भारत का डेरिवेटिव या फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) मार्केट फिलहाल अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। रेगुलेटर की तरफ से मिल रहे मिले-जुले संकेतों की वजह से निवेशक उलझन में हैं। दरअसल, पॉलिसीमेकर्स के लिए अटकलों के आधार पर उतार-चढ़ाव संबंधी गतिविधियों और मार्केट की मजबूती को बरकारर रखना चुनौती बना हुआ है। ट्रेडिंग वॉल्यूम में बढ़ोतरी ने शेयर बाजार के रेगुलेटर्स और बाजार के भागीदारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे में इस बात को लेकर भी बहस शुरू हो गई है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग से जुड़े जोखिम से कैसे निपटा जाए।
बजट से पहले के सलाह-मशवरे के दौरान एसेट मैनेजमेंट फर्मों ने डेरिवेटिव ट्रेड पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में बढ़ोतरी की वकालत की थी। इन फर्मों के मुताबिक, ज्यादा टैक्स की वजह से शेयर बाजार में सट्टेबाजी पर लगाम लग सकेगी। सट्टेबाजी की वजह से शेयर बाजार में अस्थिरता पैदा होने की आशंका रहती है। बहरहाल, मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) पिछले दो साल से रिटेल इनवेस्टर्स को इस तरह की ट्रेडिंग को लेकर सावधान कर रहा है।
सेबी ने इस डेटा के आधार पर यह चेतावनी जारी की है कि 90 पर्सेंट रिटेल ट्रेडर डेरिवेटिव ट्रेडिंग से प्रॉफिट हासिल करने में नाकाम रहते हैं। यह आंकड़ा फ्यूचर्स ए़ंड ऑप्शंस ट्रेडिंग से जुड़े जोखिम के बारे में बताता है। डेरिवेटिव सेगमेंट में रिटेल इनवेस्टर्स की भागीदारी बढ़ने से शेयर बाजार की स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। फ्यूचर्स ए़ंड ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स में उतार-चढ़ाव की काफी आशंका होती है और इसका असर पूरे शेयर बाजार में दिख सकता है।
एक्सपर्ट्स ने इस सिलसिले में स्टॉक एक्सचेंजों के हालिया कदमों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इन कदमों की वजह से ही सट्टेबाजी संबंधी गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। स्टॉक एक्सचेंजों ने 2019 में सूचकांकों के लिए वीकली एक्सपायरी का ऐलान किया था, जिस पर सवाल उठ रहे हैं। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मंथली एक्सपायरी सिस्टम से वीकली एक्सपायरी सिस्टम में बदलाव से शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि निफ्टी कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए लॉट साइज कम करने से डेरिटिव का काम छोटे ट्रेडर्स के लिए मुमकिन हो गया है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि लॉट साइज बढ़ाने से रिटेल ट्रेडर्स के लिए गुंजाइश सीमित हो सकेगी और सट्टेबाजी संबंधी गतिविधियां कम होंगी। मंथली एक्सपायरी शेड्यूल को फिर से वापस लाने से बाजार में स्थिरता बहाल हो सकती है। हालांकि, एक्सचेंज और ब्रोकर्स इस प्रस्ताव का विरोध कर सकते हैं।