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किसान आंदोलन के साए में पेश कृषि बजट का MSP और APMC एंगल समझिए

बजट में किए फैसलों से साफ है कि सरकार कोई भी नई घोषणा या नीतिगत पहल करने से पहले सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि किसान आंदोलन का परिणाम किस दिशा में जाने वाला है

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 04, 2021 पर 2:39 PM
किसान आंदोलन के साए में पेश कृषि बजट का MSP और APMC एंगल समझिए

भुवन भास्कर

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के बजट में कृषि को लेकर की गई घोषणाएं सबसे ज्यादा चौंकाने वाली हैं। चारों तरफ मचे किसान घमासान की पृष्ठभूमि में उम्मीद की जा रही थी कि सरकार किसानों को लुभाने के लिए बड़ी घोषणाएं कर सकती हैं, लेकिन यदि वास्तव में बजट प्रावधानों को देखा जाए, तो कृषि के मोर्चे पर यह लगभग शून्य नजर आ रहा है। तो क्या वास्तव में यह बजट कृषि के मोर्चे पर शून्य है?

इस सवाल का जवाब बजट में ही ढूंढते हैं और फिर समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर जो है, वह क्यों है। नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद से ही एग्री मार्केटिंग के क्षेत्र में कई सुधार किए हैं। ई-नाम, ई-एनडब्ल्यूआर और कृषि सुधार कानून तो अपनी जगह पर हैं ही, लेकिन उसके साथ ही किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को लेकर सरकार ने कई ऐसी पहल की हैं, जो गेम चेंजर हैं। ऐसे में पिछले करीब 3 महीनों से चल रहे किसान आंदोलन भले ही कुछ राज्यों और समूहों तक सीमित हों, लेकिन मोदी सरकार के लिए वे एक बड़े झटके के तौर पर सामने आए हैं।

इसी झटके में कृषि को लेकर बजट में फैली चुप्पी का जवाब भी है। तीनों कृषि कानून, जिनके खिलाफ ये आंदोलन हो रहे हैं, वे दरअसल पिछले 7 सालों में कृषि को लेकर मोदी सरकार के किए गये तमाम प्रयासों का निचोड़ हैं। यदि सरकार को किसी भी हाल में ये कानून वापस लेने पड़ते हैं, तो सरकार के पिछले सारे नीतिगत प्रयासों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यानी साफ है कि सरकार कोई भी नई घोषणा या नीतिगत पहल करने से पहले सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि किसान आंदोलन का परिणाम किस दिशा में जाने वाला है।

सरकार के कृषि संबंधी बजट प्रावधानों पर यह किसान आंदोलन किस कदर हावी है, इसकी एक बानगी वित्त मंत्री का बजट भाषण भी है। सीतारमन ने बजट भाषण में कृषि पर 12 पैराग्राफ समर्पित किए। इसमें 5 पैराग्राफ में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर हुई सरकारी खरीद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए सीतारमन ने बताया कि कैसे मोदी सरकार ने यूपीए की तुलना में सरकारी खरीद बढ़ाई है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने पहले तो एमएसपी को लागत का डेढ़ गुना किया और फिर किस तरह गेहूं, चावल, दलहन और कपास में यूपीए शासन के अंतिम साल यानी 2013-14 की तुलना में खरीदारी बढ़ाई। गेहूं और चावल में तो खरीदारी दोगुने से ज्यादा बढ़ी, लेकिन दलहन में तो यह मूल्य के लिहाज से 40 गुना और कॉटन में 288 गुना बढ़ी।

इनके अलावा बजट भाषण में दो पैराग्राफ एपीएमसी (एग्री प्रोड्यूस मार्केट कमेटी) मंडियों के प्रति सरकार की योजना का खुलासा करते हैं। पहली घोषणा, ई-नाम (इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार) में 1000 मंडियों को जोड़ने की है और दूसरी, एपीएमसी मंडियों में बुनियादी ढांचे के विकास में कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर विकास फंड (एआईडीएफ) का इस्तेमाल करने की अनुमति दिए जाने की है। ई-नाम योजना सरकार ने 14 अप्रैल 2016 को शुरू की थी, जिसका लक्ष्य देश को एक मंडी प्लेटफॉर्म के रूप में बदलना है। इसमें अब तक 1000 मंडियां जुड़ चुकी हैं और इस बजट की घोषणा के बाद अब इस नेटवर्क में अगले साल तक 2000 मंडियां शामिल हो जाएंगी।

ई-नाम में शामिल होने का मतलब यह है कि देश की 7000 में से 2000 मंडियां अत्याधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से सुसज्जित होंगी। इन्हें उपज की गुणवत्ता टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 75 लाख रुपये मिलते हैं। इतना ही नहीं इनके विकास में एआईडीएफ की अनुमति का भी अपना बहुत साफ संदेश है। आंदोलनकारी किसानों ने बार-बार यह आशंका जताई है कि एपीएमसी मंडी के बाहर फसलें बेचने की अनुमति देने से मंडियां गैर प्रतिस्पर्द्धी हो जाएंगी क्योंकि किसान वहां आएंगे नहीं और इसलिए उनकी आमदनी खत्म हो जाएगी, जिससे उनका बुनियादी ढांचा नष्ट हो जाएगा।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसी सरकारों ने मंडियों को प्रतिस्पर्द्धी बनाए रखने के लिए मंडी फीस बहुत कम कर दिया है या खत्म ही कर दिया है। ऐसे में केंद्र ने एपीएमसी मंडियों के लिए वित्त की व्यवस्था कर साफ कर दिया है कि वह किसी भी हाल में मंडियों को कमजोर नहीं होने देना चाहता।

साफ है कि सरकार का यह बजट कृषि के लिहाज से पूरी तरह किसान आंदोलन के साए में बना है। सरकार ने एमएसपी और एपीएमसी के मुद्दे पर पूरे जोर से यह संदेश दिया है कि इन पर कोई खतरा नहीं है। और अब वह किसानों की प्रतिक्रिया का इंतजार करेगी।

इस लिहाज से किसानों के इस आंदोलन को कृषि क्षेत्र में युगांतकारी सुधारों का एक संक्रमण काल माना जाना चाहिए। यदि आंदोलन जीतता है तो सुधारों का यह चक्र वापस पीछे लौटेगा और भारत में किसानों की नियति पुरानी बेड़ियों में ही जकड़ी रहेगी। लेकिन यदि सरकार अपने इरादों में कामयाब होती है तो यह चक्र एक नए युग का सूत्रपात करेगा। और फिर आने वाले दिनों में हम कृषि क्षेत्र के लिए कई नई घोषणाएं देख सकते हैं।

(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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