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बजट 2021: मुश्किल दौर में क्या निर्मला सीतारमण असाधारण बजट पेश कर पाएंगी!

कोरोनावायरस संक्रमण से पस्त इकोनॉमी के बीच असल सवाल यह है कि क्या सीतारमन इसे एक असाधारण अवसर में बदल पाएंगी?

MoneyControl Newsअपडेटेड Jan 22, 2021 पर 2:54 PM
बजट 2021: मुश्किल दौर में क्या निर्मला सीतारमण असाधारण बजट पेश कर पाएंगी!

भुवन भास्कर

एक कहावत है कि असाधारण परिस्थितियों से उबरने के लिए असाधारण उपाय ही अपनाने होते हैं। निर्मला सीतारमन 2021-22 के लिए बजट पेश करने जब 1 फरवरी को लोकसभा में खड़ी होंगी, तब उनके पीछे ऐसा ही एक असाधारण साल खड़ा है। अब सवाल यह है कि क्या सीतारमन इसे एक असाधारण अवसर में बदल पाएंगी? कुछ वैसा ही जैसा 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बदला था। तब सिंह के पीछे एक ऐसा साल गुजरा था, जब देश ऐतिहासिक भुगतान संतुलन संकट से गुजरा था।

विदेशी मुद्रा भंडार बमुश्किल 15 दिनों के आयात का भार उठाने लायक था और घर का खर्च चलाने को सरकार मजबूरी में सोना गिरवी रख रही थी। उसी तरह 2021-22 का बजट एक ऐसे साल की पृष्ठभूमि में पेश किया जा रहा है, जिसमें जीडीपी वृद्धि दर नकारात्मक आना लगभग तय है। यानी देश की अर्थव्यवस्था इस साल कम गति से नहीं बढ़ी है, बल्कि सिकुड़ गई है। देश की आजादी के बाद सिर्फ 4 ही साल ऐसे रहे हैं, जिनमें देश की अर्थव्यवस्था दरअसल उसके पिछले साल के मुकाबले सिकड़ गई थी। ये साल हैं- 1958-59, 1966-67, 1973-74 और 1980-81 और अब 2020-21 इस कड़ी में पांचवां साल होगा।

लेकिन सीतारमन की चुनौती सिर्फ इतनी नहीं है। सीतारमन को माइनस में जा चुके ग्रोथ को ऊपर लाना है। बजट घाटा जीडीपी के 3.5 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य पहले ही बुरी तरह पीछे छूट चुका है और विशेषज्ञों के मुताबिक यह 5 से 7 प्रतिशत तक जा सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 200 लाख करोड़ रुपये की है, मतलब जो घाटा अब तक 6-7 लाख करोड़ रुपये तक रखने का लक्ष्य था, वह इस साल 14 लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है। इस आंकड़े के पीछे मुख्य कारण टैक्स आमदनी में आई भीषण कमी और कोविड-19 के कारण सरकार पर बढ़ा वित्तीय बोझ है। लेकिन इसका परिणाम यह होगा कि सरकार के पास और ज्यादा घाटा बढ़ाने की संभावना बहुत कम हो गई है।

सरकार के लिए घाटे को और बढ़ाना अर्थव्यवस्था के लिए लंबी अवधि के लिए बहुत बुरे प्रभाव लेकर आएगा क्योंकि इस घाटे को पूरा करने के लिए आरबीआई को उतनी रकम का बॉन्ड जारी करना होता है। बॉन्ड के माध्यम से आरबीआई करीब 12-13 लाख करोड़ रुपये सिस्टम से वापस ले लेगा। इसका सीधा मतलब है कि सिस्टम में लिक्विडिटी कम होगी और ब्याज दरें बढ़ेंगी। ब्याज दर बढ़ने का मतलब होगा कि कंपनियों का ब्याज खर्च बढ़ेगा, मुनाफा कम होगा, निवेश में कमी आएगी और इन सबका अंतिम परिणाम यह होगा कि ग्रोथ कम होगी। वही ग्रोथ, जिसे बढ़ाना इस समय सरकार और वित्त मंत्री की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

यह भी तब होगा जब सरकार घाटे को मौजूदा स्तर पर ही बरकरार रखे। लेकिन इतना करने पर ग्रोथ कहां से आएगी? ग्रोथ बढ़ाने के लिए सरकार को और बड़े पैमाने पर खर्च करने की जरूरत है, लेकिन उसके पास इसका स्कोप बहुत कम है, क्योंकि बजट घाटा पहले ही 5-7 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है। दूसरे शब्दों में सरकार एक दुष्चक्र में फंसी दिख रही है। यदि ग्रोथ बढ़ाने के फौरी उपाय किए गये, तो यह ग्रोथ को लंबी अवधि में धीमा कर सकता है और नहीं किए गये, तो छोटी से मध्यम अवधि में ग्रोथ गायब रहेगी।

दिक्कत यह है कि ग्रोथ के लिए सरकार इंतजार करने की स्थिति में बिलकुल भी नहीं है क्योंकि अर्थव्यवस्था में अपेक्षा से अधिक गति से सुधार के संकेतों के बीच भी बेरोजगारी बढ़ रही है। सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के आंकड़ों के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में नवंबर में बेरोजगारी की दर 7 प्रतिशत थी जो दिसंबर में बढ़कर 8.8 प्रतिशत हो गई। इसी दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर 6.2 से बढ़कर 9.2 प्रतिशत हो गई।

मनरेगा के तहत काम की मांग कोविड-19 की शुरुआत के समय रहे स्तर से भी ऊपर जा चुकी है। इसका साफ मतलब है कि एक ओर तो लॉकडाउन और उसके बाद करोड़ों की संख्या में गांव लौटे लोगों में कई वापस अपने काम पर नहीं आ सके हैं और दूसरा, जो आए हैं, उन्हें भी अभी काम हासिल नहीं हो सका है। यह स्थिति सिर्फ और सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में ग्रोथ को बढ़ाकर ठीक की जा सकती है।

ऐसे में सवाल यह है कि वित्त मंत्री के पास क्या रास्ते हैं? वित्त मंत्री के पास दरअसल 3 इक्के हैं, जिनके माध्यम से बजट घाटे को ज्यादा बढ़ाए बिना भी वह ग्रोथ हासिल करने का लक्ष्य पूरा कर सकती हैं। ये तीन इक्के हैं-मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और रियल एस्टेट। इन तीनों ही क्षेत्रों में पहले से ही मजबूती दिखनी शुरू हो गई है। 

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ग्रोथ के लिहाज से पिछले बजट में घोषित नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (NIP) एक बेहतरीन आइडिया था जिसके तहत 2020-25 के बीच रुकी पड़ी 7300 परियोजनाओं को शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इन पर 111 लाख करोड़ रुपये खर्च होने हैं। एनआईपी को सही तरीके से लागू किया जाना चाहिए जिसके लिए प्रस्तावित डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (DFI) का विवरण इस बजट में घोषित किया जा सकता है। इसमें खास तौर पर आत्मनिर्भर भारत अभियान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। चीन से आने वाली कंपनियों को बड़े पैमाने पर भारत में आकर्षित करने के लिए अनुकूल घोषणाओं से एफडीआई में बड़े उछाल की संभावना है, जिससे न सिर्फ सरकार की आय बढ़ेगी, बल्कि रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे।

रियल एस्टेट क्षेत्र में महाराष्ट्र सरकार की हाल की घोषणाओं और उसके बाद उनके परिणाम ने साबित किया है कि यदि सरकार सही इंसेंटिव दे, तो हाउसिंग सेक्टर में छाई मंदी टूट सकती है। इस एक सेक्टर के तेज होने से सीमेंट, स्टील, पेंट जैसे कई सेक्टरों में गति आ जाएगी। और आखिर में कृषि है, जिसने कोविड-19 के पीक पर भी शानदार वृद्धि दर हासिल कर अपनी संभावनाओं को उजागर किया है। कृषि क्षेत्र में सरकार के हालिया कृषि सुधार कानून गेमचेंजर हैं। सरकार ने तमाम प्रोपगैंडा और दबावों के बावजूद उन्हें वापस न लेने का इरादा जाहिर कर इतना तो साफ कर दिया है कि सुधारों के रास्ते पर उसके पैर डगमगाने वाले नहीं हैं, लेकिन इस बजट में कृषि निर्यात को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित कर वह इस ग्रोथ में मजबूती ला सकती है। कृषि की ग्रोथ मजबूत होने का सीधा असर कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, ऑटो और एफएमसीजी सेक्टर पर पड़ता है।

जैसा कि इसी लेख में पहले चर्चा की गई कि सरकार के पास अपना बजट घाटा बढ़ाने का बहुत स्कोप नहीं है। ऐसे में वह कर्ज के अलावा दूसरे स्रोतों से अपनी आमदनी बढ़ाने के विकल्प खोज सकती है। इन स्रोतों में सबसे प्रमुख पीएसयू कंपनियों का विनिवेश है, जिसके लिए 2020-21 में 2.14 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया था, हालांकि जो अपने लक्ष्य से बड़े अंतर से पीछे छूटने वाला है। उसे इस साल नए लक्ष्य के साथ मिलाकर राजस्व में 1.5-2 प्रतिशत की कमी पूरी की जा सकती है। इसके अलावा 4जी और 5जी की नीलामी भी सरकार के पास एक अन्य विकल्प है। इन कदमों से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन छोटी और मध्यम अवधि में ग्रोथ के लिए जरूरी परिस्थिति पैदा कर सकती हैं और एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो यह अपने आप लंबी अवधि के ग्रोथ का रास्ता भी तैयार कर देगी।

(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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