चंदन श्रीवास्तव

बीते साल विचित्र हुआ, जिन्दा रहने की शर्त ही बदल गई ! देश के हर परिवार ने महसूस किया कि इंटरनेट नहीं तो फिर जिन्दगी नहीं। जिंदगी के लिए सबसे ज्यादा जरुरी तीन चीजों में एक चीज और जुड़ गई बीते साल। कोविड-19 से पहले लोग-बाग कहते थे कि साफ हवा, स्वच्छ पानी और पौष्टिक भोजन का होना जिंदगी को कायम रखने के लिए जरुरी है लेकिन कोविड-19 के बाद के वक्त में सब महसूस कर रहे हैं कि इन तीन चीजों के साथ-साथ एक चीज और भी जरुरी है: इंटरनेट एक्सेस !

"कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट एक्सेस नहीं तो फिर जिंदगी नहीं"-कोविड-19 की भेंट चढ़ चुके साल 2020 में इस सच्चाई को देश के सभी परिवारों (24 करोड़ 80 लाख) ने महसूस किया। भारतीय परिवारों को ये सच्चाई सबसे ज्यादा महसूस हुई बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के मामले में। स्कूल-कॉलेज लगातार बंद रहे। कक्षाएं ऑनलाइन चलीं, परीक्षाएं ऑनलाइन हुईं और डिग्री-डिप्लोमा, सर्टिफिकेट्स भी ऑनलाइन बांटे गये। गरज ये कि जो ऑनलाइन नहीं थे वे शिक्षा दुनिया में प्रवेश से वंचित थे।

और, वित्तमंत्री जब नये साल के लिए बजट पेश कर रही होंगी तो देश के 25 करोड़ परिवार उनकी तरफ इस उम्मीद में देख रहे होंगे कि पढ़ाई-लिखाई के उम्र को जी रही देश की लगभग आधी आबादी को इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश दिलाने के लिए वे क्या योजनाएं सूझातीं और कितनी रकम आबंटित करती हैं।

इंटरनेट एक्सेस और शिक्षा का अधिकार कानून

जी हां, आपने आपने ठीक पढ़ा, अगर 25 साल तक की उम्र को पढ़ाई-लिखाई के लिहाज से सबसे अहम मानें तो फिर  देश की आधी आबादी(46.9 प्रतिशत, कुल 60 करोड़) अभी इसी उम्र को जी रही है। इस बड़ी तादाद के भीतर कुल 28 प्रतिशत लोग 14 साल तक की उम्र के हैं जिसे प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की शिक्षा की उम्र माना जाता है। इसी उम्र को पहुंची आबादी को निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा देने का वादा इस देश ने शिक्षा के अधिकार कानून के तहत एक दशक पहले किया था। (नई शिक्षा नीति में इस उम्र को बढ़ा दिया गया है)

कोविड-19 की बंदी में निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा हासिल करने की उम्र में पहुंची इस 28 प्रतिशत की आबादी को हासिल शिक्षा के अधिकार को सबसे ज्यादा चोट पहुंची क्योंकि कक्षाएं ऑनलाइन चलीं, कोर्स-वर्क ऑनलाइन पूरे हुए। परीक्षाएं ऑनलाइन हुईं और सर्टिफिकेट भी ऑनलाइन बंटे। ऐसे में देश के शिक्षा-जगत की एक बड़ी असमानता उजागर हुई। जो इंटरनेट-सम्पन्न और कंप्यूटर दक्ष थे वे अपनी पढ़ाई-लिखाई जारी रख सके। जो इंटरनेट-वंचित थे, स्मार्टफोन या लैपटॉप सरीखी चीजों की मिल्कियत से दूर और कंप्यूटरी कौशल से हीन थे, उनके लिए कोरोना-काल में शिक्षा हासिल करना कुछ वैसा ही मुश्किल था जैसे कि कोविड-19 के बीमार के लिए दवाई ढूंढ़ना।

आप कह सकते हैं कि कोरोनाबंदी के दौर में शिक्षा हासिल करने के हक और मुहैया करायी जा रही शिक्षा के बीच एक डिजिटल दीवार खड़ी थी। जो डिजिटल दीवार के इस तरफ अपने लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइस फोन और अबाधित इंटरनेट एक्सेस के साथ खड़े थे, उनके लिए शिक्षा का जगत खुला था। वे अपने हक को हासिल करने की स्थिति में थे।

लेकिन, डिजिटल दीवार के उस तरफ खड़े कंप्यूटर-मोबाइल वंचित, इंटरनेट-एक्सेस विहीन लोगों के लिए शिक्षा की दुनिया के दरवाजे बंद थे।कोरोनाबंदी के दौर में ऑनलाइन लर्निंग या कह लें ई-लर्निंग के चलन से देश के 15 लाख स्कूलों में पढ़ रहे कुल 32 करोड़ लोगों के शिक्षा के अधिकार पर एक ना एक रुप में चोट पड़ी और सबसे ज्यादा प्रभावित हुए समाज के वंचित तबके के परिवारों के बच्चे। गौर करें कि कोरोनाबंदी के पहले के वक्त में भी स्कूली शिक्षा से बाहर लगभग 32 मिलियन बच्चों में सर्वाधिक बच्चे इसी तबके के हैं। ई-लर्निंग के चलन ने शिक्षा के क्षेत्र में मौजूद गैर-बराबरी को और ज्यादा बढ़ाया है।

ई-लर्निंग और बुनियादी ढांचा

अगर कोरोनाबंदी के बाद के दौर में ई-लर्निंग के चलन को हम न्यू नॉर्मल मानकर चलें तो फिर शिक्षा की दुनिया के डिजिटलीकरण और इसके भीतर सबका अबाधित प्रवेश बराबरी के मूल्य और क्वालिटी एजुकेशन (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) के अधिकार को हासिल करने लिए जरुरी होगा और बजट में इसे प्राथमिक मानकर चलना होगा। ई-लर्निंग के बुनियादी ढांचे की अभी की हालत को देखते हुए मामला बहुत चुनौती भरा है।

ई-लर्निंग के लिए जरुरी है इसकी टेक्नॉलॉजी का उपलब्ध होना और टेक्नॉलॉजी का सबकी पहुंच में होना। लेकिन, अपने देश की स्कूली शिक्षा की दुनिया में इस सिलसिले की एक बड़ी बाधा तो बिजली ही है। ई-लर्निंग के लिए बहुत जरुरी है कि लोगों के घऱों में बिजली हो। लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय के साल 2017-18 के एक सर्वेक्षण के तथ्य बताते हैं कि भारत के केवल 47 फीसद घरों में 12 घंटे या इससे ज्यादा की अवधि में बिजली उपलब्ध होती है। कुल 36 प्रतिशत घर ऐसे हैं जिन्हें बिना बिजली के काम चलाना होता है।

और, ये स्थिति तब है जब देश में विद्युतीकरण का काम पूरा किया जा चुका है। बिजली हासिल करने के मामले में भारतीय घरों के बीच मौजूद ये गैर-बराबरी बताती है कि कुछ परिवारों के लिए तो ई-लर्निंग के न्यू नार्मल होने पर शिक्षा की दुनिया में अपनी दखल और चमक-धमक बनाये रखना आसान है लेकिन देश के कम से कम एक चौथाई परिवारों के लिए ई-लर्निंग बहुत दूर की कौड़ी है।

दूसरी बड़ी चुनौती है कंप्यूटर-स्मार्टफोन की मिल्कियत और इंटरनेट एक्सेस के मामले में भारतीय परिवारों के बीच मौजद गैर-बराबरी को दूर करना। एनएसएसओ के की इंडिकेटरस् ऑफ हाऊसहोल्ड सोशल कंज्प्शन एजुकेशन रिपोर्ट (2017-18) के मुताबिक देश के ग्रामीण अंचल के 15 प्रतिशत से भी कम परिवार ऐसे हैं जिन्हें इंटरनेट-एक्सेस करने वाला परिवार कह सकें जबकि शहरी अंचल के लगभग 42 प्रतिशत परिवार इंटरनेट-एक्सेस करनेवाले परिवारों की श्रेणी में शामिल हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महज 13 प्रतिशत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाते हैं। ग्रामीण स्त्रियों में इंटरनेट एक्सेस करने वालों की तादाद महज 8.5 प्रतिशत है। अखिल भारतीय स्तर पर देखें तो इंटरनेट एक्सेस करने वाला परिवारों की तादाद एक चौथाई से भी कम ( कुल परिवारों का 23.8 प्रतिशत)  है।

ऐसी गैरबराबरी कंप्यूटर की मिल्कियत के मामले में दिखती है। ग्रामीण क्षेत्रों में महज 4.4 प्रतिशत घरों में किसी ना किसी सदस्य के पास अपना कंप्यूटर/लैपटॉप है जबकि देश के शहरी अंचलों में ऐसे परिवारों की तादाद 23.4 प्रतिशत है। अखिल भारतीय स्तर पर कंप्यूटर या लैपटॉप से लैस परिवारों की संख्या लगभग 10 प्रतिशत है। और, जहां तक कंप्यूटरी कौशल यानि कंप्यूटर-लैपटॉप को चला सकने की काबिलियत का मामला है, देश में ग्रामीण अंचलों में 5 साल या इससे ज्यादा उम्र के महज 9.9 प्रतिशत लोग ही इस कौशल को हासिल कर पाये हैं जबकि शहरी अंचलों में ऐसे लोगों की तादाद 32 प्रतिशत है।

पिछला बजट और नई शिक्षा नीति

जाहिर है, बिजली की उपलब्धता, कंप्यूटर-लैपटॉप और स्मार्टफोन की मिल्कियत और उसे चला सकने के कौशल तथा इंटरनेट एक्सेस कर सकने की कूबत को बढ़ाये बगैर ई-लर्निंग के मोर्चे पर बढ़ना संभव नहीं जबकि ऐसा करना पिछले बजट में निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के लिहाज से भी जरुरी है और नई शिक्षा नीति की प्राथमिकताओं को साकार करने के लिए भी ई-लर्निंग का बुनियादी ढांचा तैयार करना निर्णायक साबित होगा।

याद करें, पिछले शिक्षा बजट(2020-21) की प्रमुख बातों में एक ये भी था कि समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने के लिए डिग्री-लेवल का एक पूर्णकालिक ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरु किये जायेंगे। और, जहां तक नई शिक्षा-नीति (2020) का सवाल है, उसके घोषित उद्देश्यों में एक है शिक्षा के संस्थानों में उद्योग जगत की जरुरतों के मुताबिक कौशल-आधारित शिक्षा देने के लिए आईसीटी यानि सूचना एवं संचार की प्रौद्योगिकी से जोड़ना और ऐसी शिक्षा के दायरे का विस्तार करना। नई शिक्षा नीति के बड़े लक्ष्यों के अंतर्गत साल 2030 तक शत-प्रतिशत जीआईआर(ग्रास एनरॉलमेंट रेशियो) के साथ शिक्षा के सार्वीकरण, किन्हीं कारणों से पढ़ाई छोड़ चुके छात्रों को फिर से शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करना, गणित और भाषायी कौशल बढ़ाने पर जोर देना और रोजगार आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना शामिल है।

इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिहाज ई-लर्निंग के बुनियादी ढांचे का विस्तार जरुरी होगा और ये विस्तार बजट में शिक्षा के मद में ज्यादा आवंटन की मांग करता है। पिछली बार (2020-21) शिक्षा के मद में बजट में 99,312 करोड़ रुपये दिये गये थे और कौशल विकास के मद में 3000 करोड़ रुपये। साल 2019-20 में 94,800 करोड़ का बजट आवंटन हुआ था और 2018-19 में 85000 करोड़ का। लग सकता है कि शिक्षा के मद में बजट आबंटन लगातार बढ़ रहा है लेकिन जीडीपी के अनुपात में देखें तस्वीर कुछ अलग नजर आयेगी। साल 2017-18 में शिक्षा के मद में बजट आवंटन जीडीपी का 3.71 प्रतिशत था जो साल 2018-19 में घटकर 3.48 प्रतिशत हो गया और 2019-20 में घटकर जीडीपी के 3.3 प्रतिशत पर आ गया।

ई-लर्निंग का ढांचा खड़ा करने की चुनौतियों और नई शिक्षा नीति के लक्ष्यों के अनुरुप आईसीटी से शिक्षा-जगत को लगातार जोड़ते जाने के लिए शिक्षा के मद में बजट आबंटन बढ़ना चाहिए। याद रहे नई शिक्षा नीति में शिक्षा के मद में बजट आबंटन जीडीपी का 6 प्रतिशत करने की जरुरत को रेखांकित किया गया है।

(लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)

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