भुवन भास्कर

वर्ष 2021-22 के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने जो सुधारात्मक फैसले किए, उसके लिए तो उन्हें चारों तरफ से वाहवाही मिल रही है, लेकिन एक काम उन्होंने और किया है, जिस पर चर्चा कम हुई है। सीतारमन ने अपने बजट भाषण में बताया कि 2020-21 देश का राजकोषीय घाटा 9.5 प्रतिशत पहुंच गया, जो रुपये के लिहाज से देखें तो 1848655 करोड़ है। यदि पिछले बजट में रखे गये राजकोषीय घाटे के 3.5 प्रतिशत लक्ष्य यानी 796337 करोड़ रुपये से इसकी तुलना करें, तो यह अंतर विशाल है।

यदि यह बजट सामान्य परिस्थितियों में आया होता, तो इस आंकड़े ने मीडिया और विशेषज्ञों के बीच तहलका मचा दिया होता। लेकिन कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में क्योंकि पहले से ही राजकोषीय घाटे के 7 प्रतिशत से ज्यादा रहने की आशंका जताई जा रही थी, इसलिए 9.5 प्रतिशत के आंकड़े ने भी बहुत ज्यादा हलचल पैदा नहीं की। लेकिन यदि मान लें कि कोरोना की परिस्थिति पैदा नहीं हुई होती और सरकार ने राजकोषीय घाटे का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया होता, तो भी 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे का संशोधित अनुमान 307048 करोड़ रुपये ज्यादा होने वाला था। क्यों?

इस सवाल का जवाब सरकार के खर्चों का ब्योरा देखने से मिल सकता है। खाद्य सब्सिडी में 2020-21 का अनुमान 115570 करोड़ रुपये था, लेकिन वित्त मंत्री ने जो संशोधिन अनुमान पेश किया है, उसमें इसे बढ़ाकर 422618 करोड़ रुपये कर दिया गया है। आखिर ये पैसा कहां गया? वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण के पैराग्राफ 143 में यह बताया है। उन्होंने कहा, “अपने 2020-21 के बजट में, मैंने सरकार द्वारा भारतीय खाद्य निगम (FCI) को दिए गए कर्जों को शामिल करके कथन के स्कोप और कवरेज का विस्तार कर दिया। इस दिशा में और एक कदम उठाते हुए संशोधित अनुमान 2020-21 में और बजट अनुमान 2021-22 में बजटीय प्रावधान करके खाद्य सब्सिडी के लिए भारतीय खाद्य निगम को दिए जाने वाले NSSF लोन को बंद करने का प्रस्ताव करती हूं।”

साफ है कि सीतारमन ने FCI को बकाया 3 लाख करोड़ रुपये चुका कर उसका खाता क्लोज कर दिया है। यह अपने आप में भारत सरकार की अकाउंटिंग के लिहाज से एक बहुत बड़ी घटना है। दरअसल एफसीआई भारत सरकार की ओर से जो धान और गेहूं की खरीदारी एमएसपी पर करता है, उसे पीडीएस में बांटने के लिए बेहद कम दाम पर बेचता है। इस क्रम में उसे जो घाटा होता है, उसे केंद्र सरकार को पूरा करना होता है। लेकिन अब तक होता यह रहा था कि एफसीआई के घाटे का सिर्फ एक हिस्सा केंद्र देता था और बाकी की रकम उसे नेशनल स्मॉल सेविंग फंड (NSSF) से कर्ज के तौर पर लेना होता था।

इस तरह हालांकि सरकार अपने घाटे को कम कर दिखाती थी, लेकिन वास्तविकता यह थी कि उसकी देनदारी को वह अगले सालों पर टाल देती थी। इसे अकाउंटिंग फर्जीबाड़ा कहा जा सकता है, जिसके जरिए सरकारें राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के करीब रखने का काम करती थीं। जैसे 2019-20 में सरकार की एफसीआई को कुल देनदारी 317905 करोड़ रुपये थी। लेकिन वित्त मंत्री ने उसे सिर्फ 75000 करोड़ रुपये दिए। यानी लगभग 2.5 लाख करोड़ की देनदारी को अगले साल पर टाल कर अपना राजकोषीय घाटा उतना कम कर लिया।

कुछ यही काम सीतारमन ने अपने 2020-21 बजट में भी किया था, जब उन्होंने खाद्य सब्सिडी पर 115570 करोड़ रुपये का आवंटन किया था। लेकिन अपने बजट भाषण में उन्होंने साफ कर दिया कि न सिर्फ चालू साल में एफसीआई की पूरी देनदारी खत्म कर दी गई, बल्कि अगले साल 2021-22 के लिए भी इसके लिए 242836 करोड़ रुपये का प्रावधान कर दिया गया है। इतना ही नहीं, सीतारमन ने एक नीतिगत फैसला करते हुए यह भी घोषित कर दिया कि आइंदा से एफसीआई को एनएसएसएफ से कोई कर्ज नहीं लेना होगा। यानी यदि खाद्य सब्सिडी में खर्च और ज्यादा होता है तो उसे संशोधित अनुमान में अगले साल के बजट में जोड़ा जाएगा।

यह मोदी सरकार का अपने आप में एक बहुत बड़ा सुधारात्मक फैसला है, जिसका महत्व सिर्फ अकाउंटिंग के लिहाज से नहीं है। बल्कि एक तरह से मोदी सरकार ने दुनिया भर की उन रेटिंग एजेंसियों को भी धता बता दिया है, जो अपनी सॉवरेन रेटिंग से सरकारों और देशों की आर्थिक नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करती रहती हैं। ये वही एजेंसियां हैं, जो 2008 में लीमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने से कुछ महीनों पहले तक उसे ए ग्रेड की रेटिंग देते नहीं थक रही थीं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन का FCI की अकाउंटिंग साफ करना सरकार के मनोबल और दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है कि भारत का निर्माण भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप ही किया जाएगा। इसे एक तरह से आत्मनिर्भर भारत के लिए मोदी सरकार की प्रतिबद्धता की एक और घोषणा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

(लेखक आर्थिक और कृषि मामलों के जानकार हैं)

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