फर्जी तरीके से SMEs की वैल्यूएशन बढ़ा रहे कई इनवेस्टमेंट बैंकर्स, इसके बदले अवैध कमाई में ले रहे हिस्सा

कुछ इनवेस्टमेंट बैंकर स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (SME) के IPO बूम से अनोखे अंदाज में मुनाफा कमा रहे हैं। वे छोटे कारोबारी इकाइयों से संपर्क कर उन्हें ज्यादा वैल्यूएशंस पर पब्लिक इश्यू लाने का ऑफर दे रहे हैं। मामले से वाकिफ सूत्रों ने मनीकंट्रोल को बताया कि इस तरह का प्रचलन गुजरात और महाराष्ट्र में आम था। हालांकि, अब शेयर बाजार में जश्न के माहौल की वजह से खास तौर पर SME सेगमेंट में इसका दायरा बढ़ गया है

अपडेटेड Sep 24, 2024 पर 6:37 PM
स्टॉक एक्सचेंजों के SME प्लेटफॉर्म पर पिछले दशक में 14,000 करोड़ रुपये जुटाए गए ।

कुछ इनवेस्टमेंट बैंकर स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (SME) के IPO बूम से अनोखे अंदाज में मुनाफा कमा रहे हैं। वे छोटे कारोबारी इकाइयों से संपर्क कर उन्हें ज्यादा वैल्यूएशंस पर पब्लिक इश्यू लाने का ऑफर दे रहे हैं। मामले से वाकिफ सूत्रों ने मनीकंट्रोल को बताया कि इस तरह का प्रचलन गुजरात और महाराष्ट्र में आम था। हालांकि, अब शेयर बाजार में जश्न के माहौल की वजह से खास तौर पर SME सेगमेंट में इसका दायरा बढ़ गया है।

सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने प्रेस रिलीज और अलग-अलग मंचों के जरिये निवेशकों को इस सेगमेंट में कुछ संदिग्ध गतिविधियों को लेकर सावधान रहने की सलाह दी है। मार्केट रेगुलेटर ने 28 अगस्त को प्रेस रिलीज जारी कर इस सेगमेंट के IPO में अचानक हुई बढ़ोतरी के बारे में आंकड़े भी पेश किए थे। सेबी के बयान में कहा गया था कि स्टॉक एक्सचेंजों के SME प्लेटफॉर्म पर पिछले दशक में 14,000 करोड़ रुपये जुटाए गए और इसका 43% हिस्सा (6,000 करोड़ रुपये) सिर्फ वित्त वर्ष 2024 में जुटाया गया। सेबी ने निवेशकों को ऐसे इश्यू में निवेश करने से पहले सावधानी बरतने की सलाह दी थी।

एक सूत्र ने इस सिलसिले में बैंकर्स और प्रमोटर्स के तालमेल के बारे में बताया, 'उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए कि किसी एंटरप्राइज का प्राइस उसके प्रॉफिट का 5 गुना कोट किया गया है (जैसा कि आम तौर पर होता है), तो बैंकर कहेंगे वे 10 गुना या 20 गुना पैसे जुटाने में एंटरप्राइज की मदद करेंगे। इसके बाद वे सरप्लस वैल्यू में हिस्सा मांगते हैं।'


यह सिस्टम कैसे काम करता है?

सूत्रों के मुताबिक, बैंकर सबसे पहले छोटे शहरों में चार्टर्ड एकांउटेंट से संपर्क करते हैं और यह पूछते हैं कि क्या वे ऐसे छोटी कारोबारी इकाइयों के बारे में जानते हैं, जो फंड की तलाश में हैं। एक सूत्र ने बताया, 'इसके बाद बैंकर आसानी से फंड जुटाने का हवाला देकर प्रमोटर्स पर पब्लिक इश्यू लाने के लिए दबाव बनाते हैं। अगर क्लाइंट शुरुआती बैठकों में इस आइडिया को लेकर सहमत होते हैं, तो बैंकर इससे जुड़े अतिरिक्त फायदों (ज्यादा वैल्यूएशन) की बात करते हैं।'

बैंकर्स इसमें ऐसे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की मदद लेते हैं, जो बही-खातों में हेराफेरी करने, फर्जी रसीद बनाने आदि चीजों के लिए तैयार रहते हों। ऐसे इश्यू में सामान्य तौर पर बैंकर की फीस 1 पर्सेंट से 3 पर्सेंट होती है, जो अब बढ़कर 7 पर्सेंट तक पहुंच चुकी है। बाकी रकम कैश में उपलब्ध कराई जाती है। एक सूत्र के मुताबिक, बैंकर इस कैश का इस्तेमाल बाद में ग्रे मार्केट प्राइस में गड़बड़ी करने के लिए कर सकते हैं। बहरहाल, शेयर बाजार रेगुलेटर इस सेगमेंट की कंपनियों की वित्तीय सेहत से संबंधित नियमों को सख्त बनाने के लिए लगातार कोशिशें कर रहा है।

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