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Covid-19 के इलाज पर IRDAI का बड़ा फैसलाः अब बीमा कंपनियां भुगतान में नहीं कर सकेंगी देरी

कोरोना वायरस के चलते हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले कस्टमर्स को अब क्लेम्स सेटलमेंट में होने वाली देरी का सामना नहीं करना पड़ेगा
अपडेटेड Feb 22, 2021 पर 10:16  |  स्रोत : Moneycontrol.com

एम सरस्वती


पाठकों के लिए नोटः यह स्टोरी इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI के एक फैसले पर आधारित दो हिस्सों की श्रृंखला का भाग है। इस फैसले में आईआरडीएआई ने बीमा कंपनियों से कहा है कि वे कोविड-19 के क्लेम्स को न तो खारिज करें और न ही इनके निस्तारण में देरी करें। इस हिस्से में इस बात का जिक्र किया गया है कि आईआरडीएआई के फैसले से कस्टमर्स को क्या फायदा होगा.


महेश पाणिग्रही* दिल्ली के 42 साल के एक सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल हैं। फरवरी 2021 के पहले हफ्ते में वे कोविड-19 से संक्रमित पाए गए।


हालांकि, उनके पास एक हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि क्या उनकी बीमा कंपनी उनके हॉस्पिटलाइजेशन के पूरे बिल का भुगतान करेगी या नहीं?


इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डिवेलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (आईआरडीएआई) के समय पर उठाए गए एक कदम के चलते पाणिग्रही को बड़ी राहत मिली। बीमा कंपनी ने पाणिग्रही के एक हफ्ते के हॉस्पिटलाइजेशन के 3.9 लाख रुपये के पूरे बिल का भुगतान कर दिया।


कोरोना महामारी के दौरान कस्टमर्स की सबसे बड़ी चिंता बीमा कंपनियों का हॉस्पिटलाइजेशन के बिल का पर्याप्त भुगतान न करना रही है। आईआरडीएआई ने अब जनरल इंश्योरेंस कंपनियों से उनके इंडस्ट्री संगठन के जरिए कहा है कि कोविड-19 के क्लेम्स को निपटाने में देरी नहीं की जाए। आईआरडीएआई ने कहा है कि अस्पतालों के स्टैंडर्ड रेट्स का पालन नहीं किए जाने की स्थिति में भी क्लेम्स के निस्तारण में देरी न की जाए।


इसका मतलब है कि कस्टमर्स को इस बात की चिंता नहीं करनी होगी कि उनके रीइंबर्समेंट्स या मेडिकल क्लेम्स का भुगतान बीमा कंपनियां करेंगी या नहीं करेंगी।


स्टैंडर्ड रेट्स वे दरें होती हैं जिन्हें कोविड-19 के इलाज के लिए पूरे देश में तय किया गया है।


हालांकि, जैसा कि मनीकंट्रोल ने पहले खबर दी थी, कई हॉस्पिटलों ने इन दरों का पालन नहीं किया है। इसकी वजह से कई दफा बीमा कंपनियों और मेडिकल संस्थानों के बीच रस्साकसी का माहौल बन जाता है।


आईआरडीएआई का फैसला कस्टमर्स के लिए फायदेमंद है, हालांकि, बीमा कंपनियों को अभी भी ऊंचे क्लेम रेशियो से जूझना पड़ेगा। ऊंचे क्लेम रेशियो का मतलब है कि बीमा कंपनियों के लॉस 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ जाएंगे।


साधारण शब्दों में, इसका मतलब यह है कि बतौर प्रीमियम इकट्ठे किए गए हर 100 रुपये पर बीमा कंपनी को क्लेम के रूप में 101 या उससे ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे। इससे रिन्यूअल के वक्त पर हेल्थ पॉलिसीज में कीमतें ऊपर जाएंगी।


फरवरी के पहले हफ्ते तक बीमा कंपनियां 6,650 करोड़ रुपये के कोविड-19 से संबंधित हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम सेटल कर चुकी हैं।


अब तक करीब 13,100 करोड़ रुपये के हॉस्पिटलाइजेशन क्लेम दाखिल किए गए हैं। 6 फरवरी तक क्लेम्स की एब्सॉल्यूट संख्या 8,70,000 रही है।


रेगुलेटर ने बीमा कंपनियों से क्या कहा है


आईआरडीएआई ने कहा है कि गैर-जीवन बीमा कंपनियां जीआई काउंसिल के रेफरेंस रेट्स का इस्तेमाल क्लेम्स सेटलमेंट के लिए स्टैंडर्ड के तौर पर कर सकती हैं।


ऊंचे क्लेम्स के मामले में कहा गया है कि पॉलिसीहोल्डर को दिक्कत नहीं होनी चाहिए और जल्द से जल्द क्लेम सेटल करना बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है।


यह कदम इस वजह से महत्वपूर्ण है क्योंकि पॉलिसीहोल्डर्स को कोविड-19 के इलाज के महंगे खर्च से गुजरना पड़ा है, खासतौर पर ग्राहकों की जेब पर बोझ तब ज्यादा बढ़ जाता है जब इंफेक्शन-कंट्रोल का खर्च बिल में जोड़ दिया जाता है।


एक प्राइवेट बीमा कंपनी के अंडरराइटिंग के हेड कहते हैं, “कस्टमर्स को फायदा होना चाहिए, लेकिन हमारे लिए उचित नहीं है क्योंकि इसमें हॉस्पिटलों की गलती है। हम सलाह के मुताबिक क्लेम्स का भुगतान कर देंगे, लेकिन नियमों का पालन नहीं करने के लिए क्या अस्पतालों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए?”


इस अफसर ने यह भी कहा कि कई अस्पताल पैकेज रेट को बढ़ा रहे हैं और इसका खामियाजा बीमा कंपनियों को भुगतना पड़ता है।


मिसाल के तौर पर, जीआई काउंसिल का रेट कार्ड कहता है कि नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (एनएबीएच) से जुड़े हुए हॉस्पिटलों के यहां कॉस्ट 10,000 रुपये प्रति दिन होगा। इसमें पीपीई कॉस्ट (पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट) को 1,200 रुपये रखा गया है और यह 10,000 रुपये रोजाना के खर्च में शामिल है।


गैर-एनएबीएच अस्पतालों के मामले में यह रकम 8,000 रुपये प्रतिदिन है। इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती होने वाले कई गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए हॉस्पिटल का प्रतिदिन का खर्च 18,000 रुपये (गैर-एनएबीएच हॉस्पिटल के लिए 15,000 रुपये प्रतिदिन) तय किया गया है, इसमें पीपीई कॉस्ट के तौर पर 2,000 रुपये भी शामिल हैं।


एक सरकारी बीमा कंपनी के सीनियर वाइस-प्रेसिडेंट कहते हैं, “इन स्टैंडर्ड दरों का न के बराबर पालन हो रहा है। सरकार को ऐसे हॉस्पिटलों की खिंचाई करनी चाहिए और उन्हें ये दरें मानने के लिए मजबूर करना चाहिए। हम निर्देश के मुताबिक बिलों का भुगतान कर रहे हैं, लेकिन कस्टमर्स को पॉलिसी रिन्यूअल के वक्त पर 10-15 फीसदी ज्यादा प्रीमियम देने पड़ सकते हैं।”


इन भुगतानों पर कुछ शर्तें भी रहती हैं। एक शर्त रूम रेंट की लिमिट की है। मिसाल के तौर पर, 1,500 से 2,000 रुपये रोजाना की दर। अगर ग्राहक बीमा के जरिए हॉस्पिटलाइजेशन का भुगतान चाहता है तो उसकी रूम रेंट की दर का सख्ती से पालन होना चाहिए।


दूसरा, घर पर केयर को ट्रेडिशनल हॉस्पिटलाइजेशन मेडिकल इंश्योरेंस में कवर नहीं किया जाएगा। ऐसे में अगर कोई कस्टमर कोविड-19 से संक्रमित हो जाता है और उसे घर पर रिकवर करने की सलाह दी जाती है तो अगर बीमा में केवल हॉस्पिटलाइजेशन को कवर किया गया है (न्यूनतम 24 घंटे) तो ऐसे मामले में घर पर पीपीई किट या दवाइयों का कोई भी खर्च स्टैंडर्ड हेल्थ इंश्योरेंस प्लान के तहत भुगतान के योग्य नहीं होगा।


कस्टमर्स के लिए यह क्यों अहम है?


पारंपरिक तौर पर, ऐसा देखा गया है कि खासतौर पर जिन लोगों के पास हेल्थ कवर होता है, अस्पताल उनसे ज्यादा बिल वसूलते हैं।


महामारी के दौर में भी पूरे देश में ऐसा देखा गया है। हजारों लोगों को अप्रैल 2020 के बाद से अस्पतालों में भर्ती होना पड़ा।


हॉस्पिटल्स के लिए अपने खर्चों को मैनेज करने की चुनौती से जूझना पड़ा, उस वक्त वायरस फैलने के चलते चुनिंदा सर्जरीज को आगे बढ़ाना पड़ा।


हालांकि, बीमा क्लेम्स केवल आंशिक तौर पर दिए जा रहे थे, लेकिन अस्पतालों ने टेंपरेचर चेक फीस, पीपीई किट फीस और क्लीनिंग फीस जैसे नए चार्ज लगाना शुरू कर दिया।


हकीकत तो यह है कि जीआई काउंसिल ने अस्पतालों की ओवरचार्जिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर करने का भी मन बना लिया था, लेकिन यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया।


इंश्योरेंस पूल कॉन्सेप्ट पर काम करता है। ऐसे में प्रीमियम के तौर पर इकट्ठी की जाने वाली रकम को ही क्लेम के तौर पर चुकाया जाता है।


अगर किसी साल में चुकाए गए क्लेम इकट्ठे किए गए प्रीमियम से ज्यादा हो जाते हैं तो इस अतिरिक्त रकम को अगले साल कस्टमर्स से प्रीमियम में बढ़ोतरी के तौर पर वसूला जाता है।


कस्टमर्स इस बात की ओर भी संकेत करते हैं कि कुछ हॉस्पिटलों ने सेलेक्टिव चार्जिंग का भी सहारा लिया है।


मालिनी सरावगी* 34 साल की हैं। वे कोलकाता रहती हैं और एक आर्टिस्ट हैं। उन्होंने मनीकंट्रोल को बताया कि हालांकि, उनसे मास्क और पीपीई किट के लिए पैसे लिए गए, लेकिन उनके साथ कमरा शेयर कर रहे दो और लोगों से यह खर्च नहीं लिया गया।


सरावगी कहती हैं, “मुझे पता चला कि उनके पास कोई हेल्थ पॉलिसी नहीं थी, जबकि मेरे पास कवर था। मेरी बीमा कंपनी ने 18,000 रुपये के अतिरिक्त खर्चों को नहीं दिया। यह अच्छा होता अगर शुरुआती चरण में ही बीमा कंपनियों को इस तरह के क्लेम्स का भुगतान करने के लिए कह दिया जाता।”


सरावगी अक्तूबर 2020 में कोविड-19 से संक्रमित हो गई थीं और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भर्ती होना पड़ा था।


हालांकि, उनकी पड़ोसी निशा रेबेलो* इस मामले में लकी थीं। 57 साल की शिक्षिका रेबेलो को करीब दो हफ्ते पहले कोविड-19 के चलते हॉस्पिटलाइज करना पड़ा और उन्हें भरोसा दिलाया गया कि उन्हें रीइंबर्समेंट पॉलिसी के तहत पूरा भुगतान मिलेगा।


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