1O का दम: इन 5 बदलावों से बदल गई है रियल एस्टेट की पूरी तस्वीर

एफोर्डेबल यानी सस्ते घर बनाने पर इंडस्ट्री का फोकस बढ़ा है। कंपनियां समझने लगी हैं कि कम पैसे वाले लोगों के बीच सस्ते घरों की बड़ी मांग है। नोटबंदी के साथ ही कैश के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने की वजह से प्रॉपर्टी की तेजी से बढ़ती कीमतों पर रोक लगाने में मदद मिली है। हालांकि, खासकर मेट्रो शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें अब भी बहुत ज्यादा हैं। इससे आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए इन्हें खरीदना मुमकिन नहीं है

अपडेटेड Dec 13, 2023 पर 1:23 PM
साल 2016 में रेरा की शुरुआत हुई। इससे रियल एस्टेट कंपनियों पर ग्राहकों का भरोसा बढ़ा है। इससे घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा के साथ ही प्रॉपर्टी खरीदने की प्रक्रिया पारदर्शी बनी है।

Budget 2024: बीते दशक में रियल एस्टेट सेक्टर कई बड़े बदलाव हुए हैं। इनमें RERA और जीएसटी सबसे ऊपर हैं। दोनों ने रियल एस्टेट सेक्टर को साफसुथरा बनाने में भूमिका निभाई है। अब इस सेक्टर में ऐसी कंपनियां रह गई हैं, जो नियमों के पालन को जरूरी समझती हैं। साथ ही रगुलेटरी इनवायरमेंट भी बेहतर हुआ है। एफोर्डेबल यानी सस्ते घर बनाने पर इंडस्ट्री का फोकस बढ़ा है। कंपनियां समझने लगी हैं कि कम पैसे वाले लोगों के बीच सस्ते घरों की बड़ी मांग है। नोटबंदी के साथ ही कैश के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने की वजह से प्रॉपर्टी की तेजी से बढ़ती कीमतों पर रोक लगाने में मदद मिली है। हालांकि, खासकर मेट्रो शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें अब भी बहुत ज्यादा हैं। इससे आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए इन्हें खरीदना मुमकिन नहीं है। हम बीते दशक में आए आपको ऐसे पांच पॉजिटिव बदलावों के बारे में बता रहे हैं, जिससे रियल एस्टेट सेक्टर पहले के मुकाबले आज काफी बेहतर स्थिति में है।

1. सस्ते हाउसिंग प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा फोकस

सरकार ने सस्ते घरों वाले प्रोजेक्ट्स पर फोकस बढ़ाया है। इसके लिए सरकार ने 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) और क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम की शुरुआत की थी। इससे कम पैसे वाले लोगों को काफी फायदा हुआ। उन्हें अपने घर के सपने को पूरा करने में बड़ी मदद मिली। इससे रियल एस्टेट की मांग बढ़ाने में भी मदद मिली।

2. RERA की शुरुआत


साल 2016 में रेरा की शुरुआत हुई। इससे रियल एस्टेट कंपनियों पर ग्राहकों का भरोसा बढ़ा है। इससे घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा के साथ ही प्रॉपर्टी खरीदने की प्रक्रिया पारदर्शी बनी है। रियल एस्टेट कंपनियों को ग्राहकों के प्रति जिम्मेदार बनाने में मदद मिली है। रेरा के तहत हर बिल्डर को अपना रेजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। उसे प्रोजेक्ट से जुड़ी टाइम लाइन का पालन करना अनिवार्य है। इससे रियल एस्टेट की डील में पारदर्शिता आई है।

3. IBC में संशोधन

इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की शुरुआत 2016 में हुई थी। 2018 में इसमें संशोधन किया गया। इसके तहत घर खरीदारों को फाइनेंशियल क्रेडिटर्स का दर्जा दिया गया है। इससे देश में रियल एस्टेट की तस्वीर काफी बदली है। घर खरीदारों को फाइनेंशियल क्रेडिटर्स का दर्जा मिलने से इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया में उनके हितों का ध्यान रखा जा रहा है। इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया में उनकी बात सुनी जा रही है।

4. नोटबंदी और डिजिटल पेमेंट पर ज्यादा फोकस

सरकार ने 2016 में नोटबंदी का ऐलान किया था, जिसका सबसे ज्यादा असर रियल एस्टेट सेक्टर पर पड़ा था। ज्यादा मूल्य के नोट के इस्तेमाल पर अचानक रोक लगाने का मकसद काले धन के इस्तेमाल को रोकना था। इस फैसले से रियल एस्टेट में काले धन के इस्तेमाल में काफी कमी आई। ग्राहकों के लिए घर खरीदने के लिए कैश का इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया। इससे घरों की तेजी से बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में भी मदद मिली।

5. GST की शुरुआत

सरकार ने 1 जुलाई से जीएसटी की शुरुआत की। रियल एस्टेट सेक्टर भी जीएसटी के दायरे में आ गया। इससे कई टैक्स की जगह सिर्फ एक टैक्स की व्यवस्था शुरू हो गई। इससे एक ही चीज पर कई बार टैक्स लगने की प्रॉब्लम खत्म हो गई। ग्राहकों के लिए भी प्रॉपर्टी पर लगने वाले टैक्स का अंदाजा लगाना आसान हो गया।

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