इसरो की अगुवाई में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने ऊंची छलाई लगाई है। इकोन वन एंड यूरोकंसल्ट ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसका नाम 'सोशियो इकोनॉमिक इम्पैक्ट एनालिसिस ऑफ इंडियन स्पेस प्रोग्राम' है। यह रिपोर्ट 23 अगस्त को जारी की गई। इसमें देश में अंतरक्षि के क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों का आकलन किया गया है। यह बताया गया है कि इनसे देश को कितना फायदा हुआ है। नेशनल स्पेस डे सेलिब्रेशन के तहत यह रिपोर्ट जारी की गई।
कम खर्च में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने का रिकॉर्ड
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इसरो (ISRO) की अगुवाई में चलने वाला भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम (Indian Space Program) काफी कम खर्च में बड़े नतीजे देने के लिए जाना जाता है। दूसरे देशों की स्पेस एजेंसियों के मुकाबले इसरो का बजट काफी कम है। इसके बावजूद अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसने बड़ी उपलब्धियां हासिल की है। उदाहरण के लिए मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी मंगलयान (Mangalyan) पर सिर्फ 7.4 करोड़ डॉलर खर्च हुए थे। यह दूसरे देशों में इसी तरह के मिशन पर होने वाले खर्च का बहुत छोटा हिस्सा है।
जीडीपी में 60 अरब डॉलर का योगदान
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक दशक में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से भारतीय अंतरिक्ष सेक्टर ने देश की जीडीपी में 60 अरब डॉलर का योगदान किया है। इसके अलावा इंडियन स्पेस सेक्टर में 47 लाख से ज्यादा नौकरियों के मौके बने हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इंडिया स्पेस सेक्टर में सरकारी और प्राइवेट कंपनियों में 96,000 लोग काम करते हैं। इस रिपोर्ट में स्पेस सेक्टर के इंडियन इकोनॉमी पर पड़ने वाले असर के अलावा उसके सामाजिक असर के बारे में भी बताया गया है।
दुनियाभर में भारत की बढ़ाई प्रतिष्ठा
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाई है और इंडिया के लीडरशिप पॉजिशन में आने में मदद की है। प्रतिस्पर्धा और बाजार तक पहुंच के मामले में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का असर निचले स्तर का रहा है। इसकी वजह यह है कि पिछले एक दशक से नेशनल स्पेस प्रोग्राम पर राजनीतिक असर रहा है। लेकिन, इसमें बदलाव आने की संभावना है।
ये चुनौतियां दूर हुई तो बढ़ेगी रफ्तार
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश से हर डॉलर के रेवेन्यू से इंडियन इकोनॉमी के लिए अतिरिक्त 2.54 डॉलर हासिल हुए हैं। हालांकि, रेगुलेटरी, फाइनेंसिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, मार्केट कॉन्टेक्स्ट, वर्कफोर्स आदि को इंडियन स्पेस सेक्टर के लिए चैलेंज बताया गया है। इसमें कहा गया है कि रेगुलेटरी रिफॉर्म्स हुए है, लेकिन अभी उनका पूरा असर देखने को नहीं मिला है।