NSE की मुश्किलें खत्म होती नहीं दिख रही हैं। खबरों के मुताबिक, SEBI ने देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज को नोटिस भेजा है। इसमें कुछ हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स के सॉफ्टवेयर के दुरूपयोग के आरोप पर जवाब मांगा गया है। टैक्स अथॉरिटीज ने को-लोकेशन स्कैम के आरोपी ब्रोकर्स पर 2017 में छापा मारा था। इसमें उन्हें TAP मैनिपुलेशन से जुड़े ईमेल्स मिले थे। सूत्रों ने यह जानकारी दी। ये आरोप 2013 में ट्रेडिंग एक्सेस प्वाइंट (Trading Access Point) यानी TPA सॉफ्टवेयर के दुरूपयोग से संबंधित हैं। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के को-लोकेशन स्कैम की जांच के दौरान चार साल बाद यह मामला सामने आा था। इस मामले में एनएसई की पूर्व एमडी और सीईओ चित्रा रामकृष्ण और रवि नारायण कथित रूप से शामिल हैं।
हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स ने कथित रूप से TAP का गलत इस्तेमाल किया। इसके लिए उन्होंने स्पेशल सॉफ्टवेयर की मदद ली। यहां तक कि उन्होंने NSE को ट्रांजेक्शन फीस के पेमेंट से भी बचने की कोशिश की। इन बातों के सामने आने पर मार्केट रेगुलेटर (SEBI) ने हाल में एनएसई को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) भेजा था।
क्या है TAP System और इसका दुरूपयोग कैसे किया गया?
SEBI में मार्केट सर्विलांस के पूर्व चीफ दीपक संचेती ने TAP के बारे में विस्तार से बताया। TAP एक रियल-टाइम सिस्टम है, जिसे एनएसई ने ट्रेडिंग सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए शुरू किया था। तब मौजूदा 2-टियर सिस्टम को 3-टियर सिस्टम बनाया जा रहा था। यह बताया गया कि इससे मौजूदा सिस्टम पर लोड में कमी आएगी।
TAP एक अप्लिकेशन है, जिसे फ्रंट-एंड और होस्ट-एंड के बीच लगाया गया था ताकि फ्रंट-एंट और होस्ट एंड के बीच होने वाले सभी कम्युनिकेशन TAP अपलिकेशन के जरिए होंगे। इस रूट से जाने वाले हर ट्रेड पर एनएसई एक फीस वसूलता था, जिसे ट्रांजेक्शन चार्ज कहा जाता था। NSE हर ऑर्डर के लिए भी चार्ज वसूलता था। इसे ऑर्डर रेट अलाउड प्रति सेकेंड के रूप में वसूला जाता था।
TAP सॉफ्टवेयर फ्री में उपलब्ध था। इसे एक्सचेंज से डाउनलोड करना पड़ता था। लेकिन मेंबर्स को एक्सचेंज में ऑर्डर फायर करने के लिए कंप्यूटर-टू-कंप्यूटर (CTCL) खरीदना जरूरी था। सीटीसीएल का प्राइस हर सेकेंड फायर होने वाले ऑर्डर की मैक्सिमम संख्या पर आधारित था। इसके अलावा इसकी सीमा तय थी कि एक मेंबर कितने सीटीसीएल खरीद सकता है। इसका मतलब है कि एक मेंबर कितना ऑर्डर भेज सकता है, इसकी कोई सीमा नहीं थी।
TAP का काम यह सुनिश्चित करना था कि मेंबर उतने ही ऑर्डर भेजे जिसकी इजाजत उसकी तरफ से खरीदे गए प्लान में है। अगर ऑर्डर की संख्या प्लान की लिमिट से बढ़ जाती थी तो ऐसे ऑर्डर एक्सचेंज को नहीं भेजे जाते थे।
आरोप है कि कुछ मेंबर्स ने पहले से तय लिमिट से ज्यादा ऑर्डर TAP के जरिए भेजे। इस तरह वे एक्सचेंज को ट्रांजेक्शन फीस चुकाने से बच गए। इससे TAP की तरफ से बनाए गए चेक पोस्ट पर ट्रैफिक से उन्हें 40-50 माइक्रोसेकेंड्स की बचत होती थी। इस तरह मेंबर्स कम कॉस्ट और तेज स्पीड के साथ जितने ऑर्डर चाहे भेज सकते थे। यह मामला तब सामने आया जब टैक्स अथॉरिटीज ने 2017 में छापे मारे। ये छापे को-लोकेशन स्कैंडल में आरोपी ब्रोकर्स पर मारे गए थे। अब कोर्ट को इस बात का फैसला करना है कि TAP के गलत इस्तेमाल की जानकारी एनएसई के आधिकारियों को थी या नहीं।