Amazon,Tesla, Netflix जैसे अमेरिकी स्टॉक्स में क्या आपको NSE IFSC के जरिए करना चाहिए निवेश?

अपडेटेड Mar 04, 2022 पर 1:23 PM
ऐसे निवेशक जिनको ग्लोबल कंपनियों और ग्लोबल मार्केट की अच्छी समझ है वो NSE IFSC के जरिए अमेरिकी शेयरों में निवेश का तरीका अपना सकते हैं.

भारतीय निवेशक अब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विस सेंटर (IFSC) प्लेटफॉर्म के जरिए 3 मार्च से 8 pm और 2.45 am तक 8 चुनिंदा अमेरिकी शेयरों में ट्रेडिंग कर सकेंगे। शुरूआत में Amazon, Apple, Alphabet (Google), Tesla, Meta Platforms (Facebook), Microsoft, Netflix और Walmart के शेयरों में ट्रे़डिंग की अनुमति मिली है।

इस शेयरों में ट्रेडिंग NSE IFSC निवेशकों को डिपॉजिटरी रीसिट देगी जो इन ग्लोबल कंपनियों के शेयरों में ट्रेडिंग करने के बदले मिलेंगे। चूंकि विदेशी निवेश लिमिट में अभी बढ़ोतरी नहीं की गई है। ऐसे में अधिकांश इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड ग्लोबल मार्केट में निवेश करने की अपनी सीमा पार कर चुके हैं। जिसकी वजह से म्यूचुअल फंडों और ईटीएफ के जरिए विदेशी निवेश के बहुत ही कम विकल्प हैं। इस स्थिति में NSE IFSC भारतीय निवेशकों को अमेरिकी बाजारों में निवेश करने का एक और विकल्प दे रहा है।

आइए जानते हैं क्या निवेशकों के लिए यह सुविधा उपयुक्त है और क्या इस तरह का निवेश करना चाहिए।


NSE IFSC के जरिए विदेशी शेयरों में कैसे करें निवेश

इसके लिए निवेशकों को सबसे पहले गुजरात के गिफ्ट सिटी में डिपॉजिटरी के साथ एक डीमैट अकाउंट खोलना होगा। इसके लिए निवेशकों को इस बात की जांच कर लेनी चाहिए की क्या उनका ब्रोकर डिपॉजिटरी में भागीदार है। तमाम बड़े रिटेल ब्रोकरेज फर्म NSE IFSC से अपना कारोबार शुरु कर रहे हैं। वर्तमान में गिफ्ट सिटी में सिर्फ एक डिपॉजिटरी है जिसमें NSE, BSE, Multi Commodity Exchange of India, National Securities Depository और Central Depository Services (India) का संयुक्त मालिकाना हक है।

इसके अलावा विदेशी शेयरों में निवेश के इच्छुक निवेशकों को NSE IFSC के ब्रोकर मेबर के साथ एक ट्रेडिंग अकाउंट भी खोलना होगा। इस तरह के निवेश में निवेशकों को उनके इन्वेस्टमेंट के बदले अमेरिकी कंपनियों के शेयर ना मिलकर उनके DRs (डिपॉजिटरी रीसिट) मिलेंगे। जो कि निवेशक के डीमैट अकाउंट में जमा होंगे। अगर कंपनियों द्वारा किसी तरीके के कॉर्पोरेट एक्शन (जैसे डिविडेंड ) का एलान किया जाता है तो उसको निवेशक के अकाउंट में उसके DRs होल्डिंग के अनुपात में क्रेडिट कर दिया जाएगा। हालांकि निवेशकों को इस तरह के निवेश पर कोई वोटिंग राइट नहीं होगा।

NSE की यह सुविधा ब्रोकरों द्वारा दी जाने वाली सुविधा से कितनी है अलग?

घरेलू ब्रोकर द्वारा दी जाने वाली विदेशी शेयरों में निवेश की सुविधा में ब्रोकर के नाम पर किसी थर्ड पार्टी कंसोडियन के साथ शेयर रखें जाते हैं। ये शेयर इन्वेस्टर के नाम पर नहीं होते। अगर किसी स्थिति में ब्रोकर डिफॉल्ट करता है तो पैसे की रिकवरी मुश्किल हो जाती है। इसके लिए निवेशक को यूएस सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन में आवेदन करना पड़ता है। डॉमेस्टिक ब्रोकर अपने ब्रोकर पार्टनरों द्वारा किसी जोखिम से निपटने के लिए इश्योरेंस कवर ले सकता है। ऐसे में आपको किसी ब्रोकर्स से इस तरह की सुविधा लेने के पहले इसकी जांच कर लेनी चाहिए कि उसने इस तरह का इंश्योरेंस कवर लिया है कि नहीं।

वहीं दूसरी तरफ NSE IFSC सेबी द्वारा रेगुलेटेड एक प्लेटफॉर्म है। जिसमें निवेश करने पर मिलने वाले डिपॉजिटरी रीसिट निवेशक के नाम पर ही जारी होते हैं।

क्या आपको करना चाहिए NSE IFSC के जरिए निवेश

तमाम फाइनेंशियल प्लानर का कहना है कि ऐसे निवेशक जो अपने पोर्टफोलियो को विदेशी निवेश के जरिए डायवर्सिफाइ करने की शुरुआत कर रहे हैं उनके लिए अभी भी म्यूचुअल फंडों और ईटीएफ के जरिए निवेश करना ज्यादा बेहतर विकल्प है।

Plan Ahead Wealth Advisors के विशाल धवन (Vishal Dhawan) का कहना है कि सभी निवेशकों के पास इतनी अच्छी रिसर्च क्षमता नहीं हो सकती है जिससे यह जान सकें कि उनको किन विदेशी स्टॉक्स में निवेश करना चाहिए और किनसे दूर रहना चाहिए। ऐसे में विदेशी शेयरों के जरिए अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाइ करने के इच्छुक निवेशकों के लिए अभी भी इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड(ETFs) बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि कई म्यूचुअल फंडों की विदेशी ईटीएफ में निवेश करने की लिमिट अभी भी पूरी भरी नहीं है और यह खुले हुए हैं । विशाल धवन की सलाह है कि जब तक म्यूचुअल फंडों की विदेशी निवेश सीमा पर और सफाई नहीं आ जाती तब तक हम विदेशों में लिस्टेड ईटीएफ में निवेश पर फोकस कर सकते हैं। हालांकि ऐसे निवेशक जिनको ग्लोबल कंपनियों और ग्लोबल मार्केट की अच्छी समझ है वो NSE IFSC के जरिए अमेरिकी शेयरों में निवेश का तरीका अपना सकते हैं।

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