Dollar Vs Rupee : डॉलर के मुकाबले रुपए की चाल सपाट, जानिए क्या जियो प्लेटफॉर्म्स IPO के बाद जारी रह पाएगी इसकी रिकवरी

Dollar Vs Rupee :पिछले हफ्ते रुपया 94.32 और 94.97 के दायरे में कारोबार करता दिखा। इसे जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO से आए फंड और करेंसी पोजीशन की अनवाइंडिंग से सपोर्ट मिला। हालांकि, बाजार जानकारों का मानना ​​है कि यह सपोर्ट कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि सोमवार को IPO अलॉटमेंट की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, और बुधवार को कंपनी की शेयर बाजार में लिस्टिंग होने हैं

अपडेटेड Oct 26, 2026 पर 1:37 PM
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Dollar vs Rupee : रुपये के लिए तत्काल चुनौती यह है कि क्या वह अपनी रिकवरी को बनाए रख पाएगा। अब IPO से आने वाला वह निवेश भी नहीं है जिसने पिछले हफ्ते इसे सहारा दिया था

Dollar Vs Rupee : डॉलर के मुकाबले रुपए में आज सपाट कारोबार हो रहा है। फिलहाल 12.50 बजे के आसपास डॉलर के मुकाबले रुपया 0.27 रुपए यानी 0.27% फीसदी की बढ़त के साथ 95.17 रुपए प्रति डॉलर पर दिख रहा था। आज सुबह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया मामूली बढ़त के साथ खुला भी था। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और जियो प्लेटफॉर्म्स IPO से जुड़े विदेशी फंड के प्रवाह में कमी आने की संभावना के चलते, रुपये की हालिया रिकवरी के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

सोमवार (26 अक्टूबर) को रुपया डॉलर के मुकाबले 94.93 पर खुला। शुक्रवार को यह 94.94 पर बंद हुआ था, यानी कारोबार की शुरुआत में इसमें 1 पैसे की तेजी आई। फिर भी, रुपये के 95 प्रति डॉलर के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे गिरने का खतरा बना हुआ है। आज शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 5 पैसे गिरकर 94.98 पर आ गया था। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुपये पर दबाव देखने को मिल रहा है।

फॉरेक्स कारोबारियों ने बताया कि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के चलते वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने रुझान (रिस्क एवर्जन) के कारण रुपये की शुरुआत कमजोर रही। हालांकि, अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी ने रुपये की गिरावट को कुछ हद तक थाम लिया है।


इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में रुपया 94.92 पर खुला, और फिर कमजोर होकर 94.98 के स्तर पर आ गया, जो पिछले बंद भाव के मुकाबले 5 पैसे कम है। शुक्रवार को रुपया लगातार दूसरे दिन कमजोर हुआ था और 12 पैसे गिरकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.93 पर बंद हुआ।

मिरे एसेट शेरखान के रिसर्च एनालिस्ट अनुज चौधरी का कहना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारतीय रुपया थोड़ी कमजोरी के साथ खुला। हालांकि, अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी ने गिरावट को कुछ हद तक थाम लिया। उन्होंने आगे कहा कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच, वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने के रुझान (risk aversion) के कारण रुपया थोड़ी कमजोरी के साथ कारोबार कर सकता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और FII (विदेशी संस्थागत निवेशकों) की ओर से बिकवाली का दबाव भी रुपये पर असर डाल सकता है। हालांकि, अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और RBI की ओर से कोई नया हस्तक्षेप रुपये को निचले स्तरों पर सहारा दे सकता है।

ब्रेंट क्रूड की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। विदेशी निवेशकों की निकासी के कारण रुपए पर दबाव है। ट्रेडर्स को यह भी उम्मीद है कि इस हफ्ते अमेरिकी फेडरल रिजर्व का फैसला मुद्रा की चाल को प्रभावित करेगा। इस बीच, शुक्रवार को जारी RBI के आंकड़ों से पता चला कि 16 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5.011 अरब अमेरिकी डॉलर घटकर 721.016 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया। इससे पिछले सप्ताह में, इसमें 8.578 अरब अमेरिकी डॉलर की कमी आई थी और यह 726.027 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया था।

पिछले हफ्ते रुपया 94.32 और 94.97 के दायरे में कारोबार करता दिखा। इसे जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO से आए फंड और करेंसी पोजीशन की अनवाइंडिंग से सपोर्ट मिला। हालांकि, बाजार जानकारों का मानना ​​है कि यह सपोर्ट कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि सोमवार को IPO अलॉटमेंट की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, और बुधवार को कंपनी की शेयर बाजार में लिस्टिंग होने हैं।

रुपये की रिकवरी की रफ्तार क्यों पड़ सकती है धीमी?

जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों से काफी अच्छी मांग आई। माना जा रहा है कि इन निवेशों से आया कुछ पैसा स्पॉट करेंसी मार्केट में भी गया, जिससे रुपये को सहारा मिला।

हालांकि, ट्रेडर्स को लगता है कि रुपये को मिलने वाला यह सपोर्ट अब घट सकता है। एक प्राइवेट बैंक के करेंसी ट्रेडर ने रॉयटर्स को बताया कि पिछले हफ्ते मिला यह सपोर्ट दोबारा मिलने की संभावना कम है। वहीं, तेल की ऊंची कीमतें बाजार के सेंटीमेंट पर दबाव डाल रही हैं।

इस वजह से रुपया बाहरी दबावों के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गया है। ऐसे में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का दखल यह तय करने में एक अहम फैक्टर बना रहेगा कि आने वाले समय में रुपये की चाल किस दिशा में होगी।

कच्चा तेल एक बड़ी चुनौती

रुपये के लिए सबसे बड़ी चुनौती अभी भी महंगा कच्चा तेल है। पिछले हफ्ते ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 6 फीसदी से ज्यादा की तेजी आई, जिससे यह 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। यह पिछले छह महीनों का उच्चतम स्तर है। सऊदी अरब पर हुए हमलों के बाद सप्लाई में रुकावट के डर ने बाजार में अनिश्चितता और बढ़ा दी है।

भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश का आयात बिल भी बढ़ जाता है। इससे व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें कंपनियों को करेंसी में उतार-चढ़ाव से बचने (हेजिंग) के लिए प्रेरित कर सकती हैं। साथ ही, इससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का सेंटीमेंट भी कमजोर पड़ सकता है, जिससे घरेलू मुद्रा पर और दबाव पड़ेगा।

फिलहाल, तेल रिफाइनरियों की ओर से डॉलर की मांग बाजार पर सीधा दबाव नहीं डाल रही है, क्योंकि RBI की एक विशेष सुविधा (स्पेशल विंडो) के जरिए वे अपनी विदेशी मुद्रा की जरूरतें बाजार से बाहर ही पूरी कर सकते हैं। हालांकि, तेल की ऊंची कीमतें भारत के एक्सटर्नल फाइनेंस के लिए एक बड़ी चिंता बनी हुई हैं।

US फेड के नीतिगत फैसले पर नजर

कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी फंड के प्रवाह के अलावा, इस हफ्ते निवेशक US फेडरल रिजर्व के फैसले पर भी नजर रखेंगे।

बाजार को उम्मीद है कि US फेड ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा। हालांकि, निवेशक यह जानने की कोशिश करेंगे कि आगे की नीति क्या हो सकती है। उनकी नजर इस बात पर रहेगी कि क्या दिसंबर में ब्याज दरों में फिर से बढ़ोतरी की जा सकती है। US फेड के रुख का असर डॉलर की चाल और भारत जैसे उभरते बाजारों में आने वाले विदेशी पूंजी पर पड़ सकता है।

रुपये के लिए तत्काल चुनौती यह है कि क्या वह अपनी रिकवरी को बनाए रख पाएगा। अब IPO से आने वाला वह निवेश भी नहीं है जिसने पिछले हफ्ते इसे सहारा दिया था। तेल की ऊंची कीमतों और ग्लोबल मौद्रिक नीति को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच, ट्रेडर्स की नजर इस बात पर होगी कि क्या रुपया 95 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे बना रह पाएगा या नहीं।

 

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