सेबी ने मंगलवार को ICDR (Issue of Capital and Disclosure Requirements) नियमों में नरमी लाने का प्रस्ताव रखा। इसके तहत प्रमोटरों के लिए पोस्टआईपीओ लॉक इन नियमों में सरलता लाई जा सकती है और प्रमोटर ग्रुप की परिभाषा में भी बदलाव किया जा सकता है।
सेबी ने मंगलवार को ICDR (Issue of Capital and Disclosure Requirements) नियमों में नरमी लाने का प्रस्ताव रखा। इसके तहत प्रमोटरों के लिए पोस्टआईपीओ लॉक इन नियमों में सरलता लाई जा सकती है और प्रमोटर ग्रुप की परिभाषा में भी बदलाव किया जा सकता है।
सेबी ने अपने एक बयान में कहा है कि किसी आईपीओ के बाद प्रमोटरों की कम से कम 20 फीसदी होल्डिंग 3 साल के लॉक इन पीरियड में रहती है। अब इस लॉक इन अवधि को घटाकर 1 साल किया जा सकता है। इसके अलावा 20 फीसदी से ऊपर और प्री आईपीओ नॉन प्रमोटर शेयर होल्डिंग पर लागू 1 साल के लॉकइन अवधि को भी घटाकर 6 महीने किया जा सकता है।
जानकारों का कहना है कि सेबी के इस कदम से उन कंपनियों को फायदा होगा जिनमें प्राइवेट इक्विटी फंडों का निवेश है। इसके अलावा सेबी का प्रस्ताव प्रमोटर की अवधारण बदलकर पर्सन इन कंट्रोल करने की है।
सेबी का कहना है कि प्रमोटर की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें संशोधन की जरुरत है औऱ यह जरुरत तब और बढ़ जाती है जब प्राइवेट इक्विटी निवेश वाली कंपनियां लिस्ट होना चाहती है। इसके अलावा तमाम नई पीढ़ी की टेक कंपनियां किसी एक परिवार के मालिकाना हक वाली नहीं है। इसके साथ ही इनका कोई आसानी से पहचाना जानेवाला प्रमोटर ग्रुप भी नहीं है। जिसको ध्यान में रखकर अब प्रमोटर की परिभाषा बदले जाने की जरुरत है।
सेबी ने इस मुद्दे पर पब्लिक फीडबैक लेने की भी बात कही है। इसके अलावा सेबी IPO prospectus में टॉप 5 लिस्टेड अथवा अनलिस्टेड ग्रुप कंपनियों के फाइनेंशियल और दूसरे विवरणों के खुलासे के नियम को खत्म करने के पक्ष में भी है।
सेबी का कहना है कि इस नियम को खत्म करने की जरुरत है। IPO prospectus में सिर्फ लिस्टिंग की इच्छुक कंपनी की सभी ग्रुप कंपनियों के रजिस्टर्ड ऑफिस का विवरण होना चाहिए और कंपनी से संबंधित दूसरे विवरण ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों के वेबसाइट पर होने चाहिए।
अगर ये प्रस्ताव कानून बनकर लागू हो जाते हैं तो लिस्टेड कंपनियों पर रेगूलेटरी बोझ हल्का होगा और ज्यादा कंपनियां लिस्टिंग के लिए प्रेरित होगी।
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