Exclusive: 'पैसा लेकर हम वोट नहीं देंगे', गोवा में वेश्यावृत्ति से निकलीं महिलाओं के लिए चुनाव बना वरदान, अब जाकर मिली पहचान, पहली बार डालेंगी वोट

Goa Election 2022: गोवा में ऐसी ही कुछ महिलाएं हैं, जो इस दुनिया से अब बाहर आ चुकी हैं और अब अपना एक नया जीवन जी रही हैं, पढ़िए उनकी कहानी

अपडेटेड Feb 11, 2022 पर 12:02 PM
गोवा में वेश्यावृत्ति से निकली महिलाओं के लिए चुनाव बना वरदान

Goa Assembly Election 2022: हाल ही में एक्ट्रेस आलिया भट्ट की एक फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ, फिल्म का नाम है 'गंगूबाई काठियावाड़ी'... फिल्म मुंबई के बेहद चर्चित रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की 'क्वीन' कहे जाने वाली 'गंगूबाई कोठेवाली' के जीवन पर आधारित है। 'कोठेवाली' शब्द को सुनकर आप समझ ही चुके होंगे कि फिल्म समाज की उन महिलाओं पर बनी है, जिन्हें आज भी समाज अपना हिस्सा मानने से कतराता है, मगर गंगूबाई ने इन महिलाओं को उसी समाज में अपनी असल पहचान दिलाने के लिए, जो संघर्ष किया, वही पर्दे पर दिखाया जाने वाला है।

1960 के दशक की ये कहानी तो आप और हम अब सिल्वर स्क्रीन पर देख ही लेंगे, मगर अब रील लाइफ से हट कर रियल लाइफ की बात करना भी जरूरी है। गंगूबाई ने इन महिलाओं के जिन अधिकारों के लिए आवाज उठाई, वो शायद अभी इन महिलाओं की पहुंच से कोसो दूर हैं।

इन औरतों को हम आम भाषा में 'धंधेवाली' या अंग्रेजी में 'सेक्स वर्कर' कहते हैं और अगर कोई थोड़ा ज्यादा पढ़ा लिखा होता है, तो वो इन्हें 'प्रोस्टीट्यूट' कह देता है। वर्ग कोई भी हो, सबके लिए इनकी पहचान एक ही है, लेकिन असल में ऐसा है नहीं, क्योंकि इससे भी पहले इनकी एक पहचान है और वो यह कि ये भी इस देश की नागरिक हैं।


सुप्रीम कोर्ट का वो अहम फैसला

...और ऐसा हम नहीं कहते, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत ने भी यह माना है, इसलिए आगे बढ़ने से पहले सुप्रीम कोर्ट का दिसंबर 2021 का वो फैसला जानना भी बेहद जरूरी है। कोर्ट ने तब कहा, "गरिमा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जो इस देश के हर एक नागरिक को उसका पेशा क्या है या वो क्या करता है, इसकी परवाह किए बिना मिलता है।"

अदालत ने वेश्यावृत्ति से जुड़ी इन महिलाओं को अपनी पहचान और नागरिक अधिकार देने की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए, केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन महिलाओं के पहचान पत्र, राशन कार्ड और आधार कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज बनाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने ये भी कहा कि उनकी पहचान का आधार राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) की तरफ से दी गई लिस्ट तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए।

महामारी का वो दौर सभी के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था, लेकिन इन महिलाओं को अपने ही देश की पहचान मिलने की पहल भी, उसी कोरोना काल में इनके बिगड़ते हालात को देखने के बाद ही हुई।

साल 2022 आते ही देशभर में चुनावी माहौल बनना शुरू हो गया था और वर्तमान में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनाव की तारीखों का ऐलान भी हो चुका है। इन सब में गोवा, देश का सबसे छोटा राज्य और प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, दुर्भाग्य इस राज्य में पर्यटन ने देह व्यापार की मांग पैदा कर दी और व्यावसायिक यौन शोषण (CSE) के लिए तस्करी का कारण बना है।

अब तक नहीं डाला वोट, लेकिन वोटर का फर्ज है मालूम

गोवा में ऐसी ही कुछ महिलाएं हैं, जो इस दुनिया से अब बाहर आ चुकी हैं और अब अपना एक नया जीवन जी रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला इन महिलाओं के लिए किसी राहत से कम नहीं है, इसी के चलते आज गोवा के इतिहास में पहली बार वेश्यावृत्ति से निकली महिलाएं, इस विधानसभा चुनाव में वोट डालेंगी।

हम भी इनमें से ऐसी ही कुछ महिलाओं से मिले, जिन्हें पहली बार अपने पुराने काम के अलावा, जो अपनी मूल पहचान है, वो मिली है। हमारी जिनसे बात हुई, उनमें ज्यादातर महिलाएं कर्नाटक से थीं। उनसे बातचीत कर के, सबसे पहले जो एहसास हुआ, वो ये कि वे अपने अतीत के बारे में शायद अब भी कुछ खुल कर बताना नहीं चाहती हैं, लेकिन इनमें से कुछ एक हैं, जो अब तक मतदाता नहीं थीं, लेकिन मतदाता का फर्ज और वोट की कीमत बहुत अच्छे से जानती हैं।

सबसे पहले हमारी बात हसीना से हुई, जो मूल रूप से कर्नाटक से हैं और कई सालों से गोवा में ही रह रही हैं। इस काम से निकलने के बाद वे एक होटल में काम करने लगीं, लेकिन पिता की मौत के कारण गांव जाना पड़ा, तो नौकरी छूट गई। अभी पिछले कुछ समय से भेलपूरी, झालमुड़ी से रोजी रोटी कमा रही हैं। कोरोना काल में राहत की बात ये रही कि NGO की तरफ से, जो राशन मिला उससे पेट पालने में तकलीफ नहीं हुई, मकान मालिक ने भी छह महीने का किराया माफ कर दिया था।

हसीना से उनके पुराने काम के बारे में जब हमने पूछा, तो वो थोड़ी झिझकती हुई बोलीं, "अरे सर मैं उसमें ज्यादा नहीं थी, वो काम में मैं ज्यादा नहीं थी, कोई मेरे को उसमें फंसाया था। मैं किसी के साथ रहती थी, वो ही कमा कर मेरा पेट भरता था, दो-तीन महीने, तो हम ऐसे ही रहे, लेकिन दोनों के दिल मिल गए और हम साथ में रह गए।" हसीना का अब एक बेटा है, जो 11वीं पढ़ता है और बकौल हसीना वो पुलिस में जाना चाहता है।

इसके बाद सविता बाई से बात हुई, जो अब रेलवे की कैंटीन में काम करती हैं। सविता को पहले दो हजार रुपए मिलते थे और वर्तमान में उन्हें सात हजार रुपए मिलते हैं। वे बताती हैं कि जब उनके पास आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेज नहीं थे, तब तक उन्हें मालिक दो हजार रुपए देता था, वो भी कैश, लेकिन आधार और PAN कार्ड बनने के बाद पगार बैंक में आने लगी और तनख्वाह दो से सात हजार हो गई।

सविता बाई कर्नाटक से शादी कर गोवा में आई थीं। पति को दारू की लत थी और वो उन्हें इस काम में धखेलना चाहता था। उसकी मौत के बाद सविता इससे निकलीं और अब अपने चार बच्चों को पढ़ा भी रही हैं और घर भी चला रही हैं।

अब आपका वोटर कार्ड बन गया है, तो किसे वोट देंगी, क्या सोच कर वोट देंगी? इस सवाल के जवाब में पहले, तो सविता बाई ने कहा कि मुझे नहीं मालूम है, क्योंकि अब तक कभी वोट नहीं डाला, लेकिन हां देखेंगे नेता जब आएंगे, कौन क्या करेगा। फिर भी किसे वोट देना है कुछ तो तय किया होगा, इतना कहने पर, उन्होंने पंजा दिखा कर बोला, "जब तक हाथ है, तब तक निवाला है।"

यहां पंजे से उनके दो मतलब थे, एक तो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह और दूसरा अपना हाथ। उन्होंने बताया, "बचपन से हम कर्नाटक में अपने घर में देखते आए हैं, उधर लोगों का जान चला जाएगा, लेकिन पंजे को ही देंगे।"

वोट देने को लेकर जब इन महिलाओं से बात हुई, तो उन्होंने ने बताया कि अभी तक सोचा नहीं है, क्योंकि हमारे गांव में, जो जीता उसने काम किया, लेकिन यहां हमें कुछ पता नहीं और फिर हम वैसे भी पहली बार ही वोट डालेंगे।

उनके लिए अब पहचान पत्र, आधार कार्ड, PAN कार्ड बनना के सबसे बड़ा फायदा ये है कि उनको काम मिलेगा, लेकिन राजनीतिक पार्टी के नाम पर उन्हें सिर्फ कांग्रेस का पता है और उसके लिए वे बोलती हैं कि पंजा नहीं हारेगा, हालांकि, इनमें से कुछ को आम आदमी पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह के बारे में भी पता था।

'पंजा छोड़ कर चावल के पीछे नहीं जाएंगे'

इसलिए AAP की योजनाओं के बारे में उनसे हमने पूछा कि "झाड़ू वाला कह रहा है कि वो बिजली, पानी फ्री देगा, पैसा भी देगा, क्या आपने सुना है ये?" उनमें से किसी को भी ये सब नहीं पता था, लेकिन हसीना ने कहा, 'साहब देखो अभी चुनाव से पहले ही हमारा पानी काट दिया, अब हमें पानी के लिए इधर उधर जाना पड़ता है, जबकि वो पानी कनैक्शन सरकारी ही था।'

'कमल वाले' यानी बीजेपी पर आरोप लगाते हुए हसीना ने कहा, "कमल वाला आता है, लोगों को चावल भी दे रहा, वो लोग उनको ही वोट देंगे, लेकिन हमारे यहां नहीं आता, क्योंकि हमारा वोटर कार्ड नहीं था। अब हमारे पास वोटर कार्ड है, लेकिन हमने उसको नहीं बताया, क्योंकि हम पंजा छोड़ कर चावल के पीछे नहीं जाएंगे।"

इससे ये पता चलता है कि इन महिलाओं को सिर्फ 'पंजे' यानी कांग्रेस के अलावा और किसी के बारे में ज्यादा नहीं मालूम है। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें कांग्रेस के बारे में भी बुहत कुछ मालूम हो, क्योंकि उन्हें अपने इलाके के कांग्रेस के उम्मीदवार का भी नाम नहीं पता था।

इन महिलाओं में एक 27 साल की लड़की पूजा भी थी। पूजा का आधार कार्ड, तो करीब तीन साल पहले बन गया था, लेकिन वोटिंग कार्ड नहीं बन पाया, दो साल पहले जब उन्होंने पहचान पत्र के लिए आवेदन किया, तो उनका आवेदन रद्द कर दिया गया, क्योंकि उनसे रेंट एग्रीमेंट या शादी का सर्टिफिकेट मांगा, जो उनके पास नहीं था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बाद अब आराम से वोटिंग कार्ड बन गया।

पूजा ने बताया कि कोरोना के समय में भी नेताओं ने राशन दिया, लेकिन हमारे पास वोटिंग कार्ड नहीं था, तो हमें किसी ने राशन नहीं दिया। उन्होंने कहा, "वो लोग सिर्फ हमारा फायदा उठाते हैं, हर कोई बोलता है कि हम ये करेगा- वो करेगा, लेकिन कोई कुछ नहीं करता।"

पूजा से पूछा कि अब तो कार्ड बन गया, अब किसे वोट करोगी? तो उन्होंने कहा, "अभी तो देखेंगे कि कौन अच्छा कर सकता है, दो तीन लोग मेरे यहां मीटिंग के लिए बुलाने के लिए आए, लेकिन मैंने कहा कि मेरा वोटिंग कार्ड नहीं, तो नहीं बुलाया।" इस दौरान पूजा ने ऐसे बुजुर्ग लोगों की दुख तकलीफ समझने की भी मांग की, जिनके बच्चे उन्हें छोड़ जाते हैं और कहा, "नेताओं को ऐसे बुजुर्गों के लिए भी कुछ करना चाहिए, जो घर में अकेले रहते हैं।"

इस बातचीत के आखिर में इन महिलाओं ने यह ही कहा, "हम लोग पैसे लेकर वोट नहीं देंगे, क्योंकि आज हम पैसे लेकर वोट दे देंगे, लेकिन कल वो हमारा काम नहीं करेगा और हम भी उसके पास अपना काम कराने नहीं जा पाएंगे, क्योंकि उसको कुछ पूछने की अपनी हिम्मती भी नहीं होगी। खाने वाले को खाने दो, लेकिन हम पैसा नहीं लेंगे।"

'अन्याय रहित जिंदगी'

इन औरतों को जिस्मफरोशी के दलदल से निकाल कर एक नया जीवन और उनके अधिकार दिलाने में अहम योगदान गोवा के गैर-सरकारी संगठन अन्याय रहित जिंदगी यानी अर्ज़ एनजीओ (ARZ NGO) का है। ARZ के डायरेक्टर अरुनेंद्र पांडे ने बताया कि उनका संगठन करीब 25 सालों से गोवा में यौन शोषण (sexual abuse) और व्यावसायिक यौन शोषण (commercial sexual exploitation) के उद्देश्य से मानव तस्करी (Human trafficking) के मुद्दे पर काम कर रहा है।

अरुनेंद्र पांडे बताते हैं कि गोवा एक मेजर डेस्टीनेशन स्टेट है। भारत के कई हिस्सों से लड़कियां यहां पर तस्करी कर के लाई जाती हैं। अपनी एक रिसर्च का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि साल 2014 से 2019 के बीच गोवा में करीब 24 राज्यों से ज्यादा लड़कियां देह व्यापार के लिए तस्करी के जरिए लाई गई थीं। इनमें सबसे ज्यादा लड़कियां महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और दिल्ली से लाई गई हैं।

गोवा में बचाई हईं पीड़ितों के मूल राज्य (Source- ARZ NGO) गोवा में बचाई हईं पीड़ितों के मूल राज्य (Source- ARZ NGO)

पांडे ने बताया कि गोवा पुलिस ने ARZ को नोडल NGO नियुक्त किया है, जिसके साथ मिलकर, वो जबरन वेश्यावृत्ति में लाई गईं महिलाओं और लड़कियों का रेस्क्यू करते हैं और उनकी काउंसलिंग कर, उन्हें एक नई तरह से जीवन की शुरुआत करने में मदद करते हैं।

इन महिलाओं को इतने साल बाद एक पहचान मिलने के पीछे अरुनेंद्र पांडे तीन चीजों को एक वरदान की तरह मानते हैं, पहला सुप्रीम कोर्ट का आदेश, दूसरा चुनाव का समय और तीसरे कुछ अच्छे अधिकारियों का मिलना, जिन्होंने इस मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि इसे एक मिसाल के तौर पर लिया जाना चाहिए और हमारे लिए अब तक की यह सबसे बड़ी कामयाबी है।

दस्तावेज बनवाने में आई ये समस्या

ARZ की कोऑर्डिनेटर जुलियाना लोहार का कहना है कि इन महिलाओं और लड़कियों के लिए वोटिंग कार्ड की अहमियत वोट डालने से ज्यादा यह है कि उन्हें अपनी एक पहचान मिल गई है।

इन लोगों के वोटिंग कार्ड बनवाने में समस्याओं के बारे में बताते हुए, पांडे ने कहा कि हमारे सामने ये आया कि इन महिलाओं के रेंट एग्रीमेंट या फिर मकान मालिक की तरफ से NOC देना जरूरी है। कई केस में ये हुआ कि मकान मालिक ने अपनी इच्छा से और आराम से NOC पर साइन कर के दे दिया।

अरुनेंद्र ने आगे जो बताया वो बेहद चौंकाने वाला था, उन्होंने कहा, "कई मामलों में ये भी सामने आया है कि खुद बूथ लेवल अधिकारी (BLO) ने मकान मालिकों से ये कहा कि इन धंधे वाले लोगों को NOC क्यों दे रहे हो।" एक मामले में ऐसा भी हुआ कि आवेदन पर मकान मालिक की तरफ से NOC भी है, BLO के साइन भी और एप्लीकेंट के भी साइन हैं, लेकिन उसे ये कह कर खारिज कर दिया कि, दिए गए पते पर एप्लीकेंट यानी आवेदन करने वाला व्यक्ति मिला ही नहीं। उन्होंने कहा, "इस ग्रुप को लेकर एकदम भेदभाव वाला माहौल है।"

अरुनेंद्र पांडे ने आगे कहा कि अब हमारा अगला कदम इन महिलाओं का राशन कार्ड बनवाना है, ताकि उन्हें आराम से सरकारी राशन मिल सके है। बातचीत में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार से जो राशन मिला, उसके बारे में भी बताया।

सरकार की तरफ से मिले 12 किलो चावल और 4 किलो दाल

कोऑर्डिनेटर जुलियाना लोहार ने सरकारी आंकड़े दिखाते हुए बताया कि गोवा एड्स कंट्रोल सोसाइटी, जिसे नोडल अथॉरिटी बनाया गाया था, उसे हमने सबकी लिस्ट भेजी। जवाब में सबको राशन की मंजूरी मिल गई। सरकार की तरफ से इन महिलाओं को 12 किलो चावल और 4 किलो दाल मिली, जो कि तीन महीने के लिए था।

इसके साथ यहां ये भी बताना बहुत जरूरी है कि ये राशन प्रति परिवार को मिला, फिर चाहे किसी के परिवार में दो लोग हों या फिर चार लोग। हैरानी की बात ये भी है कि ये सरकारी राशन 12 और 13 मार्च 2021 में, तीन महीने के लिए दिया गया था, लेकिन उसके बाद से अब तक दोबारा राशन नहीं मिला।

सरकार की तरफ से मिला इतना राशन (PHOTO- Moneycontrol Hindi) सरकार की तरफ से मिला इतना राशन (Source- ARZ NGO)

भले ही सरकारी मदद इन महिलाओं के पास देर से पहुंची, लेकिन अर्ज़ NGO ने अपनी तरफ से इन महिलाओं को अच्छी मात्रा में राशन उपलब्ध कराया। अरुनेंद्र कहते हैं कि हम एक छोटा संस्थान हैं और हमारी भी कुछ लिमिट हैं, इसलिए हमने सरकार से मदद लेने की सोची।

कोऑर्डिनेटर जुलियाना लोहार ने बताया कि कोरोना काल में उन्होंने सभी महिलाओं को परिवार में प्रति व्यक्ति के हिसाब से राशन और दवाएं भी दीं। इसमें कुछ मामले ऐसे भी थे, जहां महिला और उसका बच्चा या वो गोवा से बाहर हैं, तो उन्हें राशन के हिसाब का पैसा भी भेजा गया है।

NGO की तरफ से मिला ये राशन-

- एक व्यक्ति- पांच किलो चावल

- अगर चार या उससे ज्यादा हैं- पांच किलो आटा

- उससे कम पर- तीन किलो आटा

- परिवार में तीन या उससे ज्यादा सदस्य, एक परिवार के लिए 2 किलो चीनी और 2 किलो दाल और - - 250 ग्राम चाय का पैकेट

- परिवार में चार या उससे ज्यादा सदस्य- तीन खाने के तेल के पैकेट

- एक सदस्य के लिए- दो साबुन

- बच्चों के मामले में- प्रत्येक बच्चे के लिए बिस्किट के 5 पैकेट

आखिर में गंगूबाई कोठेवाली के आजाद मैदान के प्रसिद्ध भाषण की कुछ बातें, आप सभी को जरूर जाननी चाहिए, तब उन्होंने कहा, "भारत के दूसरे शहरों के मुकाबले, बॉम्बे की सड़कें आज कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं... मैं शहर के प्रशासन से कोई श्रेय नहीं लेना चाहती, लेकिन मेरा यह भी दृढ़ विश्वास है कि कमाठीपुरा की महिलाओं को इसके लिए आंशिक रूप से श्रेय दिया जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा, "जैसे हमारे देश के जवान, जो युद्ध के मैदान में अंतहीन लड़ाई लड़ते हैं, ताकि आप सुरक्षित रहें, वैसे ही हम वेश्याएं भी हर दिन हमारी लड़ाई लड़ रही हैं।"

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