Utsav Mehta, Edelweiss Asset Management
Utsav Mehta, Edelweiss Asset Management
कोरोना महामारी भारतीय कंपनियों के लिए मुश्किल के तौर पर आई है लेकिन ये कई मामलों कंपनियों के लिए अच्छी भी साबित हुई है। लॉकडाउन, सप्लाई और कच्चेमाल के भंडारण से जुड़ी मुश्किलों और मांग में भारी गिरावट के बीच भी भारतीय कंपनियां इस समय मार्च 2020 की तुलना में अच्छी स्थिति में हैं।
NSE500 में शामिल 500 से ज्यादा कंपनियों ने FY21 के नतीजे जारी कर दिए हैं। इस अवधि में इस कंपनियों के मार्जिंन, कैश जेनरेशन और लीवरेज में काफी अच्छा सुधार देखने को मिला है। कई सालों की गिरावट के बाद RoEs में डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिली है।
एक वर्क फ्राम होम ईयर में जब देश की इकोनॉमी में 7 फीसदी से ज्यादा का संकुचन देखने को मिला, ऐसा होना अपने में एक आश्चर्य है। इस उपलब्धि में संकट से उबरने की लालसा और एक्सपर्ट आपदा प्रबंधन दोनों का योगदान रहा।
इस अवधि में कुछ ऐसी कंपनियां उभर कर सामने आईं जिन्होंने इस महामारी को अपने वितरण नेटवर्क को मजबूती देनें, बाजार हिस्सेदारी को बढ़ाने, अपनी प्राइसिंग पावर में सुधार करने, ब्याज लागत घटाने और गैर जरूरी खर्चों में कटौती के मौके के तौर पर उपयोग में लाया।
एक ऐसे साल जब नॉमिनल GDP में 3 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है तब इन कंपनियों की कमाई में भी 6 फीसदी की गिरावट आई है। ऐसा लग रहा होगा कि इसमें क्या खास है? इन कंपनियों की ग्रॉस मार्जिन में सालाना आधार पर 5 फीसदी की बढ़ोतरी देखे को मिली है। जो इनकी प्राइसिंग पॉवर और बाजार हिस्सेदारी में बढ़त की ओर संकेत करता है।
ध्यान से विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इस अवधि में ऑर्गनाइज्ड क्षेत्र की कंपनियों को अनऑर्गनाइज कंपनियों से हिस्सा छीनने में सफलता मिली है। ये एक ऐसा बदलाव है जिसका इंतजार नोटबंदी, GSTलागू होने और कॉर्पेरेट टैक्स में कटौती के बाद से ही किया जा रहा था।
इसके अलावा कोरोना काल की इस अवधि में कंपनियों के EBITDA में 19 फीसदी की शानदार बढ़ोतरी देखने को मिली है। इस स्थिति में निम्न ब्याज दरों ने सोने पे सुहागे का काम किया है। जिसके चलते कंपनियों के मुनाफे में वित्त 2021 के दौरान 31 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली है।
इसके साथ ही इस अवधि में कंपनियों के बैलेंस सीट में कैश फ्लो में जोरदार बढ़ोतरी देखने को मिली है। फ्री कैश फ्लो मार्जिन अपने निकटतम इतिहास में सबसे हाई लेवल पर नजर आ रहा है। इसके अलावा मार्जिन में भी मजबूती देखने को मिल रही है। कंपनियों ने इस कैश का उपयोग अपने कर्ज को घटाने में किया है। जिसके चलते कंपनियों का डेट-इक्विटी अनुपात अपने इतिहास के निचले स्तर पर है।
कंपनियां अपने पास उपलब्ध कैश का उपयोग कर्ज घटाने में कर रही हैं। इसका फायदा सिर्फ इंडिया इंक को नहीं बल्कि NPA की मार से जूझ रहे बैंको को भी मिल रहा है। हालांकि वित्त वर्ष 22 और 23 कंपनियों की सेहत के टेस्ट के लिए ज्यादा बेहतर साबित होंगे। इस अवधि से हमें इकोनॉमी में बहुप्रतीक्षित कैपिटल इन्वेस्टमेंट साइकिल की शुरुआत होती दिख सकती है जिससे ग्रोथ का चक्का आगे बढ़ता दिखेगा।
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