चंदन श्रीवास्तव

“हमने सपना देखा है कि जब आजादी के 75 साल हों तब हिन्दुस्तान के गरीब से गरीब का भी अपना घर हो...एक बार चारदीवारी आ जाती है तो इंसान के सपनों में जान आ जाती है और वो नई-नई चीजें करने लगता है।...2022 तक इस देश में कोई गरीब बिना घर के ना रहे। हाउसिंग फॉर ऑल-सबके लिए घर, ये हमारा सपना भी है और संकल्प भी है।”

अगर आप केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट पर जायें और वहां मौजूद अर्बन ट्रांसफार्मेशन थ्रू हाउसिंग फॉर ऑल (दिसंबर 2019) नाम की रिपोर्ट को खोलें तो आपको इसके भीतर के पन्नों पर प्रधानमंत्री संकल्प और सपने से जुड़ी ये पंक्तियां मिल जायेंगी। साल 2022 तक सबको आशियाना मुहैया कराने का सपना किस सीमा तक पूरा हो पाता है ये बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि 2021 के बजट में शहरी क्षेत्रों के कम और मंझोली आमदनी वाले परिवारों को इस दिशा में प्रोत्साहन के तौर पर क्या कुछ दिया जाता है।

प्रोत्साहन की पहल

जहां तक प्रोत्साहन की बात है, पाठकों को याद होगा कि आवास योजना की घोषणा के वक्त प्रधानमंत्री ने पहली बार घर खरीदने जा रहे लोगों को लक्ष्य करके कहा था कि "गरीब निम्न मध्यवर्ग और मध्यवर्ग के लोग घर खरीद सकें इसके लिए सरकार ने बड़े फैसले लिए हैं। अब PMAY (प्रधानमंत्री आवास योजना) के तहत शहरों में इस वर्ग को नये घर देने के लिए दो नई स्कीमें बनायी गई हैं। इसके तहत 2017 में घर बनाने के लिए 9 लाख रुपये कर्ज पर ब्याज में 4 प्रतिशत तक की छूट और 12 लाख रुपये कर्ज पर ब्याज में 3 प्रतिशत तक की छूट दी जायेगी।"

इसी क्रम में  साल 2019 के बजट में कहा गया था कि पहली बार घर खऱीदने वाले आयकर में सेक्शन 80EEA के तहत 150000 रुपये तक का अतिरिक्त डिडक्शन क्लेम कर सकेंगे। लेकिन एडिशनल डिडक्शन क्लेम करने के लिए प्रापर्टी का स्टाम्प वैल्यू 45 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए, साथ ही घर की खरीद के लिए कर्जा 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 तक की अवधि में लिया होना चाहिए। बाद में कर्ज लेने की इस समय सीमा का विस्तार 31 मार्च 2021 तक किया गया।

व्यापार जगत की मांग

जहां तक उद्योग और व्यापार जगत का सवाल है, उसने अपनी मांग स्पष्ट शब्दों में रख दी है और ये मांग घर खरीद के लिए कर्जे तथा आयकर में अतिरिक्त डिडक्शन क्लेम करने की सरकार की शुरुआती पहल से जुड़ी हुई है। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) ने बजट से पहले जारी अपने मेमोरंडम में मांग रखी है कि शहरी क्षेत्र में किफायती दाम पर घर मुहैया कराने की सरकारी योजना को और ज्यादा बढ़ावा देने की जरुरत है। बढ़ावे के उपाय के तौर पर फिक्की ने सुझाया है कि जो लोग पहली बार घर खरीद रहे हैं उन्हें आयकर के मामले में अभी तक प्रापर्टी के 45 लाख तक स्टाम्प वैल्यूएशन पर एडिशनल डिडक्शन दिया जा रहा है लेकिन जरूरत स्टाम्प वैल्यूएशन की सीमा को बढ़ाकर 65 लाख रुपये तक करने की है। दूसरी मांग है कि डिडक्शन क्लेम करने के लिए कर्जा लेने की अवधि का विस्तार 31 मार्च 2021 से बढ़ाकर 2022 के 31 मार्च तक कर दिया जाय।

इसके पीछे फिक्की का तर्क है कि बड़े शहरों (Tier 1) और महानगरों में प्रापर्टी की स्टाम्प वैल्यू की सीमा 45 लाख रुपये तक रखने पर लोगों के घर खरीद की तरफ आकर्षित होने की संभावना कम है और Tier 2 और Tier 3 के शहरों-नगरों के निम्न मध्यवर्ग के लोगों की ज्यादा। सो वित्तमंत्री को चाहिए कि पुणे, हैदराबाद सरीखे Tier 1 के शहरों के फर्स्ट टाइम होम बायर्स के हक में एडिशनल डिडक्शन क्लेम करने के लिए प्रापर्टी की स्टाम्प वैल्यू बढ़ाकर 65 लाख रुपये कर दें।

साथ ही, 2022 तक सबको घर मुहैया कराने के मिशन की कामयाबी के लिए जरुरी है कि घर खरीद के लिए लिए गये कर्जे पर मिलने एडिशनल डिडक्शन क्लेम करने के लिए अभी जो 31 मार्च 2021 की अवधि की सीमा है उसे बढ़ाकर 2022 तक के लिए कर दिया जाये ताकि जरुरतमंद ज्यादा से ज्यादा लोग आवास मुहैया कराने की सरकारी योजना की तरफ आकर्षित हों।

बाजार की मौजूदा स्थिति

सबके लिए 2022 तक घर मुहैया कराने के सरकारी मिशन की कामयाबी के लिहाज से फिक्की के सुझाव बाजार में हाल-फिलहाल मौजूद घरों की मांग की हालत से मेल में हैं। ऑनलाइन रियल इस्टेट प्लेटफॉर्म नोब्रोकर डॉट कॉम ने अपने एक सर्वेक्षण के हवाले से बताया कि बड़े शहरों में कोरोनाबंदी से पहले की तुलना में अभी के वक्त में कहीं ज्यादा संख्या में लोग घर खरीदना चाहते हैं। प्लेटफार्म के सर्वे के मुताबिक पिछले साल महानगरों में प्रापर्टी के खरीद की स्थिति में पहुंचे लोगों में मात्र 64 प्रतिशत घर खरीदना चाह रहे थे लेकिन 2021 में महानगरों में ऐसे लोगों की तादाद बढ़कर 82 प्रतिशत हो गई है।

नोब्रोकर डॉट कॉम ने यह तथ्य अपने प्लेटफार्म पर रिजस्टर्ड 1 करोड़ यूजर्स और सर्वेक्षण में शामिल अन्य 18 हजार लोगों से हासिल जानकारी के आधार पर जुटाया। सर्वेक्षण में शामिल कुल 89 फीसदी लोग मानकर चल रहे हैं कि घर की खऱीद के लिहाज से यह सही समय है और ऐसे ज्यादातर लोग बड़े घरों की तलाश में हैं। वे चाहते हैं कि रहने के लिए कम से कम दो कमरे हों और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को ध्यान में रखते हुए कम से कम एक कमरा और हो। सर्वेक्षण में शामिल कुल 48 फीसदी लोग टू बीएचके की तलाश में थे । कुल नौ प्रतिशत की प्राथमिकता थ्री बीएचके के लिए रही। कंपनी ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि बेंगलुरु में थ्री बीएचके की तलाश करने वाले लोगों की प्रतिशत संख्या सबसे ज्यादा है।

बिक्री के लिहाज से बुरा बीता पिछला साल

नोब्रोकर डॉट कॉम ने महानगरों में घर खरीदने को इच्छुक लोगों की बढ़ी तादाद के पीछे भले ये कारण बताया हो कि बिल्डरों आकर्षक ऑफर लेकर आये हैं और बैंक होम लोन पर ब्याज दर कम करके ग्राहकों को लुभाने में लगे हैं लेकिन इतना कहने भर से स्थिति की व्याख्या नहीं हो जाती। दरअसल कोरोनाबंदी की मार से घटी हुई आमदनी और अफरा-तफरी का माहौल के बीच लोगों में मौजूद हताशा के कारण रीयल इस्टेट सेक्टर पिछले साल बुरी तरह प्रभावित हुआ।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रापर्टी कंसल्टेंट फर्म नाइट फ्रैंक इंडिया कि साल 2020 की दूसरी अर्धवार्षिक रिपोर्ट के तथ्य बताते हैं कि बीते साल घरों की बिक्री में 37 फीसद की कमी आयी। लॉन्च होने वाले घरों की संख्या भी 34 प्रतिशत घटी। हां, संतोष की बात इतनी रही कि अनसोल्ड इन्वेंट्री मतलब अनबिके मकानों की तादाद में मामूली सी कमी (2 प्रतिशत) देखने को मिली।

देश के आठ बड़े शहरों में प्रापर्टी की खरीद-बिक्री का हाल बताने वाली नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में मात्र 1।54 लाख घर बिके जो 2019 के मुकाबले 37 प्रतिशत कम है। देश के आठ बड़े शहरों में 2020 में कुल 95 हजार घरों की बिक्री हुई जो सालाना आधार पर देखें तो साल 2019 के मुकाबले 2020 की दूसरी छमाही में 19 प्रतिशत कम है। गौर करने की एक बात ये भी है कि 2020 में घरों की सर्वाधिक बिक्री कोरोनाबंदी में दी जा रही ढील के दिनों यानि चौथी तिमाही में देखने को मिली। चौथी तिमाही में कुल 61 हजार घरों की बिक्री हुई और तिमाही आधार पर यह बिक्री 84% अधिक है।

एक मुश्किल नये घरों के लॉन्च में आई कमी की भी रही। साल 2029 के मुकाबले 2020 में नये घऱों के लॉन्च की तादाद 34 प्रतिशत कम रही। कुल 1.46 लाख नये घर ही लॉन्च किये जा सके। अनसोल्ड इन्वेंट्री की समस्या भी बड़ी है। अनबिके घरों की तादाद बहुत बड़ी (4.38 लाख) है।

सरकारी आवास योजना के हाल

बिक्री में आयी गिरावट और अनसोल्ड इन्वेंट्री की इस मुश्किल को प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) में अबतक हुई प्रगति के साथ जोड़कर देखें तो सबको घर मुहैया कराने के मिशन की कामयाबी के बारे में हम सही आकलन कर पायेंगे। इंदिरा आवास योजना को विस्तार देते हुए साल 2015 में गरीब और निम्न आयवर्ग के लोगों को घर मुहैया कराने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत हुई। इसका लक्ष्य 2022 तक 2.95 करोड़ की तादाद में घर बनाकर लोगो को मुहैया कराने का रखा गया। योजना के दो हिस्से है, एक हिस्सा PMAY (ग्रामीण) कहलाता है, दूसरा PMAY (शहरी)।

योजना का लक्ष्य था कि पहले चरण में 2019 तक ग्रामीण क्षेत्रों में 1 करोड़ घर बनाकर लोगों को दे दिये जायें और दूसरे चरण में ग्रामीण क्षेत्रों में वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान 51 लाख घर और बनें। शहरी क्षेत्र में मांग के अनुरुप 1 करोड़ 12 लाख घर तैयार करने थे। इस लक्ष्य के बरक्स क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के एक अध्ययन के मुताबिक 2019 के अगस्त तक ग्रामीण क्षेत्र के लिए बनी आवास योजना में कुल 84 प्रतिशत घर पूर्ण रुप से तैयार हो चुके थे लेकिन शहरी क्षेत्र की सरकारी आवास योजना में लक्ष्य का कुल 34 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा किया जा सका था।

अगर मौजूदा यानि दिसंबर 2019 तक के सरकारी आंकड़े को प्रमाण मानें तो शहरी क्षेत्र की आवास योजना के तहत सरकार ने कुल 96 लाख घरों के निर्माण को मंजूरी दी है। इसमें 56 लाख घर निर्माणाधीन हैं और पूर्ण रुप से तैयार हुए घऱों की संख्या सिर्फ 28 लाख है। मतलब अगर साल 2022 तक शहरी क्षेत्रों में कुल 1.12 करोड़ लोगों को किफायती कीमत पर घऱ मुहैया कराना है तो अभी के समय में हम इस रास्ते का बस चौथाई सफर पूरा कर पाये हैं।

वक्त की जरूरत

उदारीकरण के बाद के दशकों में महानगर और बड़े शहर इकोनॉमी के ग्रोथ के इंजीन बनकर उभरे हैं। इन शहरों में घर के खरीदारों और डेवलपर्स की पुरउम्मीद नजरें साल 2021 के बजट पर लगी होंगी। एक बड़ी वजह तो यही है कि अगर 2022 तक सबके लिए घर के सपने और संकल्प को पूरा करना है तो फिर 2021 के बजट में इसके लिए किये जाने वाले विशेष उपायों पर सबकी नजर होगी। और, दूसरी बड़ी वजह है कोरोना की मार से उबरती अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने और तेज गति से दौड़ाने के लिहाज से रियल इस्टेट सेक्टर में होने वाली बढ़वार की अहमियत।

बात रोजहार पैदा करने की हो, इस्पात और सीमेंट की मांग बढ़ाने की या फिर पर्यावरण की हित चिन्ता में स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ाने की, सरकारी आवास योजनाओं की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। मिसाल के लिए इस आलेख की शुरुआत में केंद्रीय मंत्रालय की जिस रिपोर्ट का जिक्र किया गया है उसके सातवें पन्ने पर ग्रोथ ड्राइवर्स शीर्षक से बताया गया है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) से अबतक 21 सेक्टर्स में 1।20 करोड़ रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं।

योजना के तहत बनाये गये घऱों में 17।7 मिलियन मीट्रिक टन सीमेंट और 4 मिलियन मीट्रिक टन इस्पात की खपत हो चुकी है। जितने घरों के निर्माण को अभी मंजूरी मिल चुकी है उसमें 13 मिलियन मीट्रिक टन इस्पात की खपत होगी। जो घर योजना के अंतर्गत तैयार हो चुके हैं उनकी छतों पर 31 लाख स्क्वायर मीटर क्षेत्र सोलर ग्रिड लगाने के लिए उपलब्ध है।

एक अहम बात और भी है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के शहरी क्षेत्रों की आबादी कुल जनसंख्या का 31.6 प्रतिशत (लगभग 38 करोड़) है। साल 2021 तक इस आबादी के बढ़कर 44 करोड़ और 2026 तक 55 करोड़ हो जाने की उम्मीद जतायी गई थी। फिक्की का आकलन है कि भारत में 2050 तक 90 करोड़ लोग शहरों में रह रहे होंगे। शहरीकरण की ये तेजरफ्तारी शहरी क्षेत्रों में घरों की मांग में बेतहाशा बढ़ोत्तरी करेगी। जाहिर है, 2021 के बजट में सरकारी आवास योजना को दिये जाने वाले प्रोत्साहन को शहरीकरण की बढ़ी रफ्तार के मेल में करना होगा।

(लेखक सामाजिक सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)

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