RBI Monetary Policy: क्या आप रेपो रेट का मतलब जानते हैं, इसके घटने पर आपको क्या फायदा होगा?

RBI Monetary Policy: मॉनेटरी पॉलिसी की बैठक 3 अप्रैल को शुरू हुई थी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि आज आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास रेपो रेट में किसी तरह का बदलाव नहीं करेंगे। हमें रेपो रेट में कमी के लिए कम से कम 3-4 महीनों तक इंतजार करना होगा

अपडेटेड Apr 05, 2024 पर 9:35 AM
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आरबीआई के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने से लोन महंगा हो जाता है। इसका मतलब यह है कि लोन का इंटरेस्ट रेट बढ़ जाता है।

RBI Monetary Policy: आरबीआई (RBI) ने पिछले करीब एक साल से रेपो रेट में बदलाव नहीं किया है। यह 6.5 फीसदी पर बना हुआ है। केंद्रीय बैंक ने 2024 की पहली मॉनेटरी पॉलिसी फरवरी में पेश की थी। यह लगातार छठी पॉलिसी थी, जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में बदलाव नहीं किया था। इससे पहले फरवरी 2023 में केंद्रीय बैंक ने आखिरी बार रेपो रेट बढ़ाया था। सवाल है कि रेपो रेट क्या है, इसका बैंकों के लोन पर क्या असर पड़ता है, आरबीआई के कभी रेपो रेट बढ़ाने तो कभी घटाने की क्या वजह है? आइए इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश करते हैं।

रेपो रेट का मतलब क्या है?

रेपो रेट वह रेट है जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज देता है। केंद्रीय बैंक एक वित्त वर्ष में छह बार मॉनेटरी पॉलिसी पेश करता है। इसमें वह जरूरत के हिसाब से रेपो रेट घटाता है, बढ़ाता है या उसमें कोई बदलाव नहीं करता है। रेपो रेट के बारे में फैसला लेते वक्त केंद्रीय बैंक कई बातों को ध्यान में रखता है। इनमें मनी सप्लाई, इनफ्लेशन, क्रेडिट डिमांड आदि शामिल हैं।


रेपो रेट का क्या इस्तेमाल है?

रेपो रेट मॉनेटरी पॉलिसी के तहत आने वाला प्रमुख टूल (हथियार) है। इसके जरिए केंद्रीय बैंक इनफ्लेशन को कंट्रोल में रखने की कोशिश करता है। इकोनॉमी की तेज ग्रोथ के लिए इनफ्लेशन का नियंत्रण में रहना जरूरी है। इनफ्लेशन के अचानक बढ़ जाने पर पूरी इकोनॉमी के लिए खतरा पैदा होता है। ऐसा हम 2022 में देख चुके हैं। कोविड की महामारी शुरू होने के बाद इकोनॉमी को सहारा देने के लिए दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने अपनी मॉनेटरी पॉलिसी उदार बनाई थी। मुख्य इंटरेस्ट रेट यानी रेपो रेट में कमी की गई थी। कई देशों की सरकारों ने इकोनॉमी को सहारा देने के लिए पैकेज पेश किए थे। इसके चलते 2022 की शुरुआत में दुनिया की बड़ी इकोनॉमी में इनफ्लेशन बढ़ने लगा था।

इनफ्लेशन कंट्रोल करने में रेपो रेट कैसे मदद करता है?

अमेरिका, यूरोप और इंडिया सहित कई देशों में रिटेल इनफ्लेशन आसमान में पहुंच गया था। इससे पूरी इकोनॉमी के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया था। इसे काबू में करने के लिए केंद्रीय बैंकों ने मॉनेटरी पॉलिसी को सख्त बनाना शुरू किया था। प्रमुख इंटरेस्ट रेट (रेपो रेट) में वृद्धि की गई थी। इससे पहले कोरोना की महामारी शुरू होने पर केंद्रीय बैंकों ने इकोनॉमी को सहारा देने के लिए रेपो रेट काफी घटाया था। लेकिन, इनफ्लेशन बढ़ जाने पर उन्होंने इसे बढ़ाना शुरू किया।

RBI ने कब रेपो रेट बढ़ाना शुरू किया था?

RBI ने इंडिया में रेपो रेट बढ़ाने का सिलसिला मई 2022 में शुरू किया था। उसने लंबे समय बाद 4 मई, 2022 को मॉनेटरी पॉलिसी में रेपो रेट 0.40 फीसदी बढ़ाया था। इससे यह 4 फीसदी से बढ़कर 4.40 फीसदी पर पहुंच गया। केंद्रीय बैंक ने फरवरी 2023 तक लगातार रेपो रेट बढ़ाया था। इससे यह मई 2022 के 4 फीसदी से बढ़कर फरवरी 2023 में 6.5 फीसदी पर पहुंच गया था। हालांकि, उसके बाद से आरबीआई ने रेपो रेट में किसी तरह का बदलाव नहीं किया है। इसका मतलब है कि उसने रेपो रेट न तो बढ़ाया है और न ही घटाया है।

क्या रेपो रेट में अब कमी आएगी?

अब महंगाई के काबू में आ जाने पर उम्मीद की जा रहा है कि आरबीआई रेपो रेट में कमी करना शुरू करेगा। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे पहले वह अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के रेपो रेट घटाने तक इंतजार करना चाहेगा। अमेरिकी केंद्रीय बैंक के इस साल जून में इंटरेस्ट रेट में कमी का सिलसिला शुरू करने की उम्मीद है। उसके इंटरेस्ट रेट में कमी करने के बाद आरबीआई भी रेपो रेट में कमी करना शुरू कर सकता है। उम्मीद है कि इस साल की दूसरी छमाही से अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही तक रेपो रेट में दो-तीन बार कमी की जा सकती है।

रेपो रेट घटने या बढ़ने का क्या असर पड़ता है?

आरबीआई के रेपो रेट घटाने या बढ़ाने का असर बैंकों के लोन के इंटरेस्ट रेट पर पड़ता है। आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने पर बैंक अपने होम, ऑटो, पर्सनल सहित सभी लोन के इंटरेस्ट रेट को बढ़ा देते हैं। इसी तरह आरबीआई के रेपो रेट घटाने पर बैंक अपने लोन के इंटरेस्ट रेट में कमी करते हैं। इसकी वजह यह है कि अक्टूबर 2019 में आरबीआई ने बैंकों को अपने लोन के इंटरेस्ट रेट को किसी एक्सटर्नल बेंचमार्क से लिंक करने को कहा था। ज्यादातर बैंकों ने आरबीआई के रेपो रेट को एक्सटर्नल बेंचमार्क माना है।

रेपो रेट का महंगाई पर क्या असर पड़ता है?

आरबीआई के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने से लोन महंगा हो जाता है। इसका मतलब यह है कि लोन का इंटरेस्ट रेट बढ़ जाता है। इससे लोग लोन लेना कम कर देते हैं। इससे इकोनॉमी में चीजों की मांग घट जाती है। ऑटो और होम लोन इसके उदाहरण हैं। लोग कार खरीदने के लिए बैंक से लोन लेते हैं। इंटरेस्ट रेट कम होने पर लोन लेने में लोगों की दिलचस्पी ज्यादा होती है। इंटरेस्ट रेट बढ़ जाने पर उनकी दिलचस्पी कार लोन लेने में घट जाती है। यही बात होम लोन और दूसरे लोन पर भी लागू होती है। आरबीआई इंटरेस्ट रेट बढ़ाकर इकोनॉमी में डिमांड घटाने की कोशिश करता है। डिमांड कम होने पर चीजों की कीमतें नहीं बढ़ती हैं।

5 अप्रैल को आएगी मॉनेटरी पॉलिसी

RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 3 अप्रैल को शुरू हो गई थी। इस मीटिंग के नतीजे आज यानी 5 अप्रैल को आएंगे। हर दो महीने पर MPC की मीटिंग होती है। अर्थव्यवस्था के मैनेजमेंट के लिए मॉनेटरी पॉलिसी जरूरी है। केंद्रीय बैंक की एमपीसी इकोनॉमी की स्थिति और जरूरत को देखते हुए मॉनेटरी पॉलिसी पेश करती है।

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