लोकसभा चुनाव 2019 से पहले मोदी सरकार अपना अंतिम बजट पेश करने जा रही है। जानकारों के मुताबिक आने वाला अंतरिम बजट एक पॉपुलिस्ट बजट होगा, ऐसे में छोटे मझोले कारोबारियों को भी इससे उम्मीदें बढ़ गई है। इस अंतरिम बजट में देश का एमएसएमई सेक्टर वित्त मंत्री से क्या चाहता है आइए देखते हैं।
नोएडा में 34 साल से इलेक्ट्रॉनिक कैपेसीटर की फैक्ट्री चला रहे विनोद शर्मा को नई फैक्ट्री के लिए लोन चाहिए। लेकिन लंबे अनुभव और अच्छे क्रेडिट रिकॉर्ड के बावजूद बैंक लोन देने में आना कानी कर रहे हैं और विनोद शर्मा कह रहे हैं कि 59 मिनट में मुद्रा लोन की स्कीम भी एक जुमला है और कुछ नहीं।
विनोद शर्मा ही नहीं, इस वक्त एमएसएमई सेक्टर में सबसे बड़ी समस्या है कारोबार के विस्तार के लिए पैसे जुगाड़ना। कारोबारियों का मानना है कि डिफॉल्ट बड़ी कंपनियां कर रही है लेकिन इसका खमियाजा छोटे कारोबारियों को भुगतना पड़ रहा है। छोटे कारोबारियों के संगठन एफआईएसएमई ने अंतरिम बजट से पहले जो मांग पत्र वित्त मंत्री को सौंपा है उसमें विलफुल डिफॉल्टर और नॉन विल्फुल डिफॉल्टर में अंतर समझने और उनकी ट्रैकिंग के लिए गाइडलाइंस लाने की बात कही गई है। दूसरी बड़ी मांग ये है कि इंसोल्वेंसी एंड बैंकरप्टसी एक्ट के तहत एमएसएमई को फाइनेंशियल क्रेडिटर्स के साथ क्लब किया जाए। साथ ही जीएसटी कंप्लायंस के लिए सरकार को नरम रवैया अपनाने को कहा गया है।
आंकड़ो के मुताबिक भारत के छोटे और मंझोले उद्योग यानी एमएसएमई सेक्टर में करीब 3 करोड़ 60 लाख यूनिट रजिस्टर्ड हैं। अगर गैर पंजीकृत यूनिट को भी जोड़ दें तो इन इकाइयों की संख्या करीब चार करोड़ हो जाती है जिनमें 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
बड़ी संख्या में रोजगार देने के अलावा देश के एक्सपोर्ट में भी एमएसएमई सेक्टर का अहम योगदान है जो कि करीब 47 फीसदी है। ऐसे में इस अंतरिम बजट से छोटे मझोले कारोबारियों को यह उम्मीद है कि जिस ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को सरकार हर प्लेटफार्म पर प्रमोट करती आई है, उससे जुड़े भी कुछ ऐलान भी इस बजट में किए जाएं।