फ्यूचर्स-ऑप्शंस सौदों में होने वाली गड़बड़ी को किस तरह रोका जाए, ये जानने-समझने के लिए एक वर्किंग कमिटी बनाई गई थी। इस वर्किंग कमिटी की सिफारिश है कि डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स का मिनिमम लॉट साइज 20 से 30 लाख रुपए के बीच कर दिया जाए। फिलहाल डेरिवेटिव का मिनिमम लॉट 5 लाख रुपए का होता है। इस मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने मनीकंट्रोल को बताया डेरिवेटिव्स के बेलगाम वॉल्यूम ग्रोथ पर लगाम लगाने के लिए वीकली ऑप्शन की हर एक्सचेंज पर हर हफ्ते सिर्फ एक एक्सपायरी तय करने की सिफारिश की गई है। अभी हर रोज कोई ना कोई एक्सपायरी होती है।
शेयर मार्केट रेगुलेटर सेबी ने पिछले महीने यह वर्किंग कमिटी बनाई थी। इसमें इस सेक्टर के कई एक्सपर्ट्स शामिल थे। पिछले कुछ सालों में फ्यूचर्स-ऑप्शंस सौदों में रिटेल इनवेस्टर्स की भागीदारी बढ़ने से सट्टेबाजी काफी बढ़ गई है। इसी समस्या से निपटने के लिए सेबी ने वर्किंग कमिटी का गठन किया था।
F&O को ट्रेडिंग का हीरो या जीरो माना जाता है। एक झटके में यहां अच्छे पैसे बन सकते हैं या पूरी पूंजी डूब सकती है। ऐसे में सट्टेबाजों के चंगुल से रिटेल इनवेस्टर्स को बचाने के लिए सेबी ने कमिटी से सिफारिश मांगी थी। क्योंकि इस तरह के सौदों में छोटे निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
सिफारिशें मानी गईं तो क्या होगा असर
वर्किंग कमिटी ने जो दो सिफारिशें दी हैं अगर उन्हें मान लिया जाता है तो वॉल्यूम में बड़ी कमी आएगी।पहली सिफारिश ये है कि कॉन्ट्रैक्ट साइज को 5 लाख से बढ़ाकर 20-30 लाख रुपए कर दिया जाए। अगर यह नियम लागू होता है तो छोटे-छोटे ट्रेडर्स दूर हो जाएंगे।
दूसरी बात ये कि हर हफ्ते हर एक्सचेंज पर सिर्फ एक बार एक्सपायरी होने से ट्रेडर्स के खेल करने के मौके कम हो जाएंगे। कमिटी ने जो दूसरे प्रस्ताव दिए हैं उनके मुताबिक, कम स्ट्राइक प्राइस, ऑप्शन बायर्स से पहले ही ऑप्शन प्रीमियम की वसूली, पॉजिशन लिमिट की इंट्रा-डे मॉनिटरिंग और एक्सपायरी के नजदीक आते ही मार्जिन बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं।
सेबी के इस पैनल ने जो सिफारिश की हैं उस पर फैसला लेने से पहले सेकेंडरी मार्केट एडवाइजरी कमिटी की राय ली जाएगी।
किस बात से परेशान है सेबी?
भारत में डेरिवेटिव्स वॉल्यूम में वृद्धि एक चिंता का कारण रही है। सेबी की चेयरपर्सन ने हाल ही में कहा कि मजबूत मार्जिनिंग सिस्टम के कारण यह वृद्धि कोई प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न नहीं करती है। लेकिन जहां डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को अक्सर प्रणालीगत जोखिमों के लिए जांचा जाता है, वहीं इसके गंभीर सामाजिक परिणाम भी उतने ही चिंताजनक हैं।
ऐसी कई कहानियां हैं जिनसे पता चलता है कि फटाफट मुनाफा कमाने की उम्मीद में लोग उधार लेकर ऑप्शंस ट्रेडिंग करते हैं। जबकि सेबी की ये कहती है कि डेरिवेटिव्स ट्रेड करने वाले हर 10 में से 9 रिटेल ट्रेडर्स ऑफ्शंस सौदों में अपनी रकम गंवाई ही है।
मार्केट के दिग्गज जानकारों का कहना है कि ज्यादातर वीकली कॉन्ट्रैक्ट्स से कोई कमाई नहीं होती है क्योंकि उनका इस्तेमाल सट्टेबाजी के लिए किया जाता है न कि हेजिंग के लिए। जबकि वीकली एक्सपायरी हेजिंग के लिए ही शुरू किया गया था।
क्या कहते हैं सेबी के आंकड़े?
सेबी के डेटा के मुताबिक, फिस्कल ईयर 2018 में डेरिवेटिव टर्नओवर 210 लाख करोड़ रुपए था। जो फिस्कल ईयर 2024 में बढ़कर 500 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है। कुल मिलाकर देखें तो पिछले कुछ साल में डेरिवेटिव्स सौदों में रिटेल इनवेस्टर्स की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। फिस्कल ईयर 2023 में कुल इनवेस्टर्स की संख्या 65 लाख थी जो फिस्कल ईयर 2024 में करीब 40 फीसदी बढ़कर 96 लाख तक पहुंच गई है। ऑप्शंस इंडेक्स में इंडिविजुअल इनवेस्टर्स की संख्या फिस्कल ईयर 2018 में सिर्फ 2 फीसदी थी जो फिस्कल ईयर 2024 में बढ़कर 41 फीसदी पहुंच गई है।