SIP and Rupee Connection: ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग ने कच्चे तेल में ऐसा उबाल लाया कि इसकी आंच में भारतीय रुपया बुरी तरह झुलस गया। रुपया एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में ₹97 के पार पहुंच गया। इसे कच्चे तेल की कीमतें या चालू खाते के घाटे से जोड़ा जा रहा है लेकिन ब्रोकरेज फर्म जेफरीज का कहना है कि इसकी कमजोरी की एक और वजह घरेलू निवेशकों की एसआईपी के जरिए ताबड़तोड़ इक्विटी में निवेश हो सकती है। “INR Pressure-The Downside of SIPs” के नाम से अपनी रिपोर्ट में ब्रोकरेज फर्म ने कहा कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और इसके मुकाबले मजबूत घरेलू निवेश रुपये पर दबाव का मुख्य कारण बन गया है।
घरेलू लिक्विडिटी का FIIs ने उठाया फायदा
जेफरीज ने जिक्र किया है कि पिछले दो वर्षों में इक्विटी मार्केट से जुड़े आउटफ्लो करीब $7800 करोड़ तक पहुंच चुके हैं क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs), प्राइवेट इक्विटी फर्मों और विदेशी प्रमोटर्स ने घरेलू लिक्विडिटी का फायदा उठाते हुए अपनी हिस्सेदारी घटाई। उन्होंने यह बिकवाली भारतीय बाजार के वैल्यूएशन के काफी महंगा होने के चलते किया। जेफरीज का कहना है कि मजबूत घरेलू निवेश ने विदेशी निवेशकों को अपना पैसा निकालने का शानदार मौका दिया।
FPIs ने वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड $2100 करोड़ के भारतीय स्टॉक्स बेचे और वित्त वर्ष 2027 में भी अभी तक नेट सेलर बने हुए हैं। अप्रैल 2024 से भारतीय मार्केट में अब तक FPIs ने अकेले $4400 करोड़ के शेयरों की नेट बिक्री की है। हालांकि इसके बावजूद बेंचमार्क इंडेक्सेज मजबूत बने हुए हैं क्योंकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) और खुदरा निवेशकों के SIPs और म्यूचुअल फंड्स में निवेश के साथ-साथ EPFO और NPS से जुड़े बढ़ते इक्विटी एलोकेशन ने विदेशी निवेशकों की बिकवाली को सोख लिया।
जेफरीज का मानना है कि इससे देश का कैपिटल अकाउंट कमजोर हुया है। FY25 और FY26 के दौरान भारत का कैपिटल अकाउंट सरप्लस घटकर GDP के लगभग 0.5% तक आ गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले के दशक में इसका औसत सरप्लस 2.6% था। इस दौरान नेट एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी लगभग $500 करोड़ पर सीमित रहा, जिसका एक कारण प्रमोटरों और प्राइवेट इक्विटी फर्मों की बिकवाली रही।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने देश के कैपिटल अकाउंट को कमजोर किया। पिछले दो वर्षों में भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स निगेटिव बना रहा और जेफरीज के मुताबिक आने वाला वर्ष भी कमजोर रह सकता है। फिर भी जेफरीज को स्थिति में सुधार की संभावना दिख रही है। ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि पिछले चार मौकों में से तीन बार, जब रुपये में 12 महीनों के भीतर 10% से अधिक गिरावट आई, उसके बाद अगले वर्ष FPI निवेश में मजबूत वापसी देखने को मिली।
जेफरीज के मुताबिक वैश्विक एआई-आधारित निवेश थीम में नरमी, भारतीय शेयर बाजार में वैल्यूएशन के कम होने, या फिर होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से विदेशी निवेशकों की बिकवाली को रोकने और भारतीय बाजारों में उनकी रुचि को फिर से बढ़ाने में मदद मिल सकती है। जेफरीज ने इस बात का भी जिक्र किया है कि रुपये का REER (रियल एफेक्टिव एक्सचेंज रेट) इसके 9% अंडरवैल्यू होने का संकेत दे रहा है जोकि ऐसा लेवल है, जिससे इसने वैश्विक आर्थिक संकेट को छोड़ अधिकतर बार वापसी की है।
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