलना में एकदम फिसड्डी चल रहे 112 जिलों में पोषण के मानकों को सुधारने के लिए ये मिशन चलाया जायेगा। जल जीवन मिशन (शहरी) की घोषणा हुई, मंशा ये है कि शहरी इलाकों में जलापूर्ति की दशा सुधारी जाये। शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत मिशन को मजबूत करने का इरादा जाहिर किया गया।

पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु जैसे चुनाव वाले राज्यों को ध्यान में रखकर हाईवे और सड़कों के निर्माण पर जोर देने की बात कही गई। एक सौ नये सैनिक स्कूल और जनजाति बहुल इलाकों में 750 एकलव्य स्कूल खोलने तथा लद्दाख में नई सेंट्रल युनिवर्सिटी बनाने के इरादे का इजहार हुआ। कृषि उपज विपणन की सरकारी मंडियों के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने के लिए एक लाख करोड़ के एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड बनाने की घोषणा हुई। संक्षेप में ये कि अगर आप बजट को आम आदमी की रोजमर्रा की बुनियादी जरुरतों और सामाजिक विकास के कोण से देख रहे हैं तो बजट-भाषण में वादे इतने चमकदार किये गये हैं कि आपके मुंह से सिर्फ "वाह" निकले।

पिछले वादों का हश्र

लेकिन वादे की अहमियत उनके पूरा होने से है। सो, असल सवाल ये है कि क्या सामाजिक विकास के जो वादे बजट-भाषण में किये गये वे पूरे होंगे या फिर वे लोगों के बीच कही गई एक बात भर बनकर रह जायेंगे, जैसा कि उपकार फिल्म के उस गीत में आया है ? अच्छा है, इस सवाल का जवाब टटोलने के लिए पिछले वादों पर गौर करें, ये देखें कि सामाजिक विकास के कार्यक्रमों के लक्ष्यों और आबंटित राशि को खर्च करने के मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा है। वित्तीय मामलों के तथ्य एकत्र करने वाले व्यावसायिक फर्म ब्लूमबर्ग का हाल का एक आकलन बताता है कि पिछले दो वित्तवर्षों में सामाजिक विकास के कुछ अहम कार्यक्रमों पर सरकार ने कम राशि खर्च की और निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने से पीछे रही।

मिसाल के लिए, गांवों में सड़क बनाने और दूर-दराज के इलाकों को मुख्य मार्गों और बड़े बाजार से जोड़ने के मकसद से साल 2000 में शुरु हुई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को ले सकते हैं। इसे गरीबी कम करने की एक तरकीब मानकर शुरु किया गया था। ब्लूमबर्ग का आकलन बताता है कि योजना पर पिछले तीन वित्तवर्षों में खर्चा घटा है। यही हाल 2011 में शुरु की गई और 2015 में भारतनेट प्रोग्राम नाम दी गई योजना का है।

इस योजना का मकसद साल 2022 तक ढाई लाख ग्राम-पंचायत तक हाईस्पीड ब्राडबैंड सेवा मुहैया कराना है। ब्लूमबर्ग का आकलन बताता है कि पिछले तीन वित्तवर्षों में इस कार्यक्रम पर बजट एस्टिमेट की तुलना में बहुत कम खर्चा हुआ जबकि डिजिटल इंडिया बनाने के स्वप्न और इंटरनेट के एक्सेस के मामले में लोगों के बीच कायम गैर-बराबरी को दूर करने के लिहाज से इस योजना का कामयाब होना एक जरुरी शर्त की तरह है।

स्वच्छ भारत योजना पर भी पिछले दो वित्तवर्षों में बजट-एस्टिमेट की तुलना में वास्तविक खर्चा कम हुआ है जबकि सेहत और पोषण के मानकों पर खरा उतरने के लिहाज से इस योजना की तेज प्रगति बहुत जरुरी बतायी जाती है । साल 2015 में शुरु हुई शहरों के आधुनिकीकरण के स्मार्टसिटी मिशन पर भी पिछले वित्तवर्ष में बजट एस्टिमेट से कम खर्च हुआ जबकि विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस शहर बिजनेस में आसानी और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिहाज से अहम कहे जाते हैं। 

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया

दरअसल आमदनी-खर्च का हिसाब देखें तो जान पड़ेगा कि सरकार बड़े वादे करने की स्थिति में थी ही नहीं। बाजार में किसी के बड़े बोल तभी गंभीर माने जाते हैं जब जेब भरी हो। आप अठन्नी की आमदनी में रुपैया खर्चा करने की दरियादिली नहीं पाल सकते जबकि सरकार ने यही किया।

गौर करें, वित्तमंत्रालय के अन्तर्गत काम करने वाले कंट्रोलर जेनरल ऑफ अकाउंटस् के दिसंबर 2020 तक के आंकड़ों पर। इन आंकड़ों से सरकार के जमा-खर्च की तस्वीर साफ होती है। सरकार को दिसंबर तक टैक्स तथा सूद आदि से 11.2 लाख करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई। यह चालू वित्तवर्ष के बजट में लगाये गये अनुमान से 50 फीसद कम है। कहा जा सकता है कि अभी इस वित्तवर्ष के चंद माह शेष हैं और कुछ रकम और आ ही जायेगी। बेशक, कुछ आमद हो जायेगी लेकिन अब ये तो नहीं कह सकते ना कि आमद इतनी हो जायेगी कि 50 फीसद कमी की भरपायी हो जाये।

आमदनी घटी लेकिन सरकार ने कोविड-काल की जरुरतों को देखते हुए खर्चा बढ़ाया। कंट्रोलर जेनरल ऑफ अकाउंटस के आकंड़े बताते हैं कि चालू वित्तवर्ष के दिसंबर माह तक सरकार का खर्चा 22.8 लाख करोड़ रुपयों का रहा। यह बजट में लगाये गये अनुमान का 75 फीसदी है। खर्चे के मोर्चे पर हिसाब अगर बजट अनुमान के मुताबिक(आप मान सकते हैं कि शेष बचे महीने में 25 फीसद रकम खर्च हो जायेगी) दिख रहा है तो इसलिए कि आमदनी और खर्चे के अन्तर को पाटने के लिए देशी और विदेशी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं से उधारी ली गई।

घरेलू बाजार से सरकार ने 11.2 लाख करोड़ की उधारी ली जो बजट एस्टिमेट से 141 प्रतिशत अधिक है और विदेशी वित्तीय संस्थाओं से 42,000 करोड़ का कर्जा लिया गया जो बजट एस्टिमेट से 909 प्रतिशत अधिक है। उधारियों और कर्जे का ये बोझ ठीक जान पड़ता अगर खर्चे के मामले में जोर सामाजिक विकास पर होता। आखिर कोरोना-काल में असल सवाल लोगों का जीवन और जीविका बचाने का था। लेकिन कंट्रोलर जेनरल ऑफ अकाउंटस् के तथ्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के कामों से सीधे जुड़े मंत्रालयों ने कोरोना-काल के चंगुल में गुजरे साल में अपने बजट एस्टिमेट से बहुत कम खर्च किया।

बजट एस्टिमेट की तुलना में सबसे कम खर्च करने वाले मंत्रालयों में अव्वल रहा अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय। इसने अपने बजट एस्टिमेट का बस 29 फीसद हिस्सा खर्च किया। रोजगार देने के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइज का मंत्रालय दिसंबर (2020) तक अपने बजट एस्टिमेट का केवल 39 प्रतिशत खर्च कर पाया था।

पोषण के मानकों के मामले में सर्वाधिक फिसड्डी देशों में शुमार भारत का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय अपने बजट एस्टिमेट की आधी राशि भी दिसंबर तक लोगों पर ना खर्च पाया था। शिक्षा मंत्रालय (59 प्रतिशत) और आदिवासी मामलों के मंत्रालय (52 प्रतिशत) की बात हो या फिर हाऊसिंग एंड अर्बन अफेयर्स(56 प्रतिशत) के मंत्रालय की, इनमें से कोई अपने बजट एस्टिमेट का 60 फीसद हिस्सा भी नहीं खर्च कर पाया था। इस कड़ी में स्वास्थ्य मंत्रालय खर्च करने के मामले में तनिक अच्छा (बजट एस्टिमेट का 88 प्रतिशत) नजर आयेगा लेकिन कोरोना-काल की जरुरतों पर नजर रखें तो लगेगा उसका भी खर्चा बढ़ी हुई जरुरतों के हिसाब से बहुत कम रहा।

वैसे सरकार के मंचों से कहा यही जा रहा था कि कोरोना-काल में सरकार सामाजिक विकास के मद में अपने दोनों हाथ खोलकर खर्च कर रही है लेकिन कंट्रोलर जेनरल ऑफ अकाउंटस् के आंकड़े इससे अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।

इस मद में बढ़ाओ और उस मद में घटाओ

अब आप इस बात पर खुश हो सकते हैं कि सरकार ने इस बार स्वास्थ्य-सुविधाओं के मद में बजट आबंटन में जबर्दस्त इजाफा (137 प्रतिशत) किया है और कोविड से बचाव के लिए जरुरी वैक्सिनेशन के एवज में अच्छी-खासी रकम (38 हजार करोड़) खर्च करने की हिम्मत दिखायी है लेकिन इस खुशी से होठों पर खिलने वाली मुस्कुराहट की लंबाई ये याद करके निश्चित ही कुछ इंच कम हो जायेगी कि कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर बजट आबंटन इस बार के बजट में घट गया है जबकि कृषि इस देश में 60 फीसद लोगों की जीविका का बड़ा आसरा है।

एक ऐसे वक्त में जब अपनी घटती आमदनी की आशंकाओं के साथ राजधानी की सीमाओं पर एक विराट किसान-आंदोलन मंडरा रहा है, समाचारों में धीमे स्वर में ही सही ये बात दर्ज हो चुकी है कि सरकार ने 2021-22 के लिए कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का आवंटन पिछले बजट के 1,42,711 करोड़ से घटाकर 1,31,474 करोड़ रुपये कर दिया है। फसलों के लिए मिलने वाले छोटी अवधि के कर्जे के सूद पर मिलने वाली सब्सिडी भी पिछले बजट की तुलना में घटी है। किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिहाज चली मूल्य समर्थन योजना के तहत सरकारी एजेंसियां तिलहन और दालों की खरीद करती हैं। इस मद में भी बजट घटाकर पिछले बजट के 2000 करोड़ से वित्तवर्ष 2021-22 के लिए 1500 करोड़ कर दिया गया है। बजट-भाषण तो हो गया लेकिन कहीं ये जिक्र नहीं आया कि 2022 तक किसानों की आमदनी दुगना करने के सरकारी वादे का क्या हुआ ?

अगर सामाजिक विकास के लिहाज से देखें तो इस बार का बजट आपको एक जगह खर्च कम करके दूसरी जगह खर्च बढ़ाता नजर आयेगा और बजट दस्तावेज अपनी इबारत के बीच आपसे कहता मिलेगा कि कोविड काल में चाहे जीविका बचा लो या जीवन-अब मर्जी तुम्हारी है! 

(लेखक सामाजिक सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)

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