कोरोना वायरस महामारी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian economy) में आई ऐतिहासिक गिरावट के कारण इस साल का आम बजट (Union Budget) खास रहने वाला है। सबकी निगाहें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) पर टिकी हैं कि वित्त वर्ष 2021-22 के आम बजट में वे किन नीतियों पर जोर देंगी, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट सके और आर्थिक विकास (Economic Growth) की गति तेज हो सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुद कहा है कि बजट 2021 (Budget 2021) ऐसा होगा, जैसा बजट पहले कभी नहीं पेश किया गया।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को Budget like never before के अपने वादे पर खड़ा उतरने के लिए कम से कम इन 5 चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा जो इंडियन इकोनॉमी के सामने आज मुंह खोलकर खड़ा है। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने ये पांचों चुनौतियां कोविड-19 के दस्तक देने से पहले से चली आ रही हैं, लेकिन कोरोना महामारी ने इसे और भयावह बना दिया है। ये पांचों चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और देश में इकोनॉमिक ग्रोथ को रफ्तार देने के साथ इकोनॉमिक स्टेबिलिटी के लिए इन चुनौतियों से पार पाना जरूरी है।
घरेलू डिमांड को वापस ट्रैक पर लाना
इकोनॉमिक ग्रोथ को रफ्तार देने के साथ देश की इकोनॉमिक स्टेबिलिटी के लिए घरेलू डिमांड (Domestic Demand) को वापस ट्रैक पर लाना वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के आंकड़ों के मुताबिक, कोरोना वायरस महामारी आने से पहले 2017-18 से ही देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कंजम्पशन और डिमांड कम होने लगी थी। वित्त वर्ष 2017 में जहां कंजम्पशन ग्रोथ रेट (Consumption growth rate) 8.13% थी। 2018 में यह घटकर 6.95%, 2019 में थोड़ी बढ़कर 7.16% और वित्त वर्ष 2020 में यह गिरकर 5.8% पर आ गई। वहीं, 2021 में यह औंधे मुंह गिरकर माइनस 9.47 तक लुढ़क गई है। शहरी क्षेत्रों में भी महंगे प्रोडक्ट्स की डिमांड में भारी कमी आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक लेबर मार्केट में तेज ग्रोथ नहीं आएगी, तब तक डोमेस्टिक डिमांड को ट्रैर पर लाना मुश्किल होगा।
जॉब क्रिएशन के मोर्चे पर विफल रही सरकार
पर्याप्त जॉब क्रिएट नहीं कर पाना केंद्र सरकार के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक लोगों को पास रोजगार नहीं होगा, तब तक प्रोडक्ट्स के डिमांड में बढ़ोतरी नहीं होगी, क्योंकि प्रोडक्ट्स और सर्विसेज का फायदा उठाने के लिए लोगों के पास पैसे नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में नौकरीपेशा लोगों की आमदनी में गिरावट आई है और कोरोना वायरस महामारी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। लाखों लोगों ने अपनी नौकरी गंवाई है।
इंवेस्टमेंट साइकल को रिवाइव करना होगा
जॉब क्रिएशन के लिए एंटरप्रेन्योर्स को इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी। भारत में इंवेस्टमेंट साइकल पहले से ही धीमा था, लेकिन इस साल इसमें और गिरावट आई है। भारत की GDP के मुकाबले नए इंवेस्टमेंट इस वित्त वर्ष में गिरकर 24% पर आ गए हैं। यह 20 साल का सबसे न्यूनतम स्तर है। 2006-07 में यह GDP के 36% के बराबर था। 2008 के बाद बैंकों का NPA बढ़ने के कारण नए इंवेस्टमेंट में लगातार कमी आती गई और नए प्रोडेक्ट्स की फंडिंग काफी धीमी हो गई। फंड की कमी के कारण नए प्रोजेक्ट्स अटके पड़े हैं। इसलिए इकोनॉमिक ग्रोथ को गति देने के लिए इंवेस्टमेंट साइकल को रिवाइव करना होगा।
क्रेडिट की कमी को पूरा करना
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2021 तक बैंकों का NPA 14% तक पहुंच सकता है। ऐसे में जब क्रेडिट ग्रोथ पहले से ही सुस्त है, यह अर्थव्यवस्था को और नीचे ले जाएगी। बैंकों की लेंडिंग तभी बढ़ सकती है, जब उनके पास एडिशनल कैपिटल बफर्स होंगे। इसलिए वित्त मंत्री को इन बैंकों में कैपिटल इंफ्यूजन के उपाय करने होंगे, ताकि इन बैंकों का रीकैपिटलाइजेशन किया जा सके।
महंगाई बढ़ाए बिना स्पेंडिग बढ़ाना होगा
सरकार को इकोनॉमिक ग्रोथ को तेज करने के लिए कंजम्पशन, इंवेस्टमेंट और एक्सपोर्ट पर फोकस करना होगा। इसके लिए सरकार को अतिरिक्त कर्ज (additional borrowing) लेने होंगे, जिससे सरकार का कर्ज GDP के मुकाबले और बढ़ जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार पब्लिक स्पेंडिग को कैपिटल एक्सपेंडिचर में बढ़ाती है तो इससे भविष्य में राजस्व बढ़ेगा और इकोनॉमिक ग्रोथ को सहारा मिलेगा। हालांकि, जब सरकार रेवेन्यू एक्सपेंडिचर यानी रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च बढ़ा देगी तो इससे महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ जाएगा। भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास अब इस बात पर निर्भर करता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इन चुनौतियों को किस तरह से एड्रेस करती हैं।
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